‘मिनी-ट्रायल नहीं कर सकते’: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आईपीएस मानहानि मामले में News18 के पत्रकारों की याचिका खारिज की

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने News18 चैनल के तीन वरिष्ठ पत्रकारों को बड़ी राहत देने से इनकार कर दिया है। न्यायालय ने वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी अमिताभ यश द्वारा दायर आपराधिक मानहानि मामले में जारी समन आदेश और आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है।

न्यायमूर्ति बृज राज सिंह की पीठ ने स्पष्ट किया कि धारा 482 दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के तहत कार्यवाही के चरण में न्यायालय साक्ष्यों का वजन नहीं कर सकता है और न ही “मिनी-ट्रायल” आयोजित कर सकता है। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में ट्रायल (विचारण) आवश्यक है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला उत्तर प्रदेश पुलिस के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी और वर्तमान में एसटीएफ (STF) व कानून-व्यवस्था के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (ADG) अमिताभ यश द्वारा दायर एक परिवाद (complaint) से जुड़ा है।

परिवाद में आरोप लगाया गया था कि 20 सितंबर 2017 को शाम लगभग 07:45 बजे News18 पंजाब/हरियाणा/हिमाचल प्रदेश चैनल पर एक खबर प्रसारित की गई थी, जिसमें अधिकारी की छवि को धूमिल करने का प्रयास किया गया। खबर में कथित तौर पर दिखाया गया था कि नाभा जेल ब्रेक के मास्टरमाइंड गुरप्रीत सिंह उर्फ गोपी घनश्यामपुरिया को यूपी पुलिस ने गिरफ्तार किया था, लेकिन एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने पैसे लेकर उसे छोड़ दिया।

परिवाद के अनुसार, प्रसारण में विशेष रूप से कहा गया था: “STF के IG अमिताभ यश पैसा लेकर पंजाब के दहशतगर्दों को छोड़ देता है।”

इस मामले में विद्वान मजिस्ट्रेट ने 12 दिसंबर 2018 को शिकायत का संज्ञान लेते हुए न्यूज़ चैनल के तत्कालीन कार्यकारी संपादक ज्योति कमल, क्राइम रिपोर्टर संतोष शर्मा और एंकर गौरव शुक्ला को तलब (समन) किया था। इसी समन आदेश को चुनौती देने के लिए पत्रकारों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

पक्षकारों की दलीलें

आवेदकों (पत्रकारों) का तर्क: आवेदकों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री नदीम मुर्तजा ने तर्क दिया कि पत्रकार केवल अपना कर्तव्य निभा रहे थे और चैनल ने “निष्पक्ष और वास्तविक रिपोर्टिंग” की थी। उनका कहना था कि अपराधी की गिरफ्तारी और रिहाई की घटना 18 सितंबर 2017 को ‘द ट्रिब्यून’ और ‘दैनिक जागरण’ जैसे विभिन्न राष्ट्रीय समाचार पत्रों में भी प्रकाशित हुई थी।

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बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि बाद में एक उच्च स्तरीय जांच में आईपीएस अधिकारी को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया गया था, इसलिए उनके मुवक्किलों के खिलाफ कोई अपराध नहीं बनता है। उन्होंने कहा कि चैनल पर प्रसारित चर्चा “जैसी थी वैसी ही” दिखाई गई थी।

विपक्षी (परिवादी) का तर्क: दूसरी ओर, आईपीएस अधिकारी के वकील श्री ईशान बघेल ने याचिका का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि आवेदकों ने जानबूझकर एक सम्मानित पुलिस अधिकारी के खिलाफ मानहानिकारक सामग्री प्रसारित की, जिन्हें कई वीरता पदक मिल चुके हैं।

वकील ने न्यायालय का ध्यान इस तथ्य की ओर आकर्षित किया कि इसी तरह की खबर अन्य चैनलों (जैसे E-24 और भारत समाचार) द्वारा भी प्रसारित की गई थी। उन्होंने माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 5 मार्च 2024 को पारित आदेश (अमिताभ यश बनाम मनोज राजन त्रिपाठी) का हवाला दिया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने इसी तरह के एक मामले में हाईकोर्ट द्वारा कार्यवाही रद्द करने के फैसले को पलट दिया था।

न्यायालय का विश्लेषण और निर्णय

दोनों पक्षों को सुनने के बाद, हाईकोर्ट ने समन आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति बृज राज सिंह ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेशों और कानूनी सिद्धांतों का उल्लेख किया।

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न्यायालय ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि मजिस्ट्रेट ने समन जारी करने से पहले जांच रिपोर्ट (जिसमें अधिकारी को क्लीन चिट मिली थी) का संज्ञान लिया था।

न्यायमूर्ति सिंह ने अपने आदेश में कहा:

“उपर्युक्त तथ्यात्मक पहलू से गुजरने के बाद, यह न्यायालय साक्ष्यों का वजन नहीं कर सकता। निश्चित रूप से, इस मामले में ट्रायल की आवश्यकता है। धारा 482 CrPC के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए, यह न्यायालय यह निष्कर्ष दर्ज नहीं कर सकता कि आवेदक निर्दोष हैं या नहीं।”

न्यायालय ने सीबीआई बनाम आर्यन सिंह (2023) के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि हाईकोर्ट के लिए यह उचित नहीं है कि वह आरोपों की विस्तार से जांच करे या जांच के दौरान एकत्र की गई सामग्री का विश्लेषण करे। क्वैशिंग (रद्द करने) के चरण पर “मिनी-ट्रायल” की अनुमति नहीं है।

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परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने माना कि मामले में विचारण आवश्यक है और पत्रकारों द्वारा दायर धारा 482 की याचिका को खारिज कर दिया।

केस विवरण:

  • केस शीर्षक: ज्योति कमल और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य
  • केस संख्या: आवेदन यू/एस 482 संख्या 3237, वर्ष 2020
  • कोरम: न्यायमूर्ति बृज राज सिंह
  • आवेदकों के वकील: नदीम मुर्तजा, अंजनी कुमार मिश्रा
  • विपक्षी के वकील: जी.ए., ईशान बघेल, मो. खालिद

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