इलाहाबाद हाईकोर्ट ने माइक्रो, स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज फैसिलिटेशन काउंसिल (MSME काउंसिल), कानपुर द्वारा पारित एक अवार्ड को चुनौती देने वाली रिट याचिका को खारिज कर दिया है। जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि कोई भी पक्ष आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट, 1996 के तहत उपलब्ध वैधानिक उपचार की अनदेखी नहीं कर सकता, विशेष रूप से MSME एक्ट के तहत अनिवार्य ‘प्री-डिपोजिट’ (पूर्व-जमा) की शर्त से बचने के लिए।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला MSME काउंसिल द्वारा 15 जुलाई, 2021 को MSME डेवलपमेंट एक्ट, 2006 की धारा 18 के तहत पारित एक अवार्ड से संबंधित है। इस अवार्ड के माध्यम से याचिकाकर्ता, श्री कृष्णा न्यूट्रिशन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड को 9,62,610 रुपये की मूल राशि और 14,53,225 रुपये के ब्याज सहित कुल 24,15,835 रुपये भुगतान करने का आदेश दिया गया था। याचिकाकर्ता का तर्क था कि उन्हें इस अवार्ड की जानकारी अप्रैल 2025 के तीसरे सप्ताह में हुई, जिसके बाद उन्होंने निष्पादन अदालत (Executing Court) का दरवाजा खटखटाया और फिर हाईकोर्ट में यह रिट याचिका दायर की।
याचिकाकर्ता के तर्क
याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि विवादित अवार्ड ‘एकपक्षीय’ (ex parte) पारित किया गया था और उन्हें नोटिस की उचित तामील नहीं की गई थी। इसके अलावा, यह तर्क दिया गया कि MSME काउंसिल के पास इस मामले में क्षेत्राधिकार नहीं था क्योंकि दावा समय-सीमा (limitation) से बाहर था। याचिकाकर्ता के अनुसार, माल की अंतिम आपूर्ति फरवरी 2017 में की गई थी, जबकि संदर्भ (reference) सितंबर 2020 में दाखिल किया गया था। याचिकाकर्ता ने इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन बताते हुए अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट के हस्तक्षेप की मांग की थी।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने गौर किया कि याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए आधार—नोटिस की तामील न होना और समय-सीमा का मुद्दा—केवल कानून के प्रश्न नहीं हैं, बल्कि ये “तथ्य और कानून के मिश्रित प्रश्न” हैं। हाईकोर्ट ने कहा:
“उचित तामील का निर्धारण करने के लिए तामील के तरीके, पावती, पते और संबंधित सामग्री की जांच की आवश्यकता होगी, जबकि समय-सीमा की दलील आपूर्ति की तारीख, चालान, पावती और पक्षों के बीच लेनदेन के तथ्यों पर निर्भर करेगी।”
हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि MSMED एक्ट की धारा 18 के तहत कार्यवाही एक ‘आर्बिट्रल अवार्ड’ में समाप्त होती है, जिसे चुनौती देने के लिए आर्बिट्रेशन एक्ट की धारा 34 के तहत विशिष्ट वैधानिक उपचार उपलब्ध है। इंडिया ग्लाइकोल्स लिमिटेड बनाम MSME फैसिलिटेशन काउंसिल (2018) के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए खंडपीठ ने कहा कि वैधानिक उपचार को दरकिनार कर रिट क्षेत्राधिकार का उपयोग नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब इसका उद्देश्य धारा 19 के तहत अनिवार्य 75% राशि जमा करने से बचना हो।
अदालत ने आगे स्पष्ट किया:
“याचिकाकर्ता की दलील स्वीकार करने का परिणाम यह होगा कि हर आर्बिट्रल अवार्ड को प्रक्रियात्मक अनियमितता के आरोपों पर रिट जांच के दायरे में लाया जाएगा, जिससे धारा 34 के तहत वैधानिक तंत्र निरर्थक हो जाएगा, जो कानून में स्वीकार्य नहीं है।”
अदालत का निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि कोई असाधारण परिस्थिति नहीं दिखाई गई है, इसलिए रिट याचिका विचारणीय (maintainable) नहीं है। हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए निर्देश दिया कि निष्पादन अदालत याचिकाकर्ता द्वारा दायर आवेदनों पर बिना किसी टिप्पणी से प्रभावित हुए शीघ्र निर्णय ले। साथ ही, अदालत ने याचिकाकर्ता को अन्य उपलब्ध वैधानिक उपचारों का लाभ उठाने की स्वतंत्रता दी।
मामले का विवरण
- केस टाइटल: श्री कृष्णा न्यूट्रिशन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड बनाम माइक्रो स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज और अन्य
- केस नंबर: रिट-सी नंबर 8895 ऑफ 2026
- पीठ: जस्टिस सरल श्रीवास्तव, जस्टिस गरिमा प्रसाद
- दिनांक: 30 अप्रैल, 2026

