इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के अपर मुख्य सचिव (गृह) को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए पूछा है कि गैंग चार्ट की स्वीकृति के लिए ज़िला मजिस्ट्रेटों (डीएम) को संयुक्त बैठक से बाहर क्यों रखा गया और क्या इस संबंध में कोई कानूनी बाधा है। कोर्ट ने राज्य सरकार को इस प्रक्रिया पर स्पष्टीकरण देने का निर्देश दिया है।
यह आदेश न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने 9 जनवरी को पारित किया, जिसमें उन्होंने उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स और असामाजिक गतिविधियां (निवारण) अधिनियम, 1986 के क्रियान्वयन को लेकर राज्य सरकार की भूमिका पर गहरी चिंता जताई।
कोर्ट ने आदेश में कहा:
“यह सर्वविदित है कि अत्यंत नेक और सद्भावनापूर्ण विचार भी विफल हो सकते हैं जब उन्हें ऐसे प्रशासनिक अधिकारियों के हाथों में सौंप दिया जाए जो न तो प्रशिक्षित हैं, न ही संस्थागत योग्यता रखते हैं, परंतु महत्वाकांक्षी अवश्य हैं और संवैधानिक प्राधिकरणों को प्रभावित करने में निपुण हैं।”
यह आदेश राजेंद्र त्यागी और दो अन्य द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया गया, जो कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 के तहत दाखिल की गई थी। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश गैंगस्टर अधिनियम का उनके खिलाफ पुलिस द्वारा दुरुपयोग किया गया।
उन्होंने विशेष रूप से यह मुद्दा उठाया कि गाज़ियाबाद कमिश्नरेट में गैंग चार्ट की स्वीकृति का कार्य सिर्फ पुलिस कमिश्नर द्वारा किया जा रहा है, जबकि उत्तर प्रदेश गैंगस्टर नियमावली, 2021 के नियम 5(3)(क) के अनुसार, गैर-कमिश्नरेट जिलों में डीएम और एसपी द्वारा संयुक्त बैठक कर “मुख्य संतोष” दर्ज किया जाना अनिवार्य है।
कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि गैंगस्टर जैसे कठोर कानून के तहत कार्यवाही में यदि वैधानिक प्रक्रियाओं की अनदेखी की जा रही है, तो यह गंभीर विषय है। डीएम की भूमिका केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि न्यायिक संतुलन बनाने के लिए भी महत्त्वपूर्ण मानी जाती है।
अब यह मामला 20 जनवरी को अगली सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है, और राज्य सरकार से इस संबंध में औपचारिक जवाब अपेक्षित है।

