‘तलाक’ की डिक्लेरेटरी डिक्री उस तारीख से प्रभावी मानी जाएगी जब तलाक दिया गया था; इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्नी को भरण-पोषण देने से इनकार करने वाला आदेश रद्द किया

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मोहम्मडन लॉ (मुस्लिम कानून) के तहत, तलाक की पुष्टि करने वाली अदालत की डिक्री आमतौर पर घोषणात्मक (डिक्लेरेटरी) प्रकृति की होती है और यह उस तारीख से तलाक की स्थिति को मान्यता देती है जिस दिन वह मूल रूप से दिया गया था। न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह ने प्रयागराज की फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें एक पत्नी के भरण-पोषण के दावे को इस आधार पर खारिज कर दिया गया था कि उसकी दूसरी शादी अवैध थी क्योंकि वह पहली शादी के तलाक की औपचारिक डिक्री आने से पहले हुई थी।

मामले की पृष्ठभूमि

पुनरीक्षणकर्ता (रिविजनिस्ट) ने फैमिली कोर्ट, प्रयागराज के 27 मई 2025 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें धारा 125 सीआरपीसी के तहत दो नाबालिग बेटों को तो भरण-पोषण मंजूर किया गया था, लेकिन पत्नी के आवेदन को खारिज कर दिया गया था।

पुनरीक्षणकर्ता का पहला विवाह 2002 में हुआ था। उनका दावा था कि उनके पहले पति ने 27 फरवरी 2005 को ही उन्हें तलाक दे दिया था। इसके बाद, उन्होंने एक घोषणात्मक वाद (डिक्लेरेटरी सूट) दायर किया, जिसमें 1 जनवरी 2013 को फैमिली कोर्ट ने 2005 के उस तलाक को वैध घोषित कर दिया। इस बीच, 27 मई 2012 को उन्होंने विपक्षी संख्या 2 के साथ निकाह कर लिया था, जिससे उनके दो बेटे हुए।

पक्षों की दलीलें

पुनरीक्षणकर्ता के वकील की दलील: पत्नी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने तर्क दिया कि 2012 का विवाह ‘इद्दत’ की अवधि पूरी होने के बाद और पति की जानकारी में हुआ था। यह दलील दी गई कि 2013 की अदालती डिक्री केवल घोषणात्मक थी और इसने केवल उस तलाक को मान्यता दी जो पहले ही हो चुका था। उन्होंने यह भी कहा कि धारा 125 सीआरपीसी एक कल्याणकारी प्रावधान है जिसका उद्देश्य बेसहारा होने से बचाना है, और इसे “अति-तकनीकी” आधारों पर विफल नहीं किया जाना चाहिए।

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विपक्षी संख्या 2 के वकील की दलील: पति के वकील ने तर्क दिया कि पहली शादी 8 जनवरी 2013 की डिक्री तक प्रभावी मानी जानी चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि पत्नी ने अपने पहले पति के खिलाफ चल रही भरण-पोषण की कार्यवाही को छुपाया और तर्क दिया कि चूंकि दूसरी शादी मई 2012 (2013 की डिक्री से पहले) हुई थी, इसलिए मुस्लिम कानून के तहत यह शादी शून्य (Void) थी।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने मोहम्मडन लॉ के तहत तलाक की डिक्री की प्रकृति का विश्लेषण करते हुए टिप्पणी की:

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“मोहम्मडन लॉ के तहत, जब एक पति तलाक देता है, तो तलाक उस तारीख से प्रभावी होता है जिस तारीख को तलाक दिया गया था, बशर्ते वह कानून के अनुसार वैध हो।”

अदालत ने न्यायिक प्रक्रिया की भूमिका स्पष्ट करते हुए कहा:

“यह स्थापित है कि जहां पति तलाक देता है और बाद में उसके संबंध में डिक्री लेने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाता है, वहां अदालत द्वारा पारित डिक्री आमतौर पर घोषणात्मक प्रकृति की होती है, जो केवल उस तलाक की स्थिति को मान्यता देती है या उसकी पुष्टि करती है जो पहले ही हो चुका था।”

हाईकोर्ट ने पाया कि ऐसी डिक्री फैसले की तारीख से कोई नया तलाक पैदा नहीं करती, बल्कि केवल यह घोषित करती है कि क्या तलाक पहले वैध रूप से दिया गया था। बेंच ने माना कि फैमिली कोर्ट ने डिक्री की तारीख को ही विवाह विच्छेद की तारीख मानकर गलती की, जिससे दूसरी शादी को अवैध ठहराने का निष्कर्ष गलत निकला।

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फैसला

हाईकोर्ट ने माना कि इस मामले में पुनर्विचार की आवश्यकता है ताकि 2005 में दिए गए तलाक के प्रभाव और बाद की घोषणात्मक डिक्री की प्रकृति की ठीक से जांच की जा सके।

अदालत ने विवादित आदेश को उस सीमा तक रद्द कर दिया जहां तक वह पत्नी के भरण-पोषण से संबंधित था और मामले को वापस फैमिली कोर्ट, प्रयागराज भेज दिया। फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया गया है कि वह गुण-दोष के आधार पर मामले का निस्तारण छह महीने के भीतर करे।

केस विवरण 

  • केस का शीर्षक: श्रीमती हुमैरा रियाज बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य
  • केस संख्या: क्रिमिनल रिविजन नंबर 3305/2025
  • बेंच: न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह
  • दिनांक: 10 मार्च, 2026

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