दिल्ली हाईकोर्ट ने संपत्ति की खरीद-बिक्री के समझौते से जुड़े एक मामले में कहा है कि केवल अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन होने से विक्रेता को बयाना राशि या अग्रिम भुगतान जब्त करने का स्वतः अधिकार नहीं मिल जाता। रकम जब्त करने के लिए यह साबित करना आवश्यक है कि अनुबंध के उल्लंघन से उसे वास्तविक नुकसान या कानूनी क्षति हुई है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि संपत्ति खरीदने के समझौते को लागू कराने की मांग करने वाले व्यक्ति को यह साबित करना होगा कि उसके पास भुगतान के लिए लगातार पर्याप्त आर्थिक क्षमता थी।
जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने 16 अक्टूबर 2026 को एक अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें संपत्ति की बिक्री का समझौता लागू कराने की मांग अस्वीकार कर दी गई थी, लेकिन विक्रेता को खरीदार से प्राप्त ₹4,15,000 की राशि छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ लौटाने का आदेश दिया गया था।
हाईकोर्ट ने कहा कि खरीदार यह साबित नहीं कर सका कि वह अनुबंध की अवधि के दौरान संपत्ति की शेष कीमत चुकाने के लिए आर्थिक रूप से तैयार था। दूसरी ओर, विक्रेता भी यह साबित नहीं कर पाया कि समझौता पूरा नहीं होने से उसे कोई आर्थिक नुकसान हुआ था।
क्या था संपत्ति की खरीद-बिक्री का विवाद?
मामला दिल्ली के शालीमार गांव स्थित 300 वर्ग गज की संपत्ति संख्या 258 की खरीद-बिक्री से संबंधित है।
राम पाल सैनी ने 1 नवंबर 2007 को अनिल कुमार के साथ इस संपत्ति को ₹30 लाख में खरीदने का समझौता किया था।
समझौते के तहत खरीदार ने शुरुआत में ₹2 लाख बयाना राशि दी। इसके बाद अलग-अलग तारीखों पर अन्य भुगतान भी किए गए।
मामले के रिकॉर्ड के अनुसार, 3 नवंबर 2007 और 9 जनवरी 2008 को ₹1-1 लाख, 15 अप्रैल 2008 को ₹50,000, 20 जून 2011 को ₹65,000 और 25 अगस्त 2011 को ₹1 लाख का भुगतान किया गया था।
मुकदमे में कुल भुगतान की राशि ₹4,15,000 बताई गई, जिसे लौटाने का आदेश ट्रायल कोर्ट ने दिया था।
समझौते के अनुसार, संपत्ति से संबंधित प्रोबेट कार्यवाही समाप्त होने और विक्रेता के नाम संपत्ति का म्यूटेशन (नामांतरण) होने के छह महीने के भीतर शेष कीमत का भुगतान किया जाना था।
हालांकि, संपत्ति पहले से कानूनी विवाद में फंसी हुई थी।
बीना देवी नाम की महिला ने विक्रेता द्वारा शुरू की गई प्रोबेट कार्यवाही में आपत्ति दाखिल की थी, जिसके कारण अंतरिम रोक का आदेश लागू था।
बाद में प्रोबेट का फैसला विक्रेता के पक्ष में आया। इसके खिलाफ बीना देवी ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की, जिसे 14 दिसंबर 2010 को खारिज कर दिया गया।
इसके बाद 14 फरवरी 2011 को लेटर्स ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन जारी किए गए। विक्रेता ने 30 मई 2013 को अदालती कार्यवाही के जरिए बीना देवी से संपत्ति का कब्जा प्राप्त किया।
खरीदार ने समझौता लागू कराने के लिए दाखिल किया मुकदमा
खरीदार ने 24 मई 2013 को विक्रेता को कानूनी नोटिस भेजकर संपत्ति की सेल डीड निष्पादित करने की मांग की।
इसके बाद उसने अदालत में मुकदमा दाखिल कर समझौते के विशिष्ट पालन (Specific Performance) की मांग की।
वैकल्पिक रूप से खरीदार ने भुगतान की गई रकम का दोगुना, यानी ₹8,30,000, पंद्रह प्रतिशत ब्याज के साथ वापस दिलाने का अनुरोध किया।
