मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा है कि जब किसी क्षेत्र के वाणिज्यिक विवादों की सुनवाई के लिए कमर्शियल कोर्ट अधिसूचित हो, तो उस क्षेत्र के प्रधान जिला जज को मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 34 के तहत दाखिल आवेदन पर फैसला सुनाने का अधिकार नहीं है। अधिकार क्षेत्र के अभाव में पारित ऐसा आदेश कानून की नजर में शून्य और अमान्य है।
जस्टिस विवेक अग्रवाल ने दीपक सैणानी की ओर से एंजेल ब्रोकिंग लिमिटेड के खिलाफ दाखिल मध्यस्थता अपील पर सुनवाई करते हुए बैतूल के प्रधान जिला जज का आदेश रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने धारा 34 के तहत दाखिल आवेदन वापस करने का निर्देश देते हुए पक्षकारों को कानून के अनुसार उपलब्ध उपाय अपनाने की स्वतंत्रता दी।
क्या था मामला?
विवाद मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 के तहत पारित एक मध्यस्थता निर्णय (Arbitral Award) से जुड़ा था।
11 दिसंबर 2020 के मध्यस्थता निर्णय को चुनौती देते हुए अधिनियम की धारा 34 के तहत आवेदन दाखिल किया गया था।
बैतूल के प्रधान जिला जज ने केस संख्या 04/2024 में 19 दिसंबर 2024 को उस आवेदन पर आदेश पारित किया।
इस आदेश को दीपक सैणानी ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में चुनौती दी। उनका कहना था कि प्रधान जिला जज ने उस आवेदन पर सुनवाई की और फैसला सुनाया, जबकि उनके पास मामले का अधिकार क्षेत्र ही नहीं था।
कमर्शियल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को लेकर दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट संजय के. अग्रवाल और एडवोकेट अर्जुन बाजपेयी ने दलील दी कि कमर्शियल कोर्ट अधिनियम, 2015 की धारा 3 के तहत भोपाल में पहले ही कमर्शियल कोर्ट अधिसूचित किया जा चुका था।
इस कमर्शियल कोर्ट का अधिकार क्षेत्र बैतूल जिले से उत्पन्न होने वाले विवादों तक भी था। इसलिए बैतूल के प्रधान जिला जज को धारा 34 के तहत आवेदन पर सुनवाई करने के बजाय उसे वापस कर देना चाहिए था।
अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के हर्षद चिमन लाल मोदी बनाम डीएलएफ यूनिवर्सल लिमिटेड एवं अन्य, (2005) 7 SCC 791 के फैसले पर भरोसा किया।
इस फैसले के पैराग्राफ 30 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि जब किसी कानूनी प्रावधान के कारण अदालत के पास विषय-वस्तु से संबंधित अधिकार क्षेत्र नहीं होता, तो वह उस मामले की सुनवाई नहीं कर सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था,
“जिस अदालत के पास अधिकार क्षेत्र नहीं है, उसके द्वारा पारित आदेश शून्य और अमान्य होता है।”
इसी आधार पर अपीलकर्ता ने धारा 34 के आवेदन को वापस किए जाने का निर्देश देने की मांग की।
प्रतिवादी ने कहा, अपनी गलती का लाभ नहीं उठा सकता पक्षकार
एंजेल ब्रोकिंग लिमिटेड की ओर से सीनियर एडवोकेट नमन नागरथ और एडवोकेट अलकेश अग्रवाल ने अपीलकर्ता की मांग का विरोध किया।
उन्होंने कहा कि कोई पक्षकार अपनी इच्छा से गलत अदालत का चुनाव करने के बाद अपनी ही गलती का फायदा नहीं उठा सकता।
प्रतिवादी की दलील थी कि अपीलकर्ता ने पहले बैतूल की अदालत में कार्यवाही की और अपने खिलाफ आदेश आने के बाद अब यह दावा कर रहा है कि उस अदालत के पास अधिकार क्षेत्र नहीं था।
