इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्नी पर जानलेवा हमला करने वाले पति की सजा बरकरार रखी; घायल पत्नी को माना “स्टर्लिंग विटनेस”

हाईकोर्ट ने 41 साल पुरानी एक आपराधिक अपील को खारिज करते हुए, अपनी पत्नी की हत्या के प्रयास में दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति की सात साल के कठोर कारावास की सजा की पुष्टि की है। न्यायमूर्ति अब्दुल शाहिद ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि घायल पत्नी की गवाही “स्टर्लिंग” (उत्कृष्ट) श्रेणी की है, क्योंकि यह असंभव है कि एक पत्नी अपने हमलावर पति को पहचानने में कोई गलती करे।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला मैनपुरी जिले में 22-23 फरवरी, 1983 की रात का है। अपीलकर्ता रामेश्वर दयाल ने शुरू में एक प्राथमिकी दर्ज कराई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि 3-4 अज्ञात बदमाशों ने उसके घर में घुसकर उसकी पत्नी श्रीमती विमला देवी को गोली मार दी। हालांकि, जांच के दौरान, जांच अधिकारी (आईओ) श्री रामजी लाल शर्मा को संदेह हुआ क्योंकि घटनास्थल पर मिली एक टूटी हुई सीढ़ी से किसी घुसपैठिये का ऊपर छत पर पहुंचना नामुमकिन था।

जब एस.एन. मेडिकल कॉलेज, आगरा में घायल पत्नी का बयान दर्ज किया गया, तो सच्चाई सामने आई कि उसके पति ने ही गोली चलाई थी। इस हमले के पीछे का कारण मोटरसाइकिल की दहेज की मांग और खराब संबंध बताए गए। इसके बाद, पुलिस ने मामले को धारा 459 आईपीसी से धारा 307 (हत्या का प्रयास) आईपीसी में बदल दिया और रामेश्वर दयाल को मुख्य आरोपी बनाया।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता के वकील: वरिष्ठ अधिवक्ता श्री अखिलेश सिंह ने तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष केवल पत्नी की गवाही पर निर्भर है और कोई स्वतंत्र गवाह नहीं है। उन्होंने दलील दी कि चूंकि चोटें पीठ की तरफ थीं, इसलिए घायल महिला हमलावर की पहचान नहीं कर सकती थी। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि चोटें घातक नहीं थीं, इसलिए सजा को धारा 323 या 324 आईपीसी के तहत कम किया जाना चाहिए। सजा कम करने के लिए शिवमणि बनाम राज्य (2023) के मामले का हवाला भी दिया गया।

READ ALSO  केरल हाईकोर्ट ने बुजुर्ग माता-पिता के पिछले भरण-पोषण के अधिकार को मान्यता दी

राज्य के वकील (एजीए): राज्य की ओर से एजीए ने विरोध करते हुए कहा कि पत्नी को उसके ससुराल के भीतर ही गोली मारी गई थी और “पत्नी अपने पति को अपराधी के रूप में पहचानने में गलती नहीं कर सकती।” यह भी रेखांकित किया गया कि घटना के बाद पति उसे अस्पताल नहीं ले गया और न ही इलाज के दौरान उससे मिलने गया। इस हमले के कारण पीड़िता का एक पैर पूरी तरह से काम करना बंद कर चुका है।

READ ALSO  Allahabad HC Allows Rape Victim to Terminate Pregnancy

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने घायल गवाह के बयान के महत्व पर जोर दिया। योगेश सिंह बनाम महाबीर सिंह (2016) और उत्तर प्रदेश राज्य बनाम नरेश (2011) का हवाला देते हुए न्यायालय ने कहा:

“आपराधिक न्यायशास्त्र का यह एक मुख्य सिद्धांत है कि आरोपी का दोष संदेह से परे साबित होना चाहिए। हालांकि, अभियोजन पक्ष पर केवल मामले को उचित संदेह से परे स्थापित करने का भार है, न कि सभी संदेहों को दूर करने का।”

न्यायालय ने अज्ञात बदमाशों वाली बचाव पक्ष की थ्योरी को खारिज कर दिया और कहा कि बदमाश बिना कुछ लूटे भाग गए, यह बात “बिल्कुल भी विश्वास पैदा नहीं करती।” साक्ष्यों की गुणवत्ता पर हाईकोर्ट ने कहा:

“घायल श्रीमती विमला देवी अपीलकर्ता की पत्नी है… यह बेहद असंभव है कि उसे अपने पति की पहचान के बारे में कोई संदेह हो। यह भी बेहद असंभव है कि उसने अपने पति को इस अपराध में झूठा फंसाया हो।”

READ ALSO  ट्विटर के खिलाफ कोर्ट पहुँचे वकील को न्यायाधीश की फटकार, बोली दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का कर सकते प्रयोग

हाईकोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि यदि हथियार बरामद नहीं हुआ है, तो भी यह अभियोजन के मामले के लिए घातक नहीं है, क्योंकि एक भरोसेमंद गवाह की गवाही मामूली मेडिकल विसंगतियों से ऊपर होती है।

अदालत का निर्णय

न्यायमूर्ति अब्दुल शाहिद ने 20 फरवरी, 1985 के दोषसिद्धि के आदेश और 23 फरवरी, 1985 को सुनाए गए दंड की पुष्टि की।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “आपराधिक अपील खारिज की जाती है।” 1985 से जमानत पर बाहर चल रहे अपीलकर्ता की जमानत रद्द कर दी गई है। अदालत ने उसे अपनी शेष सजा काटने के लिए पंद्रह दिनों के भीतर ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है। सी.जे.एम. मैनपुरी को यह सुनिश्चित करने का आदेश दिया गया है कि यदि अपीलकर्ता निर्धारित समय में आत्मसमर्पण नहीं करता है, तो उसे गिरफ्तार किया जाए।

केस विवरण:

  • केस का नाम: रामेश्वर सिंह (दयाल) बनाम राज्य
  • केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 501/1985
  • पीठ: न्यायमूर्ति अब्दुल शाहिद
  • तारीख: 19 मार्च, 2026

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles