इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक ऐतिहासिक और सख्त निर्णय में दो याचिकाकर्ताओं पर कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग करने और झूठी याचिका, आवश्यक तथ्यों को छिपाने एवं बार-बार कानूनी रुख बदलने के लिए ₹25 लाख का दंड लगाया है। न्यायमूर्ति संगीता चंद्रा ने कहा कि किसी संवैधानिक न्यायालय से आवश्यक तथ्य छिपाना “न्यायालय के साथ धोखे” के समान है, और ऐसे कृत्य पर कठोर न्यायिक प्रतिक्रिया अनिवार्य है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला एक संपत्ति विवाद से जुड़ा है, जो SARFAESI अधिनियम, 2002 के तहत ऋण वसूली की प्रक्रिया से उत्पन्न हुआ।
याचिकाकर्ता सुनीता निषाद और उनके पति ओमप्रकाश के पास इंदिरा नगर विस्तार योजना, लखनऊ में मकान संख्या 13/88 था, जिसे उन्होंने ₹29.5 लाख के आवास ऋण के लिए बैंक ऑफ बड़ौदा के पास गिरवी रखा था।

बाद में, ओमप्रकाश के भाई जय प्रकाश ने “कामधेनु डेयरी योजना” के तहत ₹90 लाख का व्यवसायिक ऋण लिया, जिसके लिए उसी मकान को गिरवी बढ़ाकर इस्तेमाल किया गया।
जय प्रकाश द्वारा ऋण चुकता न करने पर बैंक ने SARFAESI की प्रक्रिया के तहत संपत्ति को नीलाम कर दिया। याचिकाकर्ता DRT पहुँचे, जहां नोटिस न भेजने के आधार पर फैसला उनके पक्ष में गया। लेकिन DRAT ने अपील में बैंक के पक्ष में फैसला दिया और नीलामी को वैध ठहराया।
इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में DRAT के फैसले को चुनौती दी, यह दावा करते हुए कि उन्होंने जय प्रकाश के ऋण के लिए कोई गारंटी नहीं दी और बैंक ने उनके मकान को बिना अनुमति के गिरवी रख दिया।
मुख्य कानूनी प्रश्न
- क्या याचिकाकर्ता वास्तव में गारंटर थे और क्या उन्होंने अपने मकान को गिरवी रखने की सहमति दी थी?
- क्या SARFAESI अधिनियम की धारा 13(2) के तहत नोटिस की सेवा वैध थी, जबकि डाक रसीद में नाम में मामूली त्रुटि थी?
- क्या नीलामी सूचना में ऋण भार (encumbrance) न बताना बिक्री को अवैध बनाता है?
- क्या बार-बार विरोधाभासी याचिकाएँ दायर करना न्यायालय के साथ धोखे के समान है?
न्यायालय के मुख्य अवलोकन
न्यायमूर्ति संगीता चंद्रा ने दस्तावेजों और पहले की कार्यवाहियों की गहराई से समीक्षा करते हुए पाया कि याचिकाकर्ताओं ने जानबूझकर महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए और वर्षों तक विरोधाभासी कानूनी रुख अपनाया:
“न्यायालय पाता है कि याचिकाकर्ताओं ने झूठ और भ्रामक तथ्यों का सहारा लिया… उन्होंने साफ नीयत से न्यायालय की शरण नहीं ली।”
नोटिस की सेवा पर:
“डाक रसीद में नाम की मामूली टाइपिंग त्रुटि (‘सविता’ के स्थान पर ‘सुनीता’) सेवा को अमान्य नहीं बनाती। नोटिस सही पते पर भेजा गया और वापस नहीं लौटा। सामान्य खंड अधिनियम की धारा 27 के तहत सेवा पूर्ण मानी जाएगी।”
गारंटी और गिरवी पर:
“याचिकाकर्ताओं ने स्वयं गिरवी बढ़ाने वाले दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए हैं… वे अब मुकर नहीं सकते कि उन्होंने कभी ऐसा नहीं किया।”
विरोधाभासी याचिकाओं पर:
“न्यायालय की प्रक्रिया कोई शतरंज का खेल नहीं है, जहां वादी अपनी सुविधा अनुसार तथ्य बदलता रहे। न्यायालय को झूठे और साजिशी मुकदमों के परीक्षण स्थल की तरह उपयोग नहीं किया जा सकता।”
न्यायालय का निर्णय
हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए ₹25 लाख का जुर्माना लगाया, जिसे दो भागों में विभाजित किया गया:
- ₹15 लाख — ममता यादव (नीलामी खरीदार) को, जिन्होंने 2017 में मकान की पूरी कीमत अदा कर दी थी लेकिन याचिकाकर्ताओं की वजह से सात वर्षों से कब्जा नहीं पा सकीं।
- ₹10 लाख — उत्तर प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (UPSLSA) में जमा करने का आदेश।
न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं का यह तर्क अस्वीकार कर दिया कि वे गिरवी या गारंटी के बारे में अनजान थे या उन पर दबाव डाला गया था। DRAT द्वारा नीलामी को वैध ठहराने और ममता यादव को बिक्री प्रमाणपत्र जारी करने को भी न्यायालय ने सही माना।
“इस प्रकार का आचरण न्यायालय के साथ धोखा है, और न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा बनाए रखने के लिए इसे दंडित करना आवश्यक है,” — न्यायमूर्ति संगीता चंद्रा ने कहा।
मामले का विवरण
- मामले का शीर्षक: सुनीता निषाद व अन्य बनाम ऋण वसूली अपीलीय अधिकरण व अन्य
- मामला संख्या: रिट-सिविल संख्या 35050/2019
- निर्णय सुरक्षित: 5 नवम्बर 2024
- निर्णय सुनाया गया: 1 अप्रैल 2025
- न्यूट्रल सिटेशन: 2025:AHC-LKO:17786
- पीठ: न्यायमूर्ति संगीता चंद्रा
याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता: सुशील कुमार, अभियुदय प्रताप सिंह, अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी, मीनाक्षी सिंह परिहार, राकेश चंद्र तिवारी
प्रत्युत्तर पक्ष के अधिवक्ता: प्रशांत के. श्रीवास्तव, राकेश पाल, पी.सी. चौहान, रमेश चंद्र, एस.सी. तिवारी, विद्या कांत शर्मा
नीलामी खरीदार के अधिवक्ता: शैलेन्द्र सिंह राजावत