इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 02 अप्रैल, 2026 को दिए गए एक महत्वपूर्ण फैसले में चकबंदी उप-संचालक (D.D.C.) के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसके माध्यम से छिटपुट और विवादित राजस्व प्रविष्टियों के आधार पर एक दावेदार को सीरदारी अधिकार दिए गए थे। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि रिविजनल अथॉरिटी ने प्रतिकूल कब्जे (Adverse Possession) के बुनियादी तत्वों को स्थापित किए बिना, तथ्यों के समवर्ती निष्कर्षों (Concurrent Findings) में हस्तक्षेप करने में कानूनी त्रुटि की है।
पिछले चार दशकों से लंबित इस रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी ने कहा कि D.D.C. ने चकबंदी अधिकारी (C.O.) और बंदोबस्त अधिकारी चकबंदी (S.O.C.) के सुविचारित आदेशों में “बहुत ही हल्के ढंग से” हस्तक्षेप किया था।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद आजमगढ़ जिले के हरैया गांव के प्लॉट नंबर 1100, 4643, 1072, 3275 और 883 से संबंधित था। मूल वर्ष के राजस्व रिकॉर्ड में ये भूखंड वर्तमान याचिकाकर्ता डी.बी. उपाध्याय के पूर्वजों, राधे किशुन उपाध्याय और श्रीधर उपाध्याय के नाम दर्ज थे।
विपक्षी प्रतिवादी (खरभान) ने यू.पी. जोत चकबंदी अधिनियम, 1953 की धारा 9A(2) के तहत आपत्ति दर्ज करते हुए 1356-फसली और 1359-फसली की राजस्व प्रविष्टियों के आधार पर अधिवासी और बाद में सीरदार अधिकार होने का दावा किया था। चकबंदी अधिकारी ने 1971 में इन आपत्तियों को खारिज कर दिया था, जिसे S.O.C. ने भी बरकरार रखा। हालांकि, D.D.C. ने अक्टूबर 1971 में प्रतिवादी की निगरानी (Revision) को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया, जिसके खिलाफ 1982 में यह रिट याचिका दायर की गई थी।
पक्षों के तर्क
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री दुर्गेश कुमार सिंह और श्री विष्णु सिंह ने तर्क दिया कि:
- D.D.C. ने तथ्यों के समवर्ती निष्कर्षों को पलटकर अपने पुनरीक्षण अधिकार क्षेत्र (Revisional Jurisdiction) का उल्लंघन किया है।
- प्रतिवादी के पक्ष में जो प्रविष्टियां थीं, वे ‘शिकमी काश्तकार’ (उप-किरायेदार) के रूप में थीं, जिसमें ‘बटई निस्फी’ का नोट था, जो प्रतिकूल कब्जे के बजाय ‘अनुमति प्राप्त कब्जे’ (Permissive Possession) को दर्शाता है।
- चकबंदी शुरू होने से कम से कम दस साल पहले तक राजस्व रिकॉर्ड में प्रतिवादी का नाम कहीं भी दर्ज नहीं था।
विपक्षी प्रतिवादी की ओर से श्री चंद्रजीत यादव और उपेंद्र नाथ यादव ने दलील दी कि:
- कई वर्षों तक उनके नाम की प्रविष्टियां प्रतिकूल कब्जे को साबित करती हैं।
- याचिकाकर्ताओं ने उन्हें बेदखल करने के लिए कभी कोई कानूनी कदम नहीं उठाया।
- 1356-फसली और 1359-फसली में नाम दर्ज होने के आधार पर प्रतिवादी कानूनी रूप से अधिवासी और सीरदार बन गए थे।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि प्रतिकूल कब्जे (Adverse Possession) के दावे को सफल बनाने के लिए दावेदार को यह साबित करना अनिवार्य है कि उसका कब्जा “शांतिपूर्ण, खुला और निरंतर” था और वह nec vi, nec clam, and nec precario की शर्तों को पूरा करता था।
न्यायमूर्ति शमशेरी ने टिप्पणी की:
“प्रतिकूल कब्जे को साबित करने के लिए बुनियादी तत्वों में से एक यह है कि दावा पेश करने से पहले कम से कम 12 वर्षों तक शत्रुतापूर्ण कब्जा (Hostile Possession) निरंतर बना रहना चाहिए, लेकिन निर्विवाद राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर यह पूरी तरह से गायब था।”
हाईकोर्ट ने पाया कि D.D.C. ने महत्वपूर्ण सबूतों की अनदेखी की:
- प्रविष्टि की प्रकृति: रिकॉर्ड में ‘बटई निस्फी’ के साथ ‘शिकमी काश्तकार’ दर्ज होना ‘अनुमति प्राप्त कब्जा’ था, न कि प्रतिकूल कब्जा।
- निरंतरता का अभाव: राजस्व रिकॉर्ड से पता चला कि 1365-फसली और उसके बाद के वर्षों में प्रतिवादी का नाम या तो काट दिया गया था या मौजूद नहीं था।
- क्षेत्राधिकार की त्रुटि: D.D.C. ने प्रविष्टियों के दर्ज होने के तरीके पर विचार नहीं किया और रिकॉर्ड के बजाय धारणाओं के आधार पर फैसला सुनाया।
सुप्रीम कोर्ट के बचन बनाम कंकर (1972) मामले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने नोट किया कि “जो प्रविष्टियां वास्तविक नहीं हैं, वे अधिवासी अधिकार प्रदान नहीं कर सकतीं।” कोर्ट ने विश्व विजय भारती बनाम फखरुल हसन (1976) का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि यद्यपि राजस्व रिकॉर्ड को उनके अंकित मूल्य पर स्वीकार किया जाना चाहिए, लेकिन “सत्यता का अनुमान केवल वास्तविक प्रविष्टियों पर लागू हो सकता है, न कि जालसाजी या धोखाधड़ी से की गई प्रविष्टियों पर।”
कोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि D.D.C. का हस्तक्षेप “कानूनी रूप से अस्थिर” था। कोर्ट ने चकबंदी अधिकारी के विस्तृत निष्कर्षों को बरकरार रखा, जिन्होंने पाया था कि चकबंदी से दस साल पहले तक प्रतिवादी के कब्जे का कोई सबूत नहीं था।
हाईकोर्ट ने चकबंदी उप-संचालक (D.D.C.) द्वारा 26 अक्टूबर, 1971 और 17 सितंबर, 1982 को पारित आदेशों को रद्द कर दिया। चकबंदी अधिकारी और बंदोबस्त अधिकारी चकबंदी के फैसलों को बहाल किया गया और रिट याचिका स्वीकार कर ली गई।
मामले का विवरण
केस का नाम: डी.बी. उपाध्याय बनाम डी.डी.सी. और अन्य
केस नंबर: रिट बी संख्या 12565/1982
पीठ: न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी
तारीख: 02 अप्रैल, 2026

