इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में गायब हुए व्यक्तियों की बढ़ती संख्या और पुलिस की सुस्त कार्यवाही पर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह पिछले दो वर्षों में दर्ज की गई एक लाख से अधिक गुमशुदगी की शिकायतों का अद्यतन ब्योरा पेश करे। साथ ही, अपर मुख्य सचिव (गृह) और पुलिस महानिदेशक को 23 फरवरी को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अदालत की सहायता के लिए उपस्थित रहने को कहा है।
यह आदेश न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति ए. के. चौधरी की खंडपीठ ने तब दिया जब अदालत ने इस विषय पर “In Re: Missing Persons in the State” शीर्षक से स्वतः संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका दर्ज की।
मामले की पृष्ठभूमि में जनवरी 2026 में एक आपराधिक रिट याचिका है, जिसमें एक पिता ने अपने जुलाई 2025 से लापता बेटे की बरामदगी के लिए अदालत से हस्तक्षेप की मांग की थी। सुनवाई के दौरान, अदालत ने राज्य सरकार से विस्तृत शपथपत्र मांगा था।
प्राप्त शपथपत्र के अनुसार, 1 जनवरी 2024 से 18 जनवरी 2026 तक प्रदेश में लगभग 1,08,300 गुमशुदगी की शिकायतें दर्ज हुईं, लेकिन इन मामलों में केवल लगभग 9,700 मामलों में ही प्रभावी पुलिस कार्रवाई की गई। शेष शिकायतों पर अब तक कोई कार्यवाही नहीं हुई।
खंडपीठ ने इस स्थिति को “चिंताजनक” बताते हुए कहा,
“गायब हुए व्यक्तियों की शिकायतों को जिस गंभीरता और तत्परता से निपटाया जाना चाहिए, उसमें अधिकारियों का रवैया नितांत असंतोषजनक है।”
राज्य सरकार की ओर से पेश हुए अधिवक्ता वी.के. सिंह ने बताया कि आंकड़ों को फिल्टर करना आवश्यक है क्योंकि कई मामलों में व्यक्ति मिल चुके हैं लेकिन संबंधित अभिलेख अद्यतन नहीं किए गए हैं। उन्होंने अदालत को आश्वस्त किया कि अगली सुनवाई में अद्यतन आंकड़े प्रस्तुत किए जाएंगे।
अदालत ने इस मामले को व्यापक जनहित से जुड़ा मानते हुए अपने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि इसे जनहित याचिका के रूप में दर्ज किया जाए। साथ ही, शीर्ष अधिकारियों की उपस्थिति में राज्य सरकार को स्पष्ट जवाब देने के लिए कहा।
अब यह मामला अगली सुनवाई के लिए 23 फरवरी को सूचीबद्ध है, जिसमें हाईकोर्ट यह देखेगा कि क्या राज्य सरकार ने गुमशुदा व्यक्तियों की खोज को लेकर कोई प्रभावी योजना या नीति तैयार की है।

