इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अधिवक्ता द्वारा कोर्ट को “गुमराह” करने के प्रयास पर सख्त रुख अपनाते हुए उन पर 20,000 रुपये का जुर्माना लगाया है। हाईकोर्ट ने पाया कि संबंधित वकील ने एक कोर्ट में ‘बीमारी की पर्ची’ (Illness Slip) भेजकर स्थगन की मांग की, जबकि उसी समय वह दूसरे कोर्ट रूम में एक अन्य मामले में बहस कर रहे थे। इसी के साथ कोर्ट ने उनके मुवक्किलों, अरुण कुमार यादव और शिव प्रकाश सिंह की अग्रिम जमानत याचिकाओं को भी खारिज कर दिया, क्योंकि उन्हें पहले से ही दूसरी बेंच से संरक्षण प्राप्त था।
मामला और कानूनी विवाद
यह मामला भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 482 के तहत दायर दो अग्रिम जमानत याचिकाओं (संख्या 2375/2025 और 2551/2025) से जुड़ा था। याची अरुण कुमार यादव और शिव प्रकाश सिंह ने वाराणसी के कैंट थाने में दर्ज केस अपराध संख्या 411/2020 में गिरफ्तारी से राहत मांगी थी। यह मामला आईपीसी की धारा 420, 467, 468 और 471 के तहत दर्ज था।
मामले की पृष्ठभूमि जय प्रकाश डिग्री कॉलेज, उमराहा के प्रबंधन से जुड़े विवाद पर आधारित है। याचियों का तर्क था कि कॉलेज एक सोसाइटी द्वारा चलाया जा रहा था, लेकिन विपक्षी संख्या-2 (शिकायतकर्ता) ने इसे एक निजी ट्रस्ट को हस्तांतरित करने की कोशिश की। इसी विवाद के कारण कई मुकदमे और एफआईआर दर्ज हुईं। याचियों ने आरोप लगाया कि वर्तमान एफआईआर केवल “दुर्भावना” और “प्रतिशोध” की भावना से दर्ज कराई गई है।
पक्षों की दलीलें
याचियों के वकील ने तर्क दिया कि वे निर्दोष हैं और उनके खिलाफ कोई “ठोस सबूत” न होने के बावजूद उन्हें गिरफ्तारी की आशंका है। उन्होंने यह भी बताया कि इसी तरह के एक मामले में हाईकोर्ट की एक अन्य बेंच ने पहले ही शिव प्रकाश सिंह के पक्ष में “दंडात्मक कार्रवाई न करने” का आदेश पारित किया था।
दूसरी ओर, शिकायतकर्ता के वकील ने कोर्ट के समक्ष महत्वपूर्ण तथ्य रखे। उन्होंने बताया कि जब ये अग्रिम जमानत याचिकाएं लंबित थीं, तब याची अरुण कुमार यादव ने पहले ही चार्जशीट को चुनौती देते हुए धारा 528 BNSS के तहत याचिका दायर कर दी थी। उस मामले (संख्या 5350/2025) में हाईकोर्ट ने 18 सितंबर 2025 को याचियों के खिलाफ कार्यवाही पर रोक लगा दी थी।
शिकायतकर्ता के वकील ने याचियों के वकील, श्री जितेंद्र कुमार श्रीवास्तव के आचरण पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कोर्ट को सबूत के तौर पर ‘अपीयरेंस स्लिप’ दिखाई, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि जिस समय वकील ने बीमारी का हवाला देकर कोर्ट नंबर 71 से स्थगन मांगा था, उसी समय वह मुख्य न्यायाधीश की कोर्ट में एक ‘स्पेशल अपील’ में बहस कर रहे थे।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
न्यायमूर्ति गौतम चौधरी ने पाया कि अग्रिम जमानत याचिका का मुख्य आधार यानी “गिरफ्तारी की आशंका” अब मौजूद नहीं है। कोर्ट ने कहा:
“चूंकि धारा 528 BNSS के तहत आवेदन संख्या 5350/2025 में पारित आदेश दिनांक 18.09.2025 द्वारा आवेदकों के पक्ष में अंतरिम संरक्षण पहले ही प्रदान किया जा चुका है, इसलिए आवेदकों की गिरफ्तारी की कोई आशंका नहीं है।”
वकील के आचरण पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने न्यायिक समय की बर्बादी पर गहरी चिंता व्यक्त की। कोर्ट ने नोट किया कि मामला 2025 की पहली तिमाही से लंबित है और बार-बार वकील की अनुपस्थिति या अनुरोध के कारण स्थगित होता रहा है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया:
“आवेदकों के वकील का आचरण यह दर्शाता है कि उन्होंने कोर्ट को धोखा देने का प्रयास किया है, जो न्याय के प्रशासन में हस्तक्षेप के समान है। विशेष रूप से तब, जब हर दिन बड़ी संख्या में नए मामले दर्ज हो रहे हैं और कोर्ट पहले से ही लंबित मामलों के बोझ से दबे हुए हैं।”
कोर्ट ने आगे कहा कि एक वकील “ऑफिसर ऑफ द कोर्ट” होता है और उसका यह कर्तव्य है कि वह कोर्ट को सही तथ्यों से अवगत कराए ताकि कोर्ट का कीमती समय बचाया जा सके।
निर्णय
हाईकोर्ट ने दोनों अग्रिम जमानत याचिकाओं को खारिज कर दिया। इसके अतिरिक्त, अधिवक्ता श्री जितेंद्र कुमार श्रीवास्तव (एडवोकेट रोल नंबर A/J-0185/2012) पर उनके आचरण के लिए 20,000 रुपये का जुर्माना लगाया।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि यह राशि एक महीने के भीतर हाईकोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी, इलाहाबाद में जमा की जाए। यदि निर्धारित समय में जुर्माना जमा नहीं किया जाता है, तो कमेटी के सचिव इस मामले को यूपी बार काउंसिल को आवश्यक कार्यवाही के लिए भेजेंगे। कोर्ट ने संबंधित निचली अदालत और अधिवक्ता को इस आदेश की तत्काल सूचना देने का भी निर्देश दिया।
मामले का विवरण:
- केस टाइटल: अरुण कुमार यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (संबद्ध मामले के साथ)
- केस नंबर: क्रिमिनल मिस. एंटीसिपेटरी बेल एप्लीकेशन U/S 482 BNSS नंबर 2375/2025
- बेंच: जस्टिस गौतम चौधरी
- तारीख: 24 मार्च, 2026

