कानूनी रूप से वसूली योग्य कर्ज की धारणा गलत साबित होने पर चेक बाउंस मामले में दोषसिद्धि बरकरार नहीं रह सकती: कर्नाटक हाईकोर्ट

कर्नाटक हाईकोर्ट ने 10 लाख रुपये के चेक बाउंस मामले में एक व्यक्ति की दोषसिद्धि रद्द करते हुए कहा है कि जब आरोपी शिकायतकर्ता की जिरह के माध्यम से कानूनी रूप से वसूली योग्य कर्ज की वैधानिक धारणा को गलत साबित कर देता है, तो नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 की धारा 138 के तहत दोषसिद्धि बरकरार नहीं रखी जा सकती।

जस्टिस गीता के.बी. ने पाया कि आरोपी ने शिकायतकर्ता की जिरह के जरिए अधिनियम की धारा 118 और 139 के तहत लागू वैधानिक धारणाओं का खंडन कर दिया था। ट्रायल कोर्ट और अपीलीय अदालत शिकायतकर्ता की आर्थिक क्षमता से संबंधित साक्ष्यों का उचित परीक्षण करने में विफल रही थीं। हाईकोर्ट ने दोनों अदालतों के फैसले रद्द करते हुए आरोपी को बरी कर दिया।

क्या था मामला?

शिकायतकर्ता का दावा था कि आरोपी उसका पारिवारिक मित्र था और डाकघर में काम करता था। आरोपी ने 10 सितंबर 2021 को उससे 10 लाख रुपये उधार मांगे थे।

शिकायतकर्ता के अनुसार, उसने 25 सितंबर 2021 को आरोपी को 10 लाख रुपये नकद दिए थे। इसके बदले आरोपी ने कावेरी ग्रामीण बैंक की कुलकुंटे शाखा का 20 दिसंबर 2021 की तारीख वाला चेक दिया था।

बैंक में प्रस्तुत किए जाने पर चेक अपर्याप्त धनराशि (Insufficient Funds) के कारण बाउंस हो गया।

इसके बाद शिकायतकर्ता ने 6 जनवरी 2022 को कानूनी नोटिस भेजा। आरोपी के घर के पते पर भेजा गया नोटिस बिना प्राप्त किए वापस आ गया, जबकि कार्यालय के पते पर भेजे गए नोटिस पर पता अपर्याप्त होने की टिप्पणी थी।

चिंतामणि के प्रधान सिविल जज एवं JMFC ने 5 सितंबर 2023 को आरोपी को दोषी ठहराया।

इसके बाद चिक्कबल्लापुर के द्वितीय अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने चिंतामणि में 9 सितंबर 2024 को दोषसिद्धि की पुष्टि कर दी।

इन फैसलों के खिलाफ आरोपी ने कर्नाटक हाईकोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दाखिल की।

आरोपी ने कहा, शिकायतकर्ता से कोई परिचय नहीं था

आरोपी की ओर से एडवोकेट राघवेंद्र के. ने दलील दी कि शिकायतकर्ता उनके मुवक्किल के लिए पूरी तरह अपरिचित व्यक्ति था।

उन्होंने बताया कि आरोपी की चेकबुक और पासबुक खो गई थीं। इस संबंध में आरोपी ने 22 जून 2020 को पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी, जिसे साक्ष्य Ex.D.2 के रूप में पेश किया गया।

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आरोपी ने 2 नवंबर 2020 को अपने बैंक को चेक का भुगतान रोकने के लिए पत्र भी दिया था, जिसे Ex.D.1 के रूप में प्रस्तुत किया गया। ये दोनों घटनाएं कथित कर्ज देने की तारीख से पहले की थीं।

आरोपी के वकील ने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता की मासिक आय केवल 40,000 से 50,000 रुपये थी। उसने यह साबित करने के लिए कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया कि उसके पास 10 लाख रुपये उधार देने की आर्थिक क्षमता थी।

दूसरी ओर, शिकायतकर्ता की ओर से एडवोकेट सैयद जहीरुद्दीन बरीद ने कहा कि आरोपी द्वारा पेश किए गए Ex.D.1 और Ex.D.2 दस्तावेज मनगढ़ंत थे।

उन्होंने दोनों दस्तावेजों के बीच पांच महीने के अंतर का उल्लेख किया।

शिकायतकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि बैंक के मेमो में चेक बाउंस होने का कारण अपर्याप्त धनराशि बताया गया था, न कि चेक ब्लॉक होना।

इसके अलावा, आरोपी ने अपने दावों को साबित करने के लिए न तो बैंक मैनेजर और न ही किसी पुलिस अधिकारी को गवाह के रूप में पेश किया था।

पुनरीक्षण में हाईकोर्ट के हस्तक्षेप की सीमाएं

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कुंटेगौड़ा बनाम थुरुबैया, 2026 SCC OnLine SC 1485 के फैसले का हवाला दिया।

कोर्ट ने कहा कि पुनरीक्षण अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप तभी किया जा सकता है, जब निचली अदालतों के निष्कर्ष स्पष्ट रूप से गलत या गंभीर त्रुटिपूर्ण हों, अप्रासंगिक सामग्री पर आधारित हों अथवा महत्वपूर्ण साक्ष्यों की अनदेखी की गई हो।

शिकायतकर्ता की जिरह से कर्ज के दावे पर उठे सवाल

हाईकोर्ट ने पाया कि चेक प्रस्तुत करने, उसके बाउंस होने, कानूनी नोटिस और भुगतान नहीं किए जाने से संबंधित धारा 138 की आवश्यक शर्तें पूरी हुई थीं।

इस कारण शिकायतकर्ता के पक्ष में धारा 118 और 139 के तहत वैधानिक धारणाएं लागू होती थीं। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन धारणाओं का खंडन किया जा सकता है।

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शिकायतकर्ता की जिरह का परीक्षण करते हुए कोर्ट ने पाया कि वह यह नहीं बता सका कि आरोपी से उसका परिचय कैसे हुआ था।

शिकायतकर्ता ने दावा किया था कि उसकी मुलाकात आरोपी से आनंद नाम के व्यक्ति के माध्यम से हुई थी, लेकिन उसने आनंद को गवाह के रूप में पेश नहीं किया।

उसने आरोपी से कथित फोन पर बातचीत का कोई रिकॉर्ड भी प्रस्तुत नहीं किया।

कोर्ट ने शिकायतकर्ता के बयानों में विरोधाभास भी पाया। पहले उसने कहा था कि आरोपी कभी उसके घर नहीं आया, लेकिन बाद में कहा कि उसने अपने घर पर ही आरोपी को पैसे दिए थे।

शिकायतकर्ता यह भी नहीं बता सका कि आरोपी संविदा कर्मचारी था या नहीं।

इस पर हाईकोर्ट ने टिप्पणी की,

“इससे पता चलता है कि आरोपी की नौकरी की प्रकृति जाने बिना उसे 10 लाख रुपये उधार देने का दावा विश्वास करने योग्य नहीं है।”

चेकबुक खोने की शिकायत को हाईकोर्ट ने माना साबित

कोर्ट ने पाया कि आरोपी द्वारा चेकबुक खोने के संबंध में बैंक और पुलिस में शिकायत किए जाने का तथ्य स्थापित हो गया था।

हाईकोर्ट ने कहा,

“आरोपी से एक भी ऐसा सवाल नहीं किया गया, जिसमें इस बात से इनकार किया गया हो कि उसने बैंक और पुलिस स्टेशन में ऐसी शिकायतें दर्ज कराई थीं।”

कोर्ट ने यह भी पाया कि विवादित चेक उन चेकों में शामिल था, जिनका विवरण आरोपी ने Ex.D.1 में दिया था।

हाईकोर्ट ने भारतीय रिजर्व बैंक के दिशानिर्देशों और आयकर अधिनियम, 1961 का भी उल्लेख किया।

कोर्ट ने कहा कि इन प्रावधानों के अनुसार, दो लाख रुपये से अधिक के लेनदेन बैंक के माध्यम से किए जाने चाहिए, जबकि शिकायतकर्ता का दावा था कि उसने पूरे 10 लाख रुपये नकद उधार दिए थे।

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आर्थिक क्षमता पर सवाल उठने के बाद शिकायतकर्ता को साक्ष्य देना जरूरी

हाईकोर्ट ने शिकायतकर्ता की आर्थिक क्षमता के मुद्दे पर कहा कि केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं है कि शिकायतकर्ता के पास पैसे उधार देने की क्षमता नहीं थी।

कोर्ट ने टिप्पणी की,

“केवल आर्थिक क्षमता से इनकार करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह साबित करने के लिए कुछ ठोस साक्ष्य प्रस्तुत किए जाने चाहिए कि शिकायतकर्ता के पास 10 लाख रुपये उधार देने की आर्थिक क्षमता नहीं थी। वर्तमान मामले में शिकायतकर्ता की जिरह के माध्यम से यह बात स्थापित की गई है।”

हाईकोर्ट ने आगे कहा,

“उधार लेने वाले की आर्थिक क्षमता जाने बिना कोई भी व्यक्ति पैसा उधार नहीं देगा।”

कोर्ट ने पाया कि आरोपी द्वारा वैधानिक धारणाओं का खंडन किए जाने के बाद शिकायतकर्ता ने अपने दावे के समर्थन में कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया।

निचली अदालतों के फैसलों पर टिप्पणी करते हुए हाईकोर्ट ने कहा,

“निचली अदालतों ने शिकायतकर्ता की आर्थिक क्षमता और आरोपी की नौकरी की प्रकृति के संबंध में शिकायतकर्ता की जिरह से सामने आए साक्ष्यों का गंभीर रूप से परीक्षण नहीं किया।”

हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि रद्द कर आरोपी को बरी किया

जस्टिस गीता के.बी. ने पाया कि आरोपी शिकायतकर्ता की जिरह और प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर धारा 118 और 139 के तहत लागू वैधानिक धारणाओं का सफलतापूर्वक खंडन करने में सफल रहा।

हाईकोर्ट ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट और अपीलीय अदालत के दोषसिद्धि तथा सजा संबंधी आदेश रद्द कर दिए।

कोर्ट ने आरोपी को बरी करते हुए निर्देश दिया कि यदि कोई धनराशि जमा है, तो उचित पहचान के बाद उसे आरोपी को वापस कर दिया जाए।

केस डिटेल्स

केस टाइटल: श्री मुनिराजू बनाम श्री एस. देवराज

केस नंबर: आपराधिक पुनरीक्षण याचिका संख्या 1600/2024

बेंच: जस्टिस गीता के.बी.

फैसले की तारीख: 17 अक्टूबर 2026

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