इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अलीगढ़ से जुड़े एक बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) मामले में पुलिस द्वारा गिरफ्तारी मेमो में फर्जीवाड़ा करने और कोर्ट के समक्ष झूठा हलफनामा दाखिल करने का गंभीर मामला सामने आने पर रजिस्ट्रार जनरल को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 379 के तहत कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने पाया कि पुलिस ने गिरफ्तारी मेमो में बाद में बदलाव करके उसका दूसरा संस्करण कोर्ट में पेश किया था।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की डिवीजन बेंच ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका भी स्वीकार कर ली। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता को गिरफ्तारी के जो आधार बताए गए थे, वे महज औपचारिकता थे और इतने पर्याप्त नहीं थे कि वह उनके आधार पर अपनी जमानत के लिए आवेदन कर सके।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला अलीगढ़ के क्वार्सी पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर संख्या 650/2026 से संबंधित है। इसमें भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 336(3), 338 और 340(2) के तहत आरोप लगाए गए थे। ये धाराएं पुराने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 467, 468 और 471 से संबंधित हैं।
याचिकाकर्ता जुनैद का आरोप था कि पुलिस ने उसे 6 अगस्त 2026 को सुबह तीन बजे हिरासत में लिया और अलीगढ़ की जमालपुर पुलिस चौकी में रखा।
याचिका में कहा गया कि गिरफ्तारी के समय दिए गए मेमो में वे जरूरी विवरण दर्ज नहीं थे, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार बताया जाना आवश्यक है।
कोर्ट के सामने दो अलग-अलग गिरफ्तारी मेमो पेश किए गए
याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट मोहित सिंह ने एडवोकेट सुबीर लाल के सहयोग से दलीलें रखीं। उन्होंने जवाबी हलफनामे के साथ दाखिल गिरफ्तारी मेमो की ओर कोर्ट का ध्यान दिलाया।
इस मेमो में गिरफ्तारी के कारण वाले कॉलम में केवल ‘मुकदमा उपरोक्त में’ लिखा था।
सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट मोहित सिंह ने कोर्ट को बताया कि राज्य सरकार की ओर से दाखिल जवाबी हलफनामे के साथ गिरफ्तारी मेमो का एक अलग संस्करण लगाया गया था।
इस अंतर को साबित करने के लिए याचिकाकर्ता ने उस गिरफ्तारी मेमो की प्रमाणित प्रति पेश की, जिसे रिमांड देने वाले मजिस्ट्रेट के सामने रखा गया था। यह प्रति उसी मेमो के समान थी, जो याचिकाकर्ता को दिया गया था।
गिरफ्तारी के आधार महज औपचारिकता थे: हाईकोर्ट
गिरफ्तारी के आधारों की जांच करते हुए हाईकोर्ट ने कहा,
“गिरफ्तारी के आधार महज औपचारिकता भर हैं।”
दोनों गिरफ्तारी मेमो की तुलना करने पर बेंच ने पाया कि जांच अधिकारी ने मेमो के बिंदु संख्या 12 में बाद में अतिरिक्त जानकारी जोड़ दी थी। यह बदलाव उस समय किया गया, जब गिरफ्तारी मेमो याचिकाकर्ता को दिया जा चुका था और रिमांड मजिस्ट्रेट के सामने भी पेश किया जा चुका था।
इसी तरह बिंदु संख्या 13 में भी बदलाव किया गया था। इसमें यह दर्ज कर दिया गया कि याचिकाकर्ता ने मूल्यवान प्रतिभूति से संबंधित दस्तावेजों में जालसाजी की और उसके आधार पर लोगों के साथ धोखाधड़ी की।
कोर्ट ने पाया कि यह विवरण मूल गिरफ्तारी मेमो का हिस्सा ही नहीं था।
बेंच ने कहा कि बिंदु संख्या 12 और 13 में दर्ज जानकारियां फर्जी तरीके से जोड़ी गई थीं। संभव है कि यह बदलाव बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल होने के बाद किए गए हों।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
“इससे स्पष्ट रूप से पता चलता है कि जवाबी हलफनामे के साथ इस कोर्ट के सामने एक फर्जी दस्तावेज पेश किया गया था।”
पुलिस चौकी में CCTV कैमरे होने से भी किया इनकार
सुनवाई के दौरान एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया।
राज्य सरकार की ओर से दाखिल जवाबी हलफनामे में दावा किया गया था कि संबंधित पुलिस चौकी में सीसीटीवी कैमरे नहीं लगे थे।
हालांकि, याचिकाकर्ता ने अपने जवाबी हलफनामे के साथ रंगीन तस्वीरें पेश कीं। इन तस्वीरों में पुलिस चौकी के प्रवेश द्वार पर सीसीटीवी कैमरे स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे थे।
इन तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा,
“इस प्रकार पुलिस ने गिरफ्तारी मेमो में फर्जीवाड़ा किया है और इस कोर्ट के समक्ष झूठी गवाही देने का अपराध किया है।”
हालांकि, बेंच ने उस अधिकारी को सीधे जिम्मेदार नहीं ठहराया, जिसने राज्य सरकार का जवाबी हलफनामा दिया था।
कोर्ट ने कहा कि वह अधिकारी मामले का जांच अधिकारी नहीं था और उसका इस प्रकरण से कोई सीधा संबंध नहीं था। संभव है कि उसने जिन अभिलेखों का अध्ययन किया हो, उनमें जांच अधिकारी पहले ही फर्जीवाड़ा कर चुका हो।
बेंच ने इस मामले की गंभीरता पर जोर देते हुए कहा,
“यह कोर्ट पुलिस द्वारा अपने समक्ष किए गए अपराध को गंभीरता से लेता है।”
रजिस्ट्रार जनरल को BNSS की धारा 379 के तहत कार्रवाई का निर्देश
हाईकोर्ट ने कहा कि चूंकि दस्तावेजों में फर्जीवाड़ा और झूठी गवाही से संबंधित कथित अपराध न्यायिक कार्यवाही के दौरान किया गया है, इसलिए इस मामले में BNSS की धारा 