भरण-पोषण मामले में मां को पक्षकार बनाने के लिए मजबूर नहीं कर सकता पिता, लेकिन कोर्ट दोनों की आय पर दे ध्यान: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक पिता द्वारा अपनी नाबालिग बच्ची के भरण-पोषण मामले में मां को पक्षकार (Impleadment) बनाने की मांग वाली क्रिमिनल रिवीज़न याचिका को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया जिसमें मां को पक्षकार बनाने की अर्जी नामंजूर कर दी गई थी। हालांकि, कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि भरण-पोषण की राशि तय करते समय माता-पिता दोनों की वित्तीय क्षमता पर विचार करना अनिवार्य है।

यह आदेश जस्टिस मदन पाल सिंह द्वारा आज़मगढ़ फैमिली कोर्ट के प्रिन्सिपल जज के 6 अगस्त 2025 के आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया गया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला नाबालिग बच्ची ‘कुमारी रित्तिका’ की ओर से उसके नाना द्वारा पिता ‘अरविंद कुमार’ के खिलाफ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (B.N.S.S.) की धारा 144 के तहत दायर भरण-पोषण के आवेदन से जुड़ा है।

कार्यवाही के दौरान, पिता ने एक आवेदन देकर मांग की कि बच्ची की मां ‘श्रीमती पूनम’ को भी इस मामले में एक पक्षकार बनाया जाए। उनका तर्क था कि बच्ची का पालन-पोषण करना माता-पिता दोनों की संयुक्त जिम्मेदारी है। फैमिली कोर्ट ने 6 अगस्त 2025 को इस मांग को खारिज कर दिया था, जिसे अब हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।

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पक्षकारों के तर्क

रिवीज़निस्ट (पिता) की ओर से: पिता के वकील श्री रवींद्र कुमार मिश्रा ने दलील दी कि रित्तिका, अरविंद और पूनम की बेटी है। उन्होंने बताया कि पिता रेलवे क्लर्क के रूप में ₹41,000 प्रति माह कमा रहे हैं, जबकि मां पुलिस कांस्टेबल है और उसकी आय लगभग ₹55,000 प्रति माह है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले ‘चंदू श्रीदेवी बनाम चंदू शेषा राव’ का हवाला देते हुए उन्होंने तर्क दिया कि जब दोनों अभिभावक कमा रहे हों, तो बच्चे के भरण-पोषण का दायित्व एक “साझा और संयुक्त जिम्मेदारी” होती है।

विपक्षी दल (बच्ची/राज्य) की ओर से: विपक्षी संख्या 2 के वकील श्री सी.बी. सिंह ने तर्क दिया कि शिकायतकर्ता ‘डोमिनस लिटिस’ (मुकदमे का मालिक) होता है और उसे यह चुनने का पूरा अधिकार है कि वह किसके खिलाफ राहत मांगना चाहता है। उन्होंने कहा कि पिता अपनी बेटी के प्रति अपने वैधानिक दायित्व से बचने के लिए मां को पक्षकार बनाने की शर्त नहीं रख सकता।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने आवेदन इसलिए खारिज किया था क्योंकि आपराधिक प्रक्रिया में ‘ऑर्डर 1 रूल 10 सीपीसी’ की तरह पक्षकार बनाने का कोई विशिष्ट प्रावधान नहीं है और यह कार्यवाही संक्षिप्त (Summary) प्रकृति की होती है।

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‘डोमिनस लिटिस’ के सिद्धांत की पुष्टि करते हुए जस्टिस मदन पाल सिंह ने कहा:

“यह कानून का एक स्थापित सिद्धांत है कि कानूनी कार्यवाही शुरू करने वाले व्यक्ति के पास यह चुनने का पूर्ण विशेषाधिकार है कि वे किसके खिलाफ राहत चाहते हैं। केवल इसलिए कि नाबालिग बच्चे की मां भी कमा रही है, पिता बच्चे के भरण-पोषण के अपने वैधानिक दायित्व से मुक्त नहीं हो जाता।”

हाईकोर्ट ने आगे जोर दिया कि पिता का दायित्व एक “कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी” है और वह मां को पक्षकार बनाने की जिद करके इस जिम्मेदारी से बच नहीं सकता।

हालांकि, कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रतिपादित दोहरी आय वाले परिवारों से जुड़े कानूनी पक्ष पर भी गौर किया:

“साथ ही, यह कोर्ट उस कानूनी स्थिति की अनदेखी नहीं कर सकता कि जब माता-पिता दोनों कमाने वाले सदस्य होते हैं, तो बच्चे के भरण-पोषण की जिम्मेदारी एक साझा और संयुक्त जिम्मेदारी होती है…”

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फैसला

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश में कोई “अवैधता या अधिकार क्षेत्र की त्रुटि” नहीं पाई और रिवीज़न याचिका को खारिज कर दिया।

हालांकि, मुख्य आवेदन के अंतिम निपटारे के लिए हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्देश दिए। कोर्ट ने कहा कि भरण-पोषण तय करते समय फैमिली कोर्ट को निम्नलिखित बिंदुओं का पालन करना होगा:

  1. माता-पिता दोनों की आय और वित्तीय क्षमता पर विचार करें।
  2. भरण-पोषण की राशि “न्यायसंगत और उचित” तरीके से निर्धारित करें।
  3. “साझा माता-पिता की जिम्मेदारी” के सिद्धांत और बच्चे के कल्याण को ध्यान में रखें।

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को इस मामले में तेजी से कार्यवाही करने और हाईकोर्ट की टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना (सिर्फ दोनों की आय पर विचार करने के निर्देश को छोड़कर) कानून के अनुसार निर्णय लेने का निर्देश दिया।

केस विवरण:

  • केस का नाम: अरविंद कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
  • केस संख्या: क्रिमिनल रिवीज़न संख्या 5048/2025
  • पीठ: जस्टिस मदन पाल सिंह
  • दिनांक: 10 मार्च, 2026

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