बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा है कि कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) किसी छूट प्राप्त संस्थान के प्रोविडेंट फंड ट्रस्ट के नियमों का हवाला देकर अधिक वेतन के आधार पर पेंशन प्राप्त करने के लिए दिए गए संयुक्त विकल्प (Joint Option) को खारिज नहीं कर सकता। यदि ट्रस्ट के नियमों में नियोक्ता के अंशदान की अधिकतम सीमा तय है या अधिक पेंशन के लिए अंशदान का प्रावधान नहीं है, तब भी इस आधार पर कर्मचारी का आवेदन अस्वीकार नहीं किया जा सकता।
जस्टिस संदीप वी. मार्ने ने सेवानिवृत्त कर्मचारियों की छह रिट याचिकाएं स्वीकार करते हुए EPFO के आवेदन खारिज करने वाले आदेश रद्द कर दिए। कोर्ट ने EPFO को आठ सप्ताह के भीतर अधिक वेतन पर पेंशन के लिए दाखिल संयुक्त विकल्प आवेदनों की प्रक्रिया पूरी कर उन्हें स्वीकार करने का निर्देश दिया।
इस मामले में मुख्य सवाल यह था कि क्या कर्मचारी भविष्य निधि अधिनियम के तहत छूट प्राप्त संस्थानों के निजी PF ट्रस्ट के नियम पेंशन फंड में अंशदान को नियंत्रित कर सकते हैं या कर्मचारी पेंशन योजना, 1995 (EPS) के पैराग्राफ 11(3) और 11(4) के तहत संयुक्त विकल्प के अधिकार को सीमित कर सकते हैं।
क्या था मामला?
याचिकाकर्ता एबॉट इंडिया लिमिटेड (पूर्व में नॉल फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड), बृहन्मुंबई इलेक्ट्रिक सप्लाई एंड ट्रांसपोर्ट (BEST), रेमंड स्टील लिमिटेड और टाटा कम्युनिकेशंस लिमिटेड के कर्मचारी रह चुके थे।
सुप्रीम कोर्ट के कर्मचारी भविष्य निधि संगठन एवं अन्य बनाम सुनील कुमार बी. एवं अन्य मामले में दिए गए फैसले के बाद इन सेवानिवृत्त कर्मचारियों ने अधिक वेतन के आधार पर पेंशन प्राप्त करने के लिए आवेदन किया था।
लेकिन EPFO ने उनके आवेदन खारिज कर दिए।
EPFO का कहना था कि संबंधित संस्थानों के PF ट्रस्ट के नियमों में नियोक्ता के पेंशन अंशदान को वैधानिक वेतन सीमा तक सीमित रखा गया था। कुछ मामलों में आवश्यक फॉर्म और रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराने को भी आवेदन खारिज करने का आधार बनाया गया।
इन आदेशों में EPFO मुख्यालय के 18 जनवरी 2025 के सर्कुलर का हवाला दिया गया था। सर्कुलर के अनुसार, छूट प्राप्त संस्थानों के कर्मचारियों की पात्रता का निर्धारण उनके लागू ट्रस्ट नियमों के आधार पर किया जाना था।
याचिकाकर्ताओं ने कहा, PF ट्रस्ट के नियम पेंशन अधिकार को सीमित नहीं कर सकते
सभी याचिकाकर्ताओं की ओर से एडवोकेट सत्यम सुराणा ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट के सुनील कुमार बी. फैसले में छूट प्राप्त और गैर-छूट प्राप्त संस्थानों को समान स्तर पर रखा गया है।
उन्होंने कहा कि निजी ट्रस्ट के नियम केवल प्रोविडेंट फंड से संबंधित मामलों पर लागू होते हैं। इन नियमों का कर्मचारी के पेंशन अधिकार से कोई संबंध नहीं है।
अपनी दलील के समर्थन में उन्होंने मद्रास, कर्नाटक, कलकत्ता और इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसलों का हवाला दिया।
दूसरी ओर, EPFO की ओर से एडवोकेट पयोजा गांधी ने कहा कि आवेदनों को सही तरीके से खारिज किया गया था। उन्होंने तर्क दिया कि कई मामलों में संबंधित ट्रस्ट नियम या आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए थे।
उन्होंने बताया कि EPFO ने मद्रास हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। वहीं, कलकत्ता हाईकोर्ट की सिंगल बेंच के फैसले पर डिवीजन बेंच ने रोक लगा दी थी।
