प्राइवेट बैंक द्वारा अवैध बर्खास्तगी की जांच कर सकता है सिविल कोर्ट, लेकिन बहाली संभव नहीं; हर्जाने के दावे के लिए मुकदमा बहाल: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि निजी बैंक के कर्मचारियों की बर्खास्तगी के मामलों में सिविल कोर्ट के पास हस्तक्षेप करने का अधिकार क्षेत्र (jurisdiction) है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि निजी क्षेत्र की संविदात्मक नियुक्तियों में अदालत कर्मचारी की सेवा में बहाली (reinstatement) का आदेश नहीं दे सकती, लेकिन यदि बर्खास्तगी अवैध पाई जाती है तो वह हर्जाने (damages) का हकदार हो सकता है।

यह आदेश जस्टिस संदीप जैन की पीठ ने पुनीत सचदेवा द्वारा दायर एक प्रथम अपील को स्वीकार करते हुए दिया। अपीलकर्ता ने इलाहाबाद के एडिशनल सिविल जज (सीनियर डिवीजन) द्वारा पारित उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें बैंक कर्मचारी के मूल वाद (O.S. No. 180/2015) को यह कहकर खारिज कर दिया गया था कि कोर्ट के पास इस मामले की सुनवाई का अधिकार नहीं है।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता पुनीत सचदेवा साल 2008 में इंडसइंड बैंक में शामिल हुए थे और जून 2011 में उन्हें इलाहाबाद शाखा का प्रबंधक बनाया गया था। उनके कार्यकाल के दौरान, बैंक में कार्यरत एक अधीनस्थ कर्मचारी सुचित्रा प्रजापति द्वारा लगभग ₹41 लाख के गबन का मामला सामने आया।

बैंक का आरोप था कि यह धोखाधड़ी अपीलकर्ता की “लचर निगरानी” और दैनिक रिपोर्टों की जांच में कोताही बरतने के कारण हुई। इस आधार पर बैंक ने सितंबर 2013 में उन्हें निलंबित कर दिया और विभागीय जांच के बाद मई 2014 में सेवा से बर्खास्त कर दिया। अपनी विभागीय अपील खारिज होने के बाद, अपीलकर्ता ने सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर कर बर्खास्तगी को शून्य घोषित करने, सेवा में बहाल करने और बकाया वेतन (back wages) दिलाने की मांग की थी।

ट्रायल कोर्ट ने जुलाई 2023 में इस आधार पर मुकदमा खारिज कर दिया कि ऑर्डर 39 रूल 2(2) CPC (उत्तर प्रदेश संशोधन) के तहत सेवा समाप्ति के आदेश पर रोक लगाने का अधिकार सिविल कोर्ट के पास नहीं है।

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पक्षों के तर्क

अपीलकर्ता के वकील का पक्ष: अधिवक्ता अंशुल कुमार सिंघल ने तर्क दिया कि इंडसइंड बैंक एक निजी संस्थान है और यह संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत ‘राज्य’ की श्रेणी में नहीं आता। इस कारण अपीलकर्ता हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर नहीं कर सकता था। उन्होंने दलील दी कि चूंकि सेवा की शर्तें वैधानिक (statutory) नहीं बल्कि निजी नियमों (Executive Staff Service Rules, 1994) से संचालित थीं, इसलिए सिविल कोर्ट ही न्याय पाने का एकमात्र मंच बचा था।

बैंक (प्रतिवादी) के वकील का पक्ष: बैंक की ओर से अधिवक्ता सौरभ राज श्रीवास्तव ने तर्क दिया कि बर्खास्तगी का आदेश अंतिम रूप ले चुका है और इसे सिविल कोर्ट द्वारा पलटा नहीं जा सकता। उन्होंने ‘स्पेसिफिक रिलीफ एक्ट’ की धारा 14 का हवाला देते हुए कहा कि व्यक्तिगत सेवा के अनुबंध को जबरन लागू नहीं कराया जा सकता। साथ ही, उन्होंने कहा कि यदि बर्खास्तगी गलत भी थी, तो भी वादी केवल हर्जाने की मांग कर सकता था, जो उसने शुरुआत में नहीं की थी।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने सरकारी और निजी सेवाओं के बीच अंतर को स्पष्ट किया। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया बनाम एस.एन. गोयल (2008) मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि केवल तीन विशेष परिस्थितियों में ही सेवा में बहाली संभव है:

  1. जब अनुच्छेद 311 के उल्लंघन में किसी लोक सेवक को हटाया गया हो।
  2. जब औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत किसी ‘वर्कमैन’ को हटाया गया हो।
  3. जब किसी वैधानिक निकाय (statutory body) ने नियमों का उल्लंघन कर बर्खास्तगी की हो।

कोर्ट ने अपने फैसले में टिप्पणी की:

“यह स्पष्ट है कि इस मामले में वादी निजी बैंक का कर्मचारी था और उसकी नियुक्ति पूरी तरह संविदात्मक थी। प्रतिवादी बैंक न तो अनुच्छेद 12 के तहत ‘राज्य’ की परिभाषा में आता है और न ही कर्मचारी की सेवा शर्तें किसी वैधानिक नियम के अधीन थीं।”

अधिकार क्षेत्र के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 9 के तहत सिविल कोर्ट के पास सभी नागरिक मामलों की सुनवाई का व्यापक अधिकार है, जब तक कि किसी कानून द्वारा उसे स्पष्ट रूप से रोका न गया हो। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने यूपी संशोधन की गलत व्याख्या की। हालांकि कोर्ट बर्खास्तगी पर रोक (stay) नहीं लगा सकता, लेकिन वह इस बात की जांच जरूर कर सकता है कि बर्खास्तगी कानूनन सही थी या नहीं।

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कोर्ट ने आगे कहा:

“यह सच है कि उसे बैंक की सेवा में बहाल नहीं किया जा सकता और उसका एकमात्र उपाय बैंक से हर्जाने की मांग करना है, जिसके लिए सिविल कोर्ट के पास अधिकार क्षेत्र है।”

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा हर्जाने के दावे से संबंधित संशोधन आवेदन को लंबित रखने पर भी नाराजगी जताई और इसे “ट्रायल कोर्ट की लापरवाही” करार दिया।

कोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए निचली अदालत का 10 जुलाई 2023 का फैसला रद्द कर दिया और मूल वाद को उसके मूल नंबर पर बहाल कर दिया। कोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट के पास इस मामले की सुनवाई का पूरा अधिकार है।

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह छह महीने के भीतर इस मामले का गुण-दोष के आधार पर निपटारा करे और यह तय करे कि क्या बर्खास्तगी अवैध थी और क्या वादी हर्जाना पाने का हकदार है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने बर्खास्तगी की वैधता पर अपनी ओर से कोई राय व्यक्त नहीं की है।

केस विवरण:

  • केस शीर्षक: श्री पुनीत सचदेवा बनाम इंडसइंड बैंक और 3 अन्य
  • केस संख्या: फर्स्ट अपील नंबर 273 ऑफ 2026
  • पीठ: जस्टिस संदीप जैन
  • फैसले की तिथि: 7 अप्रैल, 2026

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