उन्होंने यह भी कहा कि इस चरण में आवेदन वापस किए जाने से परिसीमा अवधि (Limitation) से संबंधित परिणाम सामने आ सकते हैं।
इसके अलावा, प्रतिवादी ने तर्क दिया कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश 7 नियम 10 के तहत वादपत्र को मुकदमे के किसी चरण में वापस किया जा सकता है। लेकिन एक बार मामले में डिक्री पारित हो जाने के बाद ऐसा निर्देश नहीं दिया जा सकता।
अधिकार क्षेत्र के बिना पारित आदेश शून्य: हाईकोर्ट
जस्टिस विवेक अग्रवाल ने पाया कि इस तथ्य पर कोई विवाद नहीं था कि कमर्शियल कोर्ट अधिनियम, 2015 की धारा 3 के तहत बैतूल जिले के क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र से उत्पन्न विवादों के लिए कमर्शियल कोर्ट अधिसूचित किया जा चुका था।
हाईकोर्ट ने कहा,
“यह स्वीकार किया गया है कि बैतूल के प्रधान जिला जज के पास इस मामले की सुनवाई करने और इसका निर्णय करने का अधिकार क्षेत्र नहीं था।”
कोर्ट ने इसके बाद प्रतिवादी की उस दलील पर विचार किया जिसमें कहा गया था कि इस चरण में आवेदन वापस करने का आदेश नहीं दिया जा सकता।
हाईकोर्ट ने CPC के आदेश 7 नियम 10(1) के नीचे दिए गए स्पष्टीकरण का उल्लेख किया। यह स्पष्टीकरण अधिनियम संख्या 10, वर्ष 1976 के माध्यम से जोड़ा गया था और 1 फरवरी 1977 से प्रभावी हुआ था।
इस स्पष्टीकरण के अनुसार,
“संदेह दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि अपील या पुनरीक्षण की अदालत, किसी वाद में पारित डिक्री को रद्द करने के बाद, इस उपनियम के तहत वादपत्र वापस करने का निर्देश दे सकती है।”
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह प्रावधान अपीलीय या पुनरीक्षण अदालत को डिक्री रद्द करने के बाद वादपत्र वापस करने का निर्देश देने की अनुमति देता है।
गलत अधिकार क्षेत्र में पारित आदेश रद्द करना जरूरी
जस्टिस अग्रवाल ने सुप्रीम कोर्ट के हर्षद चिमन लाल मोदी फैसले को लागू करते हुए कहा,
“जब सुप्रीम कोर्ट के हर्षद चिमन लाल मामले के फैसले के अनुसार बैतूल के प्रधान जिला जज का आदेश शून्य और अमान्य है, तो न केवल उस आदेश को रद्द किया जाना आवश्यक है, बल्कि CPC के आदेश 7 नियम 10(1) के नीचे दिए गए स्पष्टीकरण के अनुसार आवेदन को वापस भी किया जा सकता है।”
कोर्ट ने माना कि अधिकार क्षेत्र के अभाव में पारित आदेश को बरकरार नहीं रखा जा सकता।
प्रधान जिला जज का आदेश रद्द, धारा 34 का आवेदन वापस
इन निष्कर्षों के आधार पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बैतूल के प्रधान जिला जज द्वारा 19 दिसंबर 2024 को पारित आदेश रद्द कर दिया।
कोर्ट ने उसी दिन मध्यस्थता और सुलह अधिनियम की धारा 34 के तहत दाखिल आवेदन भी वापस कर दिया।
हाईकोर्ट ने पक्षकारों को कानून के तहत उपलब्ध किसी भी उपाय को अपनाने की स्वतंत्रता दी।
साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट किया,
“हमने किसी भी पक्षकार के दावे के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की है।”
केस डिटेल्स
केस टाइटल: दीपक सैणानी बनाम एंजेल ब्रोकिंग लिमिटेड
केस नंबर: मध्यस्थता अपील संख्या 35/2025
बेंच: जस्टिस विवेक अग्रवाल
फैसले की तारीख: 14 अक्टूबर 2026