EPFO ने टाटा कम्युनिकेशंस के मामले में यह भी दलील दी कि कंपनी ने वेतन के सभी पात्र मदों पर PF अंशदान जमा नहीं किया था।
ट्रस्ट नियमों के आधार पर अधिक पेंशन से वंचित करना गलत: हाईकोर्ट
जस्टिस संदीप वी. मार्ने ने कहा कि यह कानूनी सवाल अब नया या अनिर्णीत नहीं है। देश के कई हाईकोर्ट पहले ही इस मुद्दे पर निर्णय दे चुके हैं।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
“देशभर के विभिन्न हाईकोर्ट ने लगातार यह माना है कि ट्रस्ट नियमों का हवाला देकर वास्तविक वेतन पर पेंशन फंड में अंशदान के लिए संयुक्त विकल्प चुनने के लाभ से वंचित करना स्वीकार्य नहीं है।”
हाईकोर्ट ने EPFO की उस मांग को भी अस्वीकार कर दिया जिसमें सुप्रीम कोर्ट के फैसले तक इन याचिकाओं को लंबित रखने की बात कही गई थी।
कोर्ट ने कहा,
“विशेष अनुमति याचिका (SLP) के लंबित होने को वर्तमान याचिकाओं को अनिश्चितकाल तक लंबित रखने का आधार नहीं बनाया जा सकता।”
बेंच ने पाया कि सभी याचिकाकर्ता सेवानिवृत्त कर्मचारी हैं। ऐसे में जब कई हाईकोर्ट इस कानूनी सवाल पर पहले ही फैसला दे चुके हैं, तो उनकी याचिकाओं को लंबित रखना उचित नहीं होगा।
दस्तावेज नहीं मिलने पर EPFO को वैकल्पिक सत्यापन करना होगा
कुछ आवेदनों में दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने अपने पहले के किरण राजाराम जाधव और दुर्गा श्रीनिवास कल्लाकुरी मामलों के फैसलों का हवाला दिया।
इन फैसलों के अनुसार, यदि नियोक्ता आवश्यक रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं करता है, तो EPFO को सत्यापन के वैकल्पिक तरीके अपनाने चाहिए। इनमें कर्मचारियों को सुनवाई का अवसर देना भी शामिल है।
टाटा कम्युनिकेशंस के मामले में कोर्ट ने पाया कि मूल वेतन पर निर्धारित सीमा से अधिक PF अंशदान वास्तव में जमा किया गया था।
EPFO के 18 जनवरी 2025 के सर्कुलर पर कोर्ट ने टिप्पणी की,
“सर्कुलर का हवाला देने के अलावा, उन्होंने यह नहीं दिखाया कि उक्त सर्कुलर किस प्रकार इन याचिकाकर्ताओं के अधिक वेतन पर पेंशन प्राप्त करने के दावे में बाधा बनता है।”
नियोक्ता के अंशदान की सीमा संयुक्त विकल्प खारिज करने का आधार नहीं
मामले में कानूनी स्थिति स्पष्ट करते हुए हाईकोर्ट ने कहा,
“इसलिए संयुक्त विकल्प को इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि ट्रस्ट नियमों में नियोक्ता के अंशदान की कोई अधिकतम सीमा निर्धारित है या ट्रस्ट नियमों में अधिक पेंशन के लिए संयुक्त विकल्प का प्रावधान नहीं है, अथवा इस आधार पर कि नियोक्ता ने निर्धारित वेतन सीमा से अधिक वेतन पर पेंशन अंशदान जमा नहीं किया था।”
कोर्ट ने इस तरह EPFO के उस रुख को अस्वीकार कर दिया जिसके तहत छूट प्राप्त संस्थानों के निजी ट्रस्ट नियमों को अधिक वेतन पर पेंशन के संयुक्त विकल्प में बाधा माना गया था।
आठ सप्ताह में आवेदन स्वीकार करने का निर्देश
बॉम्बे हाईकोर्ट ने सभी छह रिट याचिकाएं स्वीकार करते हुए EPFO के विवादित आदेश रद्द कर दिए।
जस्टिस संदीप वी. मार्ने ने EPFO को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ताओं के अधिक वेतन पर पेंशन संबंधी संयुक्त विकल्प आवेदनों की प्रक्रिया आठ सप्ताह के भीतर पूरी करे और उन्हें स्वीकार करे।
कोर्ट ने मुकदमे के खर्च के संबंध में कोई आदेश नहीं दिया।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: अमित गुणवंतराय मेहता बनाम कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) एवं संबंधित मामले
केस नंबर: रिट याचिका संख्या 13752/2026 एवं संबंधित याचिकाएं
बेंच: जस्टिस संदीप वी. मार्ने
फैसले की तारीख: 19 अक्टूबर 2026
