इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महेश उर्फ मुन्ना यादव की आपराधिक अपील को खारिज करते हुए, 2014 के दोहरे हत्याकांड में उसकी दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा की पुष्टि की है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि शरीर पर मिले गोलियों के घावों (entry wounds) के आकार में मामूली अंतर होने का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि घटना में एक से अधिक हथियारों का इस्तेमाल किया गया था। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर मुकर जाने वाले गवाहों (hostile witnesses) की गवाही अभियोजन पक्ष के मामले का समर्थन करती है, तो उसे उस सीमा तक विश्वसनीय माना जा सकता है।
न्यायमूर्ति चंद्र धारी सिंह और न्यायमूर्ति देवेंद्र सिंह-I की खंडपीठ ने क्रिमिनल अपील संख्या 3410/2016 में यह फैसला सुनाया। अपीलकर्ता ने वाराणसी के एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज द्वारा 27 जून 2016 को दिए गए उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे आईपीसी की धारा 302 और आर्म्स एक्ट की धाराओं के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी।
घटना की पृष्ठभूमि
अभियोजन पक्ष के अनुसार, यह घटना 16 मार्च 2014 को वाराणसी के महमूरगंज इलाके में रात करीब 10:30 बजे हुई थी। जमीन के विवाद को लेकर अपीलकर्ता महेश उर्फ मुन्ना यादव अपने साथियों के साथ अपने भाई भोला यादव के घर पहुंचा। आरोप है कि सह-आरोपियों के उकसाने पर अपीलकर्ता ने अपनी पिस्टल से अंधाधुंध फायरिंग की, जिसमें भोला यादव और एक अन्य व्यक्ति विनोद यादव को गोलियां लगीं। इलाज के दौरान दोनों की मृत्यु हो गई थी।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता की दलील: अपीलकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्री वी.पी. श्रीवास्तव ने तर्क दिया कि मेडिकल रिपोर्ट चश्मदीदों के बयानों से मेल नहीं खाती। उन्होंने बताया कि भोला यादव के शरीर पर घाव $1 \text{ cm} \times 1 \text{ cm}$ का था, जबकि विनोद यादव के शरीर पर यह $0.5 \text{ cm} \times 0.5 \text{ cm}$ था। बचाव पक्ष के अनुसार, इससे यह संकेत मिलता है कि दो अलग-अलग हथियारों का इस्तेमाल हुआ था, जो पुलिस की थ्योरी के खिलाफ है। इसके अलावा, उन्होंने मुख्य गवाहों के मुकर जाने (hostile) और एफआईआर लिखे जाने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए।
राज्य सरकार की दलील: अपर शासकीय अधिवक्ता (A.G.A.) श्री एस.एन. तिवारी ने दलील दी कि घटना के मात्र दो घंटे के भीतर एफआईआर दर्ज होना यह साबित करता है कि इसमें किसी प्रकार की बनावट नहीं थी। उन्होंने फॉरेंसिक लैब (FSL) की रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें घटनास्थल से बरामद खोखे और आरोपी के पास से मिली 7.65 एमएम पिस्टल का मिलान सही पाया गया था।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने इस मामले में कई महत्वपूर्ण कानूनी बिंदुओं पर विचार किया:
1. मुकर जाने वाले गवाहों पर: हाईकोर्ट ने नोट किया कि भले ही मृतक की पत्नी और बेटी (PW-2 और PW-3) गोली चलाने वाले की पहचान को लेकर मुकर गई हों, लेकिन उन्होंने घटना के होने और मौत के कारण को स्वीकार किया है। वादीवेलु थेवर बनाम मद्रास राज्य और खुज्जी उर्फ सुरेंद्र तिवारी बनाम मध्य प्रदेश राज्य जैसे मामलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा:
“यह स्थापित कानून है कि किसी मुकर जाने वाले गवाह की गवाही को पूरी तरह से खारिज नहीं किया जा सकता है, और उसके बयानों के वे प्रासंगिक हिस्से जो कानून में स्वीकार्य हैं, अभियोजन या बचाव पक्ष द्वारा उपयोग किए जा सकते हैं।”
2. घावों के आकार में विसंगति पर: बचाव पक्ष के ‘अलग-अलग हथियार’ वाले तर्क को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने फॉरेंसिक सिद्धांतों और मोदी की मेडिकल ज्यूरिसप्रूडेंस का उल्लेख किया। कोर्ट ने समझाया कि घाव का आकार फायरिंग की दूरी, कोण, वेग और त्वचा के लचीलेपन जैसे कई कारकों पर निर्भर करता है।
“मात्र अलग-अलग आकार के घाव होने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि अपराध में दो अलग-अलग हथियारों का उपयोग किया गया था…”
3. फॉरेंसिक साक्ष्य और आचरण: हाईकोर्ट ने पाया कि फॉरेंसिक रिपोर्ट ने आरोपी से बरामद हथियार को सीधे अपराध स्थल से जोड़ा है। साथ ही, गिरफ्तारी के समय आरोपी का भागने का प्रयास करना साक्ष्य अधिनियम की धारा 8 के तहत एक प्रासंगिक तथ्य माना गया।
फैसला
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष हथियार की बरामदगी, फॉरेंसिक लिंक, त्वरित एफआईआर और जमीन के विवाद से जुड़े मकसद को साबित करने में सफल रहा है। ट्रायल कोर्ट के फैसले में किसी भी प्रकार की अवैधता या अनियमितता न पाते हुए, हाईकोर्ट ने अपील खारिज कर दी और सजा बरकरार रखी।
मामले का विवरण
- केस का शीर्षक: महेश उर्फ मुन्ना यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
- केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 3410/2016
- बेंच: न्यायमुूर्ति चंद्र धारी सिंह और न्यायमूर्ति देवेंद्र सिंह-I
- निर्णय की तिथि: 18 मार्च, 2026

