इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि उत्तराधिकार प्रमाण पत्र (Succession Certificate) जारी करने के लिए सिक्योरिटी बॉन्ड जमा करने की शर्त एक यांत्रिक (mechanical) प्रक्रिया नहीं है। न्यायमुर्ति मनीष कुमार निगम ने कहा कि ऐसी शर्तें निर्धारित करना अदालत के विवेक पर निर्भर करता है। हाईकोर्ट ने उन मामलों में इस शर्त से छूट देने की बात कही है जहाँ आवेदक एकमात्र लाभार्थी हो या जहाँ अन्य प्राकृतिक वारिसों को कोई आपत्ति न हो।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला कानपुर नगर के सिविल जज (सीनियर डिवीजन) द्वारा 18 जनवरी 2025 को पारित एक आदेश से उपजा है। श्रीमती शकुंतला देवी का 30 अक्टूबर 2008 को बिना वसीयत किए निधन हो गया था। उनके कानूनी वारिसों में उनकी दो बेटियां, श्रीमती अलका सिंघानिया (याचिकाकर्ता) और श्रीमती शिल्पी अग्रवाल (प्रतिवादी) शामिल थीं। मृतका के पास रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड के शेयर थे।
याचिकाकर्ता अलका सिंघानिया ने भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम (ISA) की धारा 372 के तहत उत्तराधिकार प्रमाण पत्र के लिए आवेदन किया। समाचार पत्रों में प्रकाशन और नोटिस के बावजूद किसी ने आपत्ति दर्ज नहीं की। दूसरी वारिस शिल्पी अग्रवाल ने भी शपथ पत्र दाखिल कर अपनी सहमति दी। ट्रायल कोर्ट ने आवेदन तो स्वीकार कर लिया, लेकिन याचिकाकर्ता को प्रमाण पत्र की राशि के बराबर सिक्योरिटी बॉन्ड और पर्सनल बॉन्ड जमा करने का निर्देश दिया, जिससे क्षुब्ध होकर यह याचिका दाखिल की गई।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील श्री आर.के. मिश्रा ने तर्क दिया कि समान राशि का सिक्योरिटी बॉन्ड जमा करने की शर्त मनमानी है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि मृतका का कोई अन्य दावेदार नहीं है और एकमात्र दूसरी वारिस ने अपनी सहमति दे दी है। उन्होंने राहत के लिए दिल्ली हाईकोर्ट के अरविन्द नंदा बनाम राज्य (2020) के फैसले का हवाला दिया।
वहीं, प्रतिवादी के वकील श्री रामाशंकर यादव ने भी हाईकोर्ट को बताया कि उन्हें अपनी बहन के पक्ष में उत्तराधिकार प्रमाण पत्र जारी किए जाने पर कोई आपत्ति नहीं है।
कोर्ट का विश्लेषण
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 375 का विश्लेषण करते हुए नोट किया कि सिक्योरिटी या श्योरिटी बॉन्ड का उद्देश्य उन व्यक्तियों के हितों की रक्षा करना होता है जो ऋण या सुरक्षा के किसी हिस्से के हकदार हो सकते हैं।
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसी शर्त का लागू होना प्रत्येक मामले के तथ्यों पर निर्भर करता है और “इसे यंत्रवत रूप से लागू नहीं किया जा सकता, विशेष रूप से उन स्थितियों में जहाँ लाभार्थी एकमात्र उत्तराधिकारी है या अन्य वारिसों को कोई आपत्ति नहीं है।”
अरविन्द नंदा बनाम राज्य मामले के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:
“उत्तराधिकार प्रमाण पत्र देने के प्रत्येक मामले में, श्योरिटी/सिक्योरिटी और इंडेमनिटी बॉन्ड के लिए दबाव डालने का यांत्रिक दृष्टिकोण आवश्यक नहीं है।”
हाईकोर्ट ने आगे यह भी स्पष्ट किया कि राजेश कुमार शर्मा मामले में डिवीजन बेंच के निर्णय के अनुसार, ऐसी शर्त लगाना अनिवार्य नहीं बल्कि विवेकाधीन है।
न्यायालय का निर्णय
हाईकोर्ट ने पाया कि चूंकि याचिकाकर्ता एक प्राकृतिक वारिस है और दूसरी वारिस को कोई आपत्ति नहीं है, इसलिए समान राशि के सिक्योरिटी बॉन्ड की मांग न्यायोचित नहीं है।
न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम ने कहा:
“याचिकाकर्ता अपने माता-पिता की संपत्ति का एकमात्र कानूनी वारिस और लाभार्थी है, और किसी भी पक्ष से कोई आपत्ति नहीं होने के कारण, उसे श्योरिटी जमा करने से छूट दी जाती है।”
अदालत ने ट्रायल कोर्ट के 18 जनवरी 2025 के आदेश को संशोधित करते हुए सिक्योरिटी बॉन्ड की शर्त हटा दी और नीचे की अदालत को आठ सप्ताह के भीतर उत्तराधिकार प्रमाण पत्र जारी करने का निर्देश दिया।
मामले का विवरण
- केस टाइटल: श्रीमती अलका सिंघानिया बनाम श्रीमती शिल्पी अग्रवाल
- केस नंबर: मैटर्स अंडर आर्टिकल 227 नंबर 8772 ऑफ 2025
- पीठ: न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम
- दिनांक: 13 मार्च, 2026

