इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चोरी के आरोप में गिरफ्तार एक आरोपी को जमानत देते हुए पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 105 के तहत बरामदगी (रिकवरी) की वीडियोग्राफी करना अनिवार्य है, लेकिन पुलिस द्वारा इसका पालन न करना अभियोजन की कहानी पर संदेह पैदा करता है। इस लापरवाही को देखते हुए कोर्ट ने न केवल आरोपी को जमानत दी, बल्कि उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) को कानून का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने के लिए विस्तृत मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) जारी करने का निर्देश भी दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला आवेदक शादाब से जुड़ा है, जिसने मुजफ्फरनगर जिले के मंसूरपुर पुलिस स्टेशन में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 305(2) और 317(2) के तहत दर्ज केस क्राइम नंबर 185/2024 में जमानत की मांग की थी। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि सूचना के आधार पर पुलिस ने आवेदक और चार अन्य सह-आरोपियों को गिरफ्तार किया और उनके संयुक्त कब्जे से 40 मोटरसाइकिलें बरामद कीं। आवेदक 16 अप्रैल 2025 से जेल में बंद था।
दलीलें
आवेदक के वकील, आशीष कुमार तिवारी ने तर्क दिया कि आवेदक का नाम एफआईआर (FIR) में नहीं था। उनकी मुख्य दलील रिकवरी की प्रक्रिया को लेकर थी। उन्होंने कोर्ट को बताया कि पुलिस ने 40 मोटरसाइकिलों की बरामदगी दिखाई है, लेकिन इस रिकवरी का कोई भी निजी गवाह (private witness) नहीं है और न ही इसकी कोई वीडियोग्राफी की गई है।
वकील ने जोर देकर कहा कि BNSS की धारा 105 के तहत रिकवरी की वीडियोग्राफी अनिवार्य है। उन्होंने तर्क दिया कि इस तरह के सबूतों का अभाव “अभियोजन की पूरी कहानी पर संदेह पैदा करता है।” इसके अलावा, यह भी बताया गया कि सह-आरोपी शोएब और ओवैस को हाईकोर्ट की एक अन्य पीठ द्वारा पहले ही जमानत दी जा चुकी है, इसलिए समानता के आधार पर आवेदक भी जमानत का हकदार है। आवेदक के खिलाफ दर्ज 6 अन्य मामलों के आपराधिक इतिहास को लेकर कहा गया कि ये मामले वर्तमान केस की रिकवरी के बाद उस पर थोपे गए थे।
राज्य की ओर से पेश हुए विद्वान ए.जी.ए., राकेश कुमार मिश्रा ने जमानत का कड़ा विरोध किया, लेकिन वे वीडियोग्राफी न होने के तथ्य को चुनौती नहीं दे सके।
कोर्ट का विश्लेषण
न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने पर पाया कि पुलिस ने मोटरसाइकिलों की रिकवरी या जब्ती सूची (seizure list) तैयार करते समय कोई वीडियोग्राफी नहीं की थी।
कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा:
“यह तथ्य पुलिस की न केवल लापरवाही बल्कि मनमानेपन को भी दर्शाता है, जो जब्त की गई वस्तुओं की बरामदगी के संबंध में अभियोजन की कहानी पर संदेह पैदा करता है।”
कोर्ट ने BNSS की धारा 105 का हवाला दिया, जो यह अनिवार्य करती है कि किसी स्थान की तलाशी या किसी संपत्ति को कब्जे में लेने की प्रक्रिया की रिकॉर्डिंग “ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यम, विशेष रूप से मोबाइल फोन के जरिए” की जानी चाहिए। कोर्ट ने ‘उत्तर प्रदेश भारतीय नागरिक सुरक्षा नियमावली, 2024’ के नियम 18 का भी उल्लेख किया, जिसके तहत ऐसी रिकॉर्डिंग अनिवार्य रूप से ‘ई-साक्ष्य ऐप’ (E-Sakshya App) के माध्यम से की जानी चाहिए।
सिस्टम की खामी को उजागर करते हुए कोर्ट ने कहा:
“इस कोर्ट के सामने ऐसे कई मामले आए हैं जहां किसी वस्तु की बरामदगी के संबंध में कोई स्वतंत्र गवाह नहीं मिल सका और पुलिस द्वारा ई-साक्ष्य पोर्टल या अन्य इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग भी नहीं की गई, जिसका लाभ अपराधियों को जमानत और मुकदमे (trial) के दौरान मिलता है।”
निर्णय
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आवेदक शादाब की जमानत अर्जी मंजूर कर ली और उसे व्यक्तिगत मुचलका और दो जमानतदारों को प्रस्तुत करने पर रिहा करने का आदेश दिया।
जमानत देने के साथ ही, कोर्ट ने पुलिस महानिदेशक (DGP), उत्तर प्रदेश को कड़े निर्देश जारी किए। कोर्ट ने आदेश दिया कि ‘उत्तर प्रदेश भारतीय नागरिक सुरक्षा नियमावली, 2024’ के नियम 18(5) के तहत विस्तृत SOP जारी की जाए, ताकि तलाशी और जब्ती की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य रूप से ई-साक्ष्य पोर्टल पर की जा सके।
महत्वपूर्ण रूप से, कोर्ट ने यह निर्देश दिया कि:
“BNSS की धारा 105 और उत्तर प्रदेश भारतीय नागरिक सुरक्षा नियमावली, 2024 के नियम 18 की अनिवार्य आवश्यकताओं का पालन करने में विफल रहने पर संबंधित पुलिस अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्यवाही (disciplinary proceeding) की जा सकती है।”
कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि इन नियमों का कड़ाई से पालन आवश्यक है ताकि “एक ओर निर्दोष व्यक्तियों को संपत्ति या वस्तुओं की झूठी बरामदगी दिखाकर झूठे मामले में फंसाने से बचाया जा सके और दूसरी ओर अपराधियों के खिलाफ पुख्ता सबूत तैयार किए जा सकें।”
केस डीटेल्स:
- केस टाइटल: शादाब बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
- केस नंबर: क्रिमिनल मिसलेनियस बेल एप्लीकेशन नंबर 40989 ऑफ 2025
- साइटेशन: 2026:AHC:260
- कोरम: न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल

