फैमिली कोर्ट से ग्राम न्यायालयों में भरण-पोषण मामलों का स्थानांतरण वैध; इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बार एसोसिएशनों की याचिकाएं खारिज कीं

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट से ग्राम न्यायालयों में भरण-पोषण (Maintenance) से जुड़ी कार्यवाही स्थानांतरित करने वाले प्रशासनिक आदेशों को बरकरार रखा है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि दो विशेष अधिनियमों के बीच कोई असंगति (Inconsistency) होती है, तो बाद में लागू हुआ कानून—इस मामले में ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008—प्रभावी होगा।

जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने सिविल कोर्ट बार एसोसिएशन, महाराजगंज और बार एसोसिएशन, सिविल कोर्ट, गोरखपुर द्वारा दायर दो रिट याचिकाओं को खारिज कर दिया। इन याचिकाओं में महाराजगंज और गोरखपुर के जिला न्यायाधीशों और फैमिली कोर्ट के प्रधान न्यायाधीशों द्वारा पारित उन आदेशों को चुनौती दी गई थी, जिनके तहत दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) के अध्याय IX के मामलों को विभिन्न ग्राम न्यायालयों में स्थानांतरित कर दिया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

विवाद साल 2025 के अंत में जारी प्रशासनिक आदेशों से शुरू हुआ, जिसमें महाराजगंज के नौतनवा और निचलौल जैसे क्षेत्रों के ग्राम न्यायालयों में लंबित भरण-पोषण के मामलों को भेजने का निर्देश दिया गया था। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि ये आदेश रजिस्ट्रार जनरल के 16 दिसंबर 2021 के एक पत्र के आधार पर पारित किए गए थे, जिसमें कहा गया था कि ग्राम न्यायालय अधिनियम का प्रभाव सर्वोपरि (Overriding effect) होगा।

पक्षों के तर्क

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि फैमिली कोर्ट अधिनियम, 1984 एक “विशेष कानून” है जो पारिवारिक विवादों के लिए एक विशेष मंच बनाता है, और इसकी अधिकारिता को प्रशासनिक निर्देशों द्वारा छीना नहीं जा सकता। उन्होंने अपील की संरचना में अंतर पर भी जोर दिया; जहां फैमिली कोर्ट अधिनियम की धारा 19 सीधे हाईकोर्ट में अपील का अधिकार देती है, वहीं ग्राम न्यायालय अधिनियम की धारा 33 के तहत अपील केवल सत्र न्यायालय (Court of Session) में की जा सकती है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, यह हाईकोर्ट में अपील के मूल्यवान वैधानिक अधिकार से वंचित करना है।

दूसरी ओर, उत्तरदाताओं की ओर से तर्क दिया गया कि ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008 एक लाभकारी कानून है जिसका उद्देश्य जमीनी स्तर पर न्याय प्रदान करना है। उन्होंने अधिनियम की धारा 12 और पहली अनुसूची का हवाला दिया, जो स्पष्ट रूप से भरण-पोषण की कार्यवाही को ग्राम न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र में लाती है। उत्तरदाताओं ने धारा 18 पर भी भरोसा जताया, जो आपराधिक मामलों में इस अधिनियम को अन्य कानूनों पर प्राथमिकता प्रदान करती है।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने इस प्रश्न पर विचार किया कि क्या 2008 के अधिनियम की धारा 16 के तहत फैमिली कोर्ट में लंबित कार्यवाही को ग्राम न्यायालय में स्थानांतरित किया जा सकता है। खंडपीठ ने टिप्पणी की कि हालांकि दोनों विशेष कानून हैं, लेकिन पहले “सामंजस्यपूर्ण व्याख्या” (Harmonious construction) के सिद्धांत को लागू किया जाना चाहिए।

हालांकि, हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि दो विशेष कानूनों के बीच तालमेल संभव न हो, तो बाद वाला अधिनियम ही प्रभावी माना जाएगा। कानूनी सिद्धांत “leges posteriores priores contrarias abrogant” का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

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“इसका मूल आधार विधायी मंशा में निहित है। यह माना जाता है कि विधायिका मौजूदा कानून से अवगत थी और उसने सचेत रूप से बाद के कानून को पिछले प्रावधानों को संशोधित करने, रद्द करने या उनके ऊपर प्रभावी होने के लिए बनाया है।”

खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के सॉलिडायर इंडिया लिमिटेड बनाम फेयरग्रोथ फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड (2001) मामले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि यदि दो विशेष कानूनों में ‘नॉन-ऑब्स्टांते’ (Non-obstante) क्लॉज हैं, तो बाद वाला कानून ही मान्य होगा।

अपीलीय मंचों के अंतर पर हाईकोर्ट ने कहा कि ग्राम न्यायालय नियमावली, 2009 की धारा 33 सत्र न्यायालय में अपील का प्रावधान करती है, और इसके बाद पीड़ित पक्ष अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है। बेंच ने कहा, “इसलिए, हर मामले में पार्टियों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए कानूनी परत मौजूद है।”

हाईकोर्ट ने इस बात पर भी बल दिया कि याचिकाकर्ताओं ने ग्राम न्यायालय अधिनियम की धाराओं 12, 16 या 18 की वैधता (Vires) को चुनौती नहीं दी थी। एडुकंती किस्तम्मा बनाम एस. वेंकटरेड्डी (2010) के फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया:

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“यह एक स्थापित कानूनी स्थिति है कि उस मूल वैधानिक प्रावधान को चुनौती दिए बिना, जिसके आधार पर आदेश पारित किया गया है, केवल परिणामी प्रशासनिक आदेश को चुनौती नहीं दी जा सकती।”

कोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि दोनों कानूनों के पीछे विधायी मंशा वादियों के लिए सुलभ न्यायिक मंच प्रदान करना था। कोर्ट ने माना कि फैमिली कोर्ट अधिनियम, 1984 के तहत गठित फैमिली कोर्ट से ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008 की धारा 16 के तहत ग्राम न्यायालयों में भरण-पोषण के मामलों का स्थानांतरण पूरी तरह वैध है।

खंडपीठ ने याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा, “प्रशासनिक आदेशों को मिली चुनौती तब तक विचारणीय नहीं है जब तक उस कानून की वैधता को चुनौती न दी जाए जिसके तहत ये आदेश पारित हुए हैं।”

मामले का विवरण

  • केस का नाम: सिविल कोर्ट बार एसोसिएशन और अन्य बनाम हाईकोर्ट इलाहाबाद और 3 अन्य
  • केस नंबर: रिट-सी नंबर 37/2026
  • बेंच: जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस स्वरूपमा चतुर्वेदी
  • दिनांक: 24 मार्च, 2026

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