घरेलू हिंसा के स्पष्ट आरोप होने पर धारा 482 CrPC के तहत कार्यवाही रद्द नहीं की जा सकती: कर्नाटक हाईकोर्ट

कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा है कि जब घरेलू हिंसा की शिकायत में पति के खिलाफ स्पष्ट और विशिष्ट आरोप लगाए गए हों, तो सीआरपीसी की धारा 482 के तहत कार्यवाही रद्द नहीं की जा सकती। घरेलू हिंसा हुई थी या नहीं, इसका निर्धारण ट्रायल के दौरान किया जाना चाहिए।

जस्टिस एच.पी. संदेश ने टोरंटो में रहने वाले एक पति की आपराधिक याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। पति ने अपनी पत्नी द्वारा घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 (DV Act) के तहत शुरू की गई कार्यवाही को रद्द करने की मांग की थी। यह मामला बेंगलुरु की पांचवीं मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट ट्रैफिक कोर्ट (V MMTC) में लंबित था।

क्या था मामला?

पति-पत्नी की शादी 6 दिसंबर 2013 को हुई थी। शादी के बाद पत्नी शुरुआत में बेंगलुरु में अपने ससुराल वालों के साथ रही। बाद में आवश्यक व्यवस्था होने पर वह अपने पति के पास कनाडा के टोरंटो चली गई।

वर्ष 2016 में पत्नी भारत लौट आई।

इसके बाद उसने घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 के तहत याचिका दाखिल की। इसमें धारा 18 के तहत संरक्षण आदेश, धारा 19 के तहत निवास संबंधी आदेश, धारा 20 के तहत आर्थिक राहत और धारा 22 के तहत मुआवजे की मांग की गई थी।

शुरुआत में इस याचिका में पांच लोगों को प्रतिवादी बनाया गया था। बाद में दो लोगों के नाम हटा दिए गए और पति तथा उसके माता-पिता प्रतिवादी बने रहे।

पत्नी ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 9 के तहत वैवाहिक संबंधों की पुनर्स्थापना के लिए भी याचिका दाखिल की थी। इस मामले में 3 नवंबर 2018 को उसके पक्ष में डिक्री पारित हुई थी।

पति ने घरेलू हिंसा की शिकायत को परेशान करने का जरिया बताया

पति की ओर से सीनियर एडवोकेट एस.पी. शंकर और एडवोकेट ममता जी. कुलकर्णी ने दलील दी कि घरेलू हिंसा की शिकायत केवल याचिकाकर्ता को परेशान करने के उद्देश्य से दाखिल की गई थी।

उन्होंने कहा कि पत्नी अप्रैल 2016 में भारत लौट आई थी, लेकिन उसने अगस्त 2017 में, यानी लगभग एक वर्ष चार महीने बाद, घरेलू हिंसा की याचिका दाखिल की।

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पति ने तर्क दिया कि शिकायत सीआरपीसी की धारा 468 के तहत परिसीमा अवधि (Limitation) से बाधित थी। देरी माफ कराने के लिए धारा 473 के तहत कोई आवेदन भी दाखिल नहीं किया गया था।

इसके अलावा, उन्होंने कहा कि शिकायत में घरेलू हिंसा की घटनाओं का कोई विवरण नहीं दिया गया था।

पति की दलील थी कि जब वह टोरंटो में रह रहा था, तो घरेलू हिंसा का सवाल ही नहीं उठता। उन्होंने यह भी कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत याचिका स्वीकार होने के बाद भी पत्नी उनके पास नहीं आई।

अपनी दलीलों के समर्थन में उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट के सेजल धर्मेश वेद बनाम महाराष्ट्र राज्य, सुप्रीम कोर्ट के सारा मैथ्यू बनाम इंस्टीट्यूट ऑफ कार्डियो वैस्कुलर डिजीज और कर्नाटक हाईकोर्ट के मारेप्पा एवं अन्य बनाम पुष्पांजलि सहित अन्य फैसलों का हवाला दिया।

पत्नी ने कहा, अलग रहने के लिए मजबूर किया गया

पत्नी की ओर से एडवोकेट सिजी मलयिल की तरफ से एडवोकेट श्रेया एस. कुमार पेश हुईं।

उन्होंने कहा कि पत्नी ने अपने पति को छोड़ा नहीं था, बल्कि परिस्थितियों के कारण उसे अलग रहने के लिए मजबूर होना पड़ा।

उन्होंने घरेलू हिंसा की याचिका के पैराग्राफ 18 का हवाला देते हुए कहा कि इसमें प्रत्येक प्रतिवादी के खिलाफ विशिष्ट आरोप लगाए गए हैं।

हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत पारित डिक्री के संबंध में उन्होंने कहा कि पत्नी को 17 नवंबर 2018 की यात्रा के लिए टिकट केवल 15 नवंबर 2018 को दिए गए थे। इसके अलावा, उसे यात्रा के लिए वीजा की भी आवश्यकता थी।

पत्नी की ओर से यह भी दलील दी गई कि सीआरपीसी की धारा 468 इस मामले में लागू नहीं होती, क्योंकि घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 18, 19, 20 और 22 के तहत मांगी गई राहतें आपराधिक अभियोजन से संबंधित नहीं थीं।

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उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के शौरभ कुमार त्रिपाठी बनाम विधि रावल फैसले पर भरोसा किया।

धारा 482 के तहत विवादित तथ्यों की जांच नहीं की जा सकती

हाईकोर्ट ने पति-पत्नी के बीच यात्रा टिकटों और पत्नी को वापस ले जाने के लिए पति द्वारा किए गए प्रयासों से संबंधित विवादों पर विचार किया।

कोर्ट ने कहा कि इन तथ्यों की जांच वर्तमान कार्यवाही में नहीं की जा सकती।

जस्टिस संदेश ने टिप्पणी की,

“ये ऐसे मुद्दे हैं जिन पर सीआरपीसी की धारा 482 के तहत दाखिल याचिका में विचार नहीं किया जा सकता।”

परिसीमा अवधि से संबंधित आपत्ति पर कोर्ट ने कहा,

“यह मामला परिसीमा अवधि से बाधित है या नहीं, यह भी तथ्य और कानून का मिश्रित प्रश्न है।”

कोर्ट ने पति की उस दलील को भी अस्वीकार कर दिया कि घरेलू हिंसा की शिकायत में कोई स्पष्ट आरोप नहीं लगाया गया था।

हाईकोर्ट ने पाया कि शिकायत के पैराग्राफ 18 में विशिष्ट आरोप दर्ज थे।

कोर्ट ने मारेप्पा मामले से वर्तमान मामले को अलग बताते हुए कहा कि उस मामले में केवल सामान्य और व्यापक आरोप लगाए गए थे, जबकि वर्तमान मामले में याचिकाकर्ता के खिलाफ स्पष्ट आरोप मौजूद हैं।

घरेलू हिंसा हुई या नहीं, इसका फैसला ट्रायल में होगा

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के शौरभ कुमार त्रिपाठी बनाम विधि रावल फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि सीआरपीसी की धारा 482 के तहत अधिकारों का इस्तेमाल करते समय हाईकोर्ट को अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि इस प्रावधान के तहत हस्तक्षेप केवल तभी किया जा सकता है, जब अन्याय या अवैधता पाई जाए। वर्तमान मामले में ऐसी कोई स्थिति सामने नहीं आई।

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जस्टिस संदेश ने स्पष्ट किया,

“वर्तमान मामले में घरेलू हिंसा हुई थी या नहीं, यह ट्रायल का विषय है।”

कोर्ट ने माना कि शिकायत में लगाए गए आरोपों की सत्यता का निर्धारण साक्ष्यों के आधार पर किया जाना चाहिए।

घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 की कार्यवाही पर भी विचार

हाईकोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के अरुल डेनियल एवं अन्य बनाम सुगन्या फैसले पर भी भरोसा किया।

इस फैसले में कहा गया था कि घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 के तहत शुरू की गई कार्यवाही को चुनौती देने के लिए सीआरपीसी की धारा 482 के तहत याचिका सुनवाई योग्य नहीं है।

कोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट की समकक्ष बेंच के ओलिवर मेनेजेस बनाम सेरिटा थेरेसी मैथियास फैसले का भी उल्लेख किया।

उस फैसले में इस कानूनी सिद्धांत का सहारा लिया गया था कि,

“अधिनियम के अध्याय IV के तहत होने वाली कार्यवाही के उद्देश्य से मजिस्ट्रेट को आपराधिक अदालत नहीं माना जाता।”

हाईकोर्ट ने पति की याचिका खारिज की

सभी तथ्यों और कानूनी प्रावधानों पर विचार करने के बाद कर्नाटक हाईकोर्ट ने पाया कि पति सीआरपीसी की धारा 482 के तहत हस्तक्षेप करने का कोई आधार स्थापित नहीं कर सका।

जस्टिस एच.पी. संदेश ने घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत लंबित कार्यवाही को रद्द करने से इनकार करते हुए आपराधिक याचिका खारिज कर दी।

केस डिटेल्स

केस टाइटल: सबुज पॉल बनाम अर्पिता दासगुप्ता एवं अन्य

केस नंबर: आपराधिक याचिका संख्या 7018/2019

बेंच: जस्टिस एच.पी. संदेश

फैसले की तारीख: 17 अक्टूबर 2026

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