इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कानपुर विकास प्राधिकरण (KDA) की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जाहिर करते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को जांच के आदेश दिए हैं। यह मामला एक 90 वर्षीय बुजुर्ग को 41 साल तक जमीन का कब्जा न मिलने से जुड़ा है। हाईकोर्ट ने अधिकारियों के इस रवैये को ‘मनमाना और सनक भरा’ बताते हुए स्पष्ट किया कि राज्य सरकार अपने अधिकारियों के ऐसे कृत्यों के लिए उत्तरदायी है। कोर्ट ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ता को हुए नुकसान की भरपाई दोषी अधिकारियों के वेतन या संपत्ति से की जाए।
यह मामला बी.एन. त्रिपाठी और दिवंगत युगरानी देवी से संबंधित है, जिन्हें 1984 में केडीए द्वारा एक फैक्ट्री लगाने के लिए 2,222 वर्ग गज का प्लॉट आवंटित किया गया था। दिसंबर 1984 में उन्हें 999 साल की लीज भी मिल गई थी। लेकिन लीज मिलने के बावजूद, केडीए ने कभी भी उन्हें जमीन का भौतिक कब्जा नहीं सौंपा।
इस लंबे इंतजार के दौरान, सितंबर 2011 में युगरानी देवी का निधन हो गया। मुख्य याचिकाकर्ता बी.एन. त्रिपाठी अब लगभग 90 वर्ष के हो चुके हैं। याचिकाकर्ता की पहली अपील पर सुनवाई करते हुए जस्टिस संदीप जैन ने मार्मिक टिप्पणी की, “केवल भगवान ही जानता है कि उन्हें कब्जा कब मिल पाएगा।”
हाईकोर्ट ने इस बात पर गहरा क्षोभ व्यक्त किया कि केडीए ने चार दशकों तक कब्जा न देने का कोई ठोस कारण नहीं बताया। कोर्ट ने कहा कि केडीए एक वैधानिक निकाय है, इसलिए इसके अधिकारियों द्वारा किए गए अवैध कार्यों के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ‘प्रतिकूल रूप से उत्तरदायी’ (Vicariously Liable) है।
जस्टिस जैन ने अपने फैसले में कहा, “राज्य को केडीए अधिकारियों के खिलाफ उचित अनुशासनात्मक कार्रवाई सुनिश्चित करनी चाहिए। उनके मनमाने और सनक भरे कार्यों ने जनता के बीच राज्य और उसकी कार्यप्रणाली की छवि को धूमिल किया है।” कोर्ट ने मुख्यमंत्री से इस मामले को व्यक्तिगत रूप से देखने और लापरवाह अधिकारियों से हर्जाना वसूलने की अपेक्षा की है।
याचिकाकर्ता को हुए व्यावसायिक नुकसान (जो लगभग 41 लाख रुपये से अधिक आंका गया था) को देखते हुए, हाईकोर्ट ने निम्नलिखित मुआवजे का आदेश दिया:
- मासिक हर्जाना: 1 जुलाई, 1987 से लेकर कब्जा मिलने की तारीख तक 13,700 रुपये प्रति माह।
- ब्याज: लंबित मुकदमेबाजी और भविष्य की राशि पर 6% वार्षिक ब्याज।
- फैक्ट्री सेटअप लागत: फैक्ट्री स्थापित करने के शुरुआती खर्चों के लिए 5 लाख रुपये (5% ब्याज के साथ)।
- उत्पीड़न के लिए मुआवजा: बुजुर्ग याचिकाकर्ता को हुई मानसिक प्रताड़ना और कष्ट के लिए 2 लाख रुपये।
हाईकोर्ट का यह फैसला विकास प्राधिकरणों की जवाबदेही तय करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि प्रशासनिक लापरवाही किसी नागरिक के अधिकारों का जीवनभर हनन न करे।

