डकैती के लिए 5 से कम आरोपी होने पर सजा नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 50 साल पुराने मामले में दो को बरी किया

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1975 के एक डकैती मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि आरोपियों की संख्या पांच से कम हो जाती है, तो भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 395 के तहत डकैती की सजा बरकरार नहीं रखी जा सकती। न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना की पीठ ने 1984 में दायर एक आपराधिक अपील को स्वीकार करते हुए सबूतों के अभाव और अभियोजन पक्ष की कहानी में तकनीकी खामियों के चलते दो अपीलकर्ताओं को बाइज्जत बरी कर दिया।

यह मामला करीब 50 साल पुराना है, जिसमें निचली अदालत ने दो व्यक्तियों को 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह अपील रामफल और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मामले में दायर की गई थी। अपीलकर्ताओं ने विशेष सत्र न्यायाधीश, झांसी द्वारा 24 अप्रैल 1984 को दिए गए फैसले को चुनौती दी थी। ट्रायल कोर्ट ने रामफल और धुराम को धारा 395 (डकैती) के तहत दोषी ठहराते हुए 10 साल की सजा सुनाई थी। इसके अलावा, रामफल को धारा 397 के तहत भी दोषी पाया गया था और 3 साल की अतिरिक्त सजा दी गई थी।

घटना 19 जनवरी 1975 की है। पुलिस के अनुसार, उन्हें सुबह 11:30 बजे सूचना मिली थी कि झांसी के पीयरघाटा के पास 8-9 बदमाश राहगीरों से लूटपाट कर रहे हैं। पुलिस दल ने मौके पर पहुंचकर बदमाशों को घेरा, जिसके बाद कथित तौर पर दोनों ओर से गोलीबारी हुई। पुलिस का दावा था कि रामफल और धुराम ने आत्मसमर्पण कर दिया, जबकि बाकी बदमाश भागने में सफल रहे। पुलिस ने आरोपियों के पास से एक तमंचा, कारतूस और लूटा गया सामान बरामद करने का दावा किया था।

READ ALSO  दिल्ली हाईकोर्ट  ने प्रवर्तन निदेशालय की चिंताओं के बीच समीर महेन्द्रू को दुबई जाने की अनुमति दी

शुरुआत में छह आरोपियों- हिंदूपात लोधी, रामरतन, रामफल, धुराम, सुखैया चमार और तिजुआ तेली के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया गया था। ट्रायल के दौरान सुखैया और तिजुआ को आरोप मुक्त (Discharge) कर दिया गया, जबकि हिंदूपात और रामरतन को बरी कर दिया गया। अंत में केवल दो अपीलकर्ताओं को ही दोषी ठहराया गया था।

दलीलें

अपीलकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि धारा 395 आईपीसी के तहत सजा कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण है। उनका कहना था कि डकैती के अपराध के लिए कम से कम पांच व्यक्तियों का होना अनिवार्य है। चूंकि दो आरोपी डिस्चार्ज हो गए और दो बरी हो गए, इसलिए बचे हुए आरोपियों की संख्या पांच से कम है, अतः डकैती का आरोप नहीं बनता।

बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि पुलिस कर्मियों के साथ एक ढाबे पर हुए विवाद के बाद अपीलकर्ताओं को झूठा फंसाया गया था। उन्होंने अभियोजन की कहानी में कई खामियां उजागर कीं, जैसे कि मुख्य स्वतंत्र गवाहों की गवाही न होना और गोलीबारी के दावों के बावजूद किसी को चोट न आना।

वहीं, राज्य सरकार के वकील ने अपील का विरोध करते हुए कहा कि आरोपियों को मौके से गिरफ्तार किया गया था और गवाहों ने उनकी पहचान की थी। अभियोजन ने लूटे गए सामान की बरामदगी को अपना मुख्य आधार बनाया।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना ने सबूतों और कानूनी पहलुओं का बारीकी से परीक्षण किया।

1. डकैती के लिए पांच व्यक्तियों की अनिवार्यता हाईकोर्ट ने आईपीसी की धारा 391 का हवाला दिया, जो डकैती को पांच या उससे अधिक व्यक्तियों द्वारा किए गए अपराध के रूप में परिभाषित करती है। सुप्रीम कोर्ट के राम लखन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1983) के फैसले पर भरोसा जताते हुए, कोर्ट ने कहा कि चूंकि दोषी ठहराए गए व्यक्तियों की संख्या पांच से कम हो गई है, इसलिए डकैती का आरोप टिक नहीं सकता।