हालांकि, 30 अक्टूबर 2019 को अतिरिक्त जिला जज ने संपत्ति की बिक्री का समझौता लागू कराने की मांग खारिज कर दी।
ट्रायल कोर्ट ने विक्रेता को ₹4,15,000 की राशि छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ लौटाने का निर्देश दिया।
इस फैसले को चुनौती देते हुए खरीदार ने सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 96 के तहत दिल्ली हाईकोर्ट में अपील दाखिल की।
खरीदार की दलील: संपत्ति का नामांतरण होने के बाद ही भुगतान करना था
हाईकोर्ट में खरीदार ने दलील दी कि उसने समझौते की किसी शर्त का उल्लंघन नहीं किया था और न ही अपनी ओर से अनुबंध समाप्त किया था।
उसका कहना था कि शेष भुगतान की जिम्मेदारी विक्रेता के नाम संपत्ति का म्यूटेशन होने के बाद ही शुरू होती थी।
खरीदार ने कहा कि विक्रेता ने संपत्ति का नामांतरण नहीं कराया था। इसके अलावा संपत्ति का वास्तविक कब्जा भी उसे मई 2013 के अंत में मिला था।
इसलिए इससे पहले खरीद-बिक्री की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकती थी।
खरीदार ने अपने पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के सत्या जैन बनाम अनीस अहमद रुश्दी, के. प्रकाश बनाम बी.आर. संपत और जरीन सिद्दीकी बनाम ए. रामलिंगम मामलों के फैसलों का हवाला दिया।
उसने कहा कि विशिष्ट राहत अधिनियम, 1963 की धारा 20 के तहत राहत देने का विवेकाधिकार स्थापित न्यायिक सिद्धांतों के अनुसार इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
दूसरी ओर, विक्रेता ने दावा किया कि खरीदार ने जनवरी 2012 में मौखिक रूप से समझौता समाप्त कर दिया था।
विक्रेता के अनुसार, खरीदार के पास शेष कीमत एकमुश्त चुकाने के लिए पर्याप्त धन नहीं था और इसी कारण उसने बयाना राशि वापस मांगी थी।
विक्रेता ने यह भी कहा कि दिसंबर 2010 में हाईकोर्ट द्वारा अपील खारिज किए जाने के बाद संपत्ति की बिक्री में कानूनी बाधाएं समाप्त हो गई थीं।
इसके बावजूद खरीदार करीब ढाई साल तक निष्क्रिय रहा और स्थानीय स्तर पर संपत्ति की कीमतें कई गुना बढ़ने के बाद उसने दोबारा समझौता पूरा कराने में रुचि दिखाई।
संपत्ति खरीदने की इच्छा और भुगतान की आर्थिक क्षमता अलग-अलग बातें: हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने विशिष्ट राहत अधिनियम, 1963 की धारा 16(c) के तहत खरीदार की ‘तत्परता’ और ‘इच्छा’ के कानूनी महत्व पर विस्तार से विचार किया।
कोर्ट ने कहा कि किसी संपत्ति को खरीदने की इच्छा होना और उसके लिए वास्तविक रूप से भुगतान करने की आर्थिक क्षमता होना अलग-अलग बातें हैं।
सुप्रीम कोर्ट के एच.पी. प्यारजान बनाम दसप्पा मामले का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि अनुबंध के विशिष्ट पालन की मांग करने वाले व्यक्ति को समझौते की तारीख से लेकर अदालत की डिक्री तक लगातार अपनी तत्परता और इच्छा साबित करनी होती है।
कोर्ट ने सैयद दस्तगीर बनाम टी.आर. गोपालकृष्ण शेट्टी मामले में दिए गए सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा,
“अनुबंध पूरा करने की तत्परता और इच्छा केवल शब्दों या औपचारिकताओं तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसका वास्तविक रूप में होना आवश्यक है। कानून के शब्दों को यांत्रिक रूप से दोहराने पर जोर देना उसके वास्तविक उद्देश्य के बजाय केवल औपचारिकता पर जोर देना है। यदि आवश्यक बात पहले से स्पष्ट रूप से कही गई है, तो केवल औपचारिक शब्दों के अभाव से उसका महत्व समाप्त नहीं हो जाता।”
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘इच्छा’ का पता खरीदार के व्यवहार और आचरण से लगाया जा सकता है, जबकि ‘तत्परता’ का संबंध उसकी वास्तविक आर्थिक क्षमता से है।
कोर्ट ने बलदेव बनाम भूले और मधुकर निवृत्ति जगताप बनाम प्रमिलाबाई चंदूलाल परांडेकर मामलों का उल्लेख करते हुए कहा,
“आर्थिक क्षमता को ठोस साक्ष्यों के माध्यम से साबित करना आवश्यक है। केवल अपने पक्ष में दिए गए मौखिक बयानों से आर्थिक क्षमता साबित करने की जिम्मेदारी पूरी नहीं होती।”
खरीदार लगातार भुगतान करने की क्षमता साबित नहीं कर सका
मामले के तथ्यों की जांच करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि खरीदार ने दावा किया था कि उसकी बड़ी रकम फंसी होने के कारण उसे ब्याज का नुकसान हो रहा था।
हालांकि, वह यह साबित नहीं कर सका कि वर्ष 2010 से 2012 के बीच उसके पास संपत्ति की शेष कीमत चुकाने के लिए पर्याप्त धन उपलब्ध था।
खरीदार ने केवल मई और जून 2013 की सीमित अवधि के बैंक स्टेटमेंट पेश किए थे।
कोर्ट ने कहा कि दिसंबर 2010 में कानूनी बाधाएं समाप्त हो जाने के बाद की अवधि में खरीदार की आर्थिक क्षमता साबित करने के लिए ये दस्तावेज पर्याप्त नहीं थे।
इसके अलावा जून और अगस्त 2011 में किस्तों में किए गए भुगतान से भी यह संकेत मिलता था कि खरीदार के पास शेष रकम एकमुश्त चुकाने की क्षमता नहीं थी।
हाईकोर्ट ने संपत्ति के म्यूटेशन और वास्तविक कब्जे से संबंधित खरीदार की दलील भी स्वीकार नहीं की।
कोर्ट ने कहा कि समझौते की शर्त संख्या तीन के तहत बीना देवी से संपत्ति का कब्जा प्राप्त करना विक्रेता की जिम्मेदारी थी और उससे जुड़ा जोखिम भी विक्रेता को उठाना था।
लेकिन कब्जा प्राप्त करना सेल डीड निष्पादित करने की अनिवार्य पूर्व शर्त नहीं थी।
इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस निष्कर्ष को सही माना, जिसमें खरीदार को समझौते के विशिष्ट पालन की राहत देने से इनकार किया गया था।
समझौता टूटने पर बयाना राशि की जब्ती स्वतः नहीं होगी
हाईकोर्ट ने इसके बाद इस सवाल पर विचार किया कि क्या विक्रेता खरीदार द्वारा दी गई बयाना राशि और अग्रिम भुगतान अपने पास रख सकता है।
कोर्ट ने भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 73 और 74 तथा विशिष्ट राहत अधिनियम की धारा 22 का परीक्षण किया।
बेंच ने चिरंजीत सिंह बनाम हर स्वरूप, श्री हनुमान कॉटन मिल्स बनाम टाटा एयरक्राफ्ट लिमिटेड, वीडियोकॉन प्रॉपर्टीज लिमिटेड बनाम भालचंद्र लेबोरेटरीज और सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया बनाम षणमुगवेलु जैसे फैसलों पर विचार करते हुए बयाना राशि और कीमत के आंशिक अग्रिम भुगतान के बीच अंतर स्पष्ट किया।
कोर्ट ने कहा कि बयाना राशि का उद्देश्य पक्षों को अनुबंध के प्रति प्रतिबद्ध रखना होता है। हालांकि, अनुबंध का उल्लंघन होने पर रकम जब्त करने का अधिकार भी कानून की सीमाओं के अधीन है।
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के फतेह चंद बनाम बालकिशन दास और कैलाश नाथ एसोसिएट्स बनाम दिल्ली विकास प्राधिकरण मामलों का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने कहा,
“चूंकि धारा 74 अनुबंध के उल्लंघन से हुई क्षति या नुकसान के लिए उचित मुआवजे का प्रावधान करती है, इसलिए इस धारा के लागू होने के लिए नुकसान या क्षति का होना एक अनिवार्य शर्त है।”
जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने स्पष्ट किया,
“बिक्री के समझौते के तहत दी गई बयाना राशि की जब्ती अनुबंध के उल्लंघन का स्वतः परिणाम नहीं है। खरीदार की चूक पर विक्रेता को बयाना राशि जब्त करने का अधिकार भी धारा 74 के अधीन है। अनुबंध में निर्धारित रकम केवल मुआवजे की अधिकतम सीमा होती है। रकम अपने पास रखने की मांग करने वाले पक्ष को यह साबित करना होगा कि अनुबंध के उल्लंघन से उसे कानूनी क्षति हुई है और जहां नुकसान को साबित करना संभव है, वहां उसे साबित करना आवश्यक है।”
विक्रेता ने कोई आर्थिक नुकसान साबित नहीं किया
मौजूदा मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि दोनों पक्षों के बीच हुए समझौते में ऐसी कोई स्पष्ट शर्त नहीं थी, जिसके तहत खरीदार की चूक होने पर विक्रेता बयाना राशि जब्त कर सकता था।
इसके अलावा विक्रेता ने ऐसा कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया, जिससे साबित हो कि समझौता पूरा नहीं होने के कारण उसे आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा।
इसके विपरीत, विक्रेता ने स्वयं स्वीकार किया था कि संबंधित क्षेत्र में संपत्तियों की कीमतें कई गुना बढ़ चुकी थीं।
संपत्ति भी विक्रेता के पास ही बनी हुई थी।
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस निष्कर्ष को भी पलट दिया, जिसमें माना गया था कि जनवरी 2012 में समझौता मौखिक रूप से समाप्त हो गया था।
कोर्ट ने पाया कि विक्रेता ने समझौता समाप्त करने या बयाना राशि जब्त करने के संबंध में खरीदार को कभी कोई नोटिस या सूचना नहीं दी थी।
इसलिए न तो अनुबंध में रकम जब्त करने का कोई स्पष्ट अधिकार मौजूद था और न ही विक्रेता ने किसी कानूनी नुकसान को साबित किया था।
ऐसी स्थिति में विक्रेता को खरीदार की रकम अपने पास रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
दोगुनी रकम लौटाने की मांग भी खारिज
हाईकोर्ट ने खरीदार की उस वैकल्पिक मांग पर भी विचार किया, जिसमें उसने भुगतान की गई रकम का दोगुना यानी ₹8,30,000 लौटाने की मांग की थी।
कोर्ट ने कहा कि खरीदार यह साबित नहीं कर सका कि अपनी जमा रकम से वंचित रहने के अलावा उसे कोई अन्य नुकसान हुआ था।
इसलिए ट्रायल कोर्ट ने दोगुनी रकम लौटाने की मांग को खारिज करके सही फैसला किया था।
₹4.15 लाख छह प्रतिशत ब्याज के साथ लौटाने का आदेश बरकरार
हाईकोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने विक्रेता को ₹4,15,000 लौटाने का सही आदेश दिया था।
कोर्ट ने इस राशि पर 30 मई 2013 से वास्तविक भुगतान होने तक छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने के निर्देश को भी बरकरार रखा।
जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने कहा कि खरीदार समझौते के विशिष्ट पालन के लिए आवश्यक निरंतर आर्थिक तत्परता साबित नहीं कर सका, जबकि विक्रेता बयाना राशि जब्त करने का कानूनी आधार या किसी वास्तविक नुकसान को साबित नहीं कर पाया।
इन निष्कर्षों के साथ दिल्ली हाईकोर्ट ने अपील खारिज कर दी और सभी लंबित आवेदनों का भी निस्तारण कर दिया।
केस डिटेल्स
- केस टाइटल: श्री राम पाल सैनी बनाम श्री अनिल कुमार
- केस नंबर: आरएफए 330/2021 एवं सीएम आवेदन संख्या 32746-32747/2021
- बेंच: जस्टिस नीना बंसल कृष्णा
- फैसले की तारीख: 16 अक्टूबर 2026
