इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि बलात्कार के मामलों में डीएनए (DNA) रिपोर्ट और विवादित दस्तावेजों की हैंडराइटिंग का विश्लेषण प्रभावी न्यायनिर्णयन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण साक्ष्य हैं। हाईकोर्ट ने पीड़िता की उस याचिका को स्वीकार कर लिया जिसमें आरोपी के डीएनए टेस्ट के जरिए बच्चे की पितृत्व पहचान की मांग की गई थी। साथ ही, कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को भी सही ठहराया जिसमें आरोपी को सहमति के अपने बचाव को साबित करने के लिए एक पत्र की हैंडराइटिंग एक्सपर्ट से जांच कराने की अनुमति दी गई थी।
यह फैसला जस्टिस मनोज बजाज ने तीन अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुनाया। इनमें से एक याचिका डीएनए टेस्ट खारिज होने के खिलाफ थी, दूसरी हैंडराइटिंग विश्लेषण की अनुमति के खिलाफ और तीसरी अतिरिक्त आरोपियों को समन करने से जुड़ी थी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला गाजियाबाद के कवि नगर थाने में साल 2018 में दर्ज केस क्राइम नंबर 188 से जुड़ा है। इसमें आरोपी शशि भूषण गुप्ता के खिलाफ आईपीसी की धारा 376 (रेप), 313 (महिला की सहमति के बिना गर्भपात) और 506 (आपराधिक धमकी) के तहत मामला दर्ज किया गया था।
पीड़िता का आरोप था कि आरोपी और उसके रिश्तेदारों ने 27 सितंबर 2015 को उसके घर में घुसकर जबरन बलात्कार किया। आरोपी ने शादी का झांसा दिया लेकिन बाद में 29 जुलाई 2016 को उसका जबरन गर्भपात करा दिया। आरोपों के अनुसार, आरोपी ने अश्लील वीडियो के जरिए डरा-धमकाकर शारीरिक संबंध जारी रखे, जिससे पीड़िता को दूसरी बार गर्भ ठहर गया और उसने एक बेटी को जन्म दिया। जांच के बाद चार्जशीट केवल मुख्य आरोपी शशि भूषण गुप्ता के खिलाफ दाखिल की गई थी।
पक्षकारों की दलीलें
याचिकाकर्ता-पीड़िता की ओर से: पीड़िता के वकील ने ट्रायल कोर्ट के 23 अक्टूबर 2024 के उस आदेश का विरोध किया जिसमें आरोपी के आवेदन (धारा 311 Cr.P.C.) को स्वीकार कर एक पत्र की हैंडराइटिंग जांच की अनुमति दी गई थी। उनका तर्क था कि जब पीड़िता ने जिरह के दौरान उस पत्र को लिखने से साफ इनकार कर दिया है, तो विशेषज्ञ जांच का आदेश नहीं दिया जाना चाहिए था।
डीएनए टेस्ट के मुद्दे पर, वकील ने 25 अगस्त 2022 के आदेश को चुनौती दी। ट्रायल कोर्ट ने यह कहते हुए टेस्ट की मांग खारिज कर दी थी कि जांच अधिकारी को इसके बारे में सूचित नहीं किया गया था और अब मुकदमा काफी आगे बढ़ चुका है।
आरोपी की ओर से: आरोपी के वकील ने तर्क दिया कि वह पत्र पीड़िता ने खुद लिखा था जो उसके साथ सहमति से संबंधों को साबित करता है। उन्होंने दलील दी कि यदि इस दस्तावेज की विशेषज्ञ जांच नहीं कराई गई, तो यह आरोपी के निष्पक्ष सुनवाई (Fair Trial) के अधिकार का उल्लंघन होगा। डीएनए टेस्ट के मुद्दे पर उन्होंने ट्रायल कोर्ट के फैसले का समर्थन किया।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
हैंडराइटिंग विश्लेषण पर: हाईकोर्ट ने पाया कि महज पीड़िता द्वारा पत्र से इनकार कर देना, आरोपी को अपना बचाव साबित करने के अधिकार से वंचित करने का आधार नहीं हो सकता। कोर्ट ने कहा:
“यदि आरोपी पीड़िता द्वारा लिखे गए कथित पत्र की हैंडराइटिंग की विशेषज्ञ से जांच कराकर सहमति (Consent) साबित करने का प्रयास कर रहा है, तो यह प्रभावी और उचित न्यायनिर्णयन के लिए साक्ष्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होगा।”
हाईकोर्ट ने आगे कहा कि इस आवेदन को खारिज करना आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार से वंचित करने जैसा होगा।
डीएनए टेस्ट पर: हाईकोर्ट ने डीएनए टेस्ट की मांग को खारिज करने के ट्रायल कोर्ट के कारणों—मुकदमे में देरी और जांच अधिकारी की चुप्पी—को तर्कहीन पाया। जस्टिस बजाज ने टिप्पणी की:
“डीएनए रिपोर्ट अभियोजन पक्ष के मामले पर सीधा प्रभाव डालने वाला एक महत्वपूर्ण साक्ष्य होगा। ट्रायल कोर्ट द्वारा दिया गया यह आधार कि मुकदमा उन्नत चरण में पहुंच गया है या जांच अधिकारी ने टेस्ट नहीं कराया था, इस प्रार्थना को खारिज करने का अच्छा आधार नहीं है।”
अंतिम निर्णय
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निम्नलिखित आदेश पारित किए:
- आवेदन U/S 528 BNSS No. 12417 of 2025: खारिज कर दिया गया। पत्र की हैंडराइटिंग जांच कराने का ट्रायल कोर्ट का आदेश बरकरार रहेगा।
- आवेदन U/S 482 No. 42067 of 2022: स्वीकार किया गया। हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि आरोपी को अपनी बेटी के डीएनए मिलान के लिए नमूने देने होंगे, जैसा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा निर्देशित किया जाएगा।
- क्रिमिनल रिवीजन No. 1738 of 2021: वापस लेने के आधार पर खारिज कर दी गई।
केस विवरण:
- केस का शीर्षक: पीड़िता बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
- केस संख्या: Application U/S 528 BNSS No. 12417 of 2025 (व अन्य संबद्ध मामले)
- जज: जस्टिस मनोज बजाज
- फैसले की तारीख: 2 अप्रैल, 2026