कोर्ट ने कहा:

“मौजूदा मामले में भी पांच से कम आरोपियों के खिलाफ डकैती का आरोप तय किया गया है। इसलिए, यह अपील केवल इसी आधार पर स्वीकार किए जाने योग्य है।”

READ ALSO  यूपी गौहत्या (रोकथाम) अधिनियम | किसी वाहन को जब्त करने और छोड़ने के संबंध में सीआरपीसी की धारा 397 के तहत पुनरीक्षण दायर किया जा सकता है: इलाहाबाद हाईकोर्ट

2. साक्ष्यों में विसंगतियां कोर्ट ने पुलिस की कहानी में गंभीर विरोधाभास पाए:

  • मुख्य गवाह नदारद: अभियोजन पक्ष उन दो कथित पीड़ितों, लाखन सिंह और बलदेव प्रसाद खरे को अदालत में पेश करने में विफल रहा, जिनसे घटना के दौरान लूटपाट की बात कही गई थी।
  • मुठभेड़ पर संदेह: कोर्ट ने गौर किया कि पुलिस और बदमाशों के बीच अंधाधुंध गोलीबारी के दावे के बावजूद, किसी भी पक्ष को कोई गोली नहीं लगी, जो घटनाक्रम पर सवाल खड़े करता है।
  • स्वतंत्र गवाह अविश्वसनीय: पुलिस ने नेपाल सिंह (P.W.-2) को स्वतंत्र गवाह के रूप में पेश किया था, लेकिन उनके बयानों में समय और घटना स्थल पर उपस्थिति को लेकर विरोधाभास था। कोर्ट ने टिप्पणी की कि वह एक “गढ़ा हुआ गवाह” (Framed Witness) प्रतीत होता है।
  • फर्जी पहचान परेड: बरामद कपड़ों की पहचान को कोर्ट ने “दिखावा” (Sham) करार दिया, क्योंकि रिकवरी मेमो में कपड़ों का कोई विशिष्ट विवरण नहीं था।
READ ALSO  विवाहित बेटी की अनुकंपा नियुक्ति पर निर्भरता की कसौटी और शोक संतप्त परिवार की वित्तीय स्थिति पर विचार किया जाना चाहिए: मद्रास हाईकोर्ट

कोर्ट ने यह भी देखा कि घटना स्थल के दोनों ओर जंगल था, फिर भी केवल दो आरोपियों ने आत्मसमर्पण किया जबकि बाकी भाग गए। यह परिस्थिति बचाव पक्ष की इस दलील को बल देती है कि उन्हें ढाबे से उठाया गया था।

सुप्रीम कोर्ट के जितेंद्र कुमार मिश्रा उर्फ ​​जीतू बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2024) के फैसले का हवाला देते हुए, कोर्ट ने दोहराया कि यदि ट्रायल कोर्ट के विचार से अलग कोई तार्किक दृष्टिकोण संभव है, तो संदेह का लाभ आरोपी को मिलना चाहिए।

फैसला

हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष उचित संदेह से परे आरोपियों का दोष साबित करने में विफल रहा है। कोर्ट ने सत्र परीक्षण संख्या 43/1977 में ट्रायल कोर्ट द्वारा दर्ज की गई सजा और दोषसिद्धि को रद्द कर दिया।

फैसले में कहा गया:

“अपीलकर्ताओं को डकैती या किसी अन्य छोटे अपराध के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता और वे बरी होने के पात्र हैं… क्योंकि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का गलत तरीके से मूल्यांकन किया है।”

अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए रामफल और धुराम को सभी आरोपों से बरी कर दिया।

केस डीटेल्स:

  • केस टाइटल: रामफल और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
  • केस नंबर: क्रिमिनल अपील संख्या 1458/1984
  • कोरम: न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना
  • अपीलकर्ताओं के वकील: कामता प्रसाद, शशांक कुमार, विनोद कुमार यादव, वीरेंद्र सिंह
  • राज्य के वकील: परमार (ए.जी.ए.)

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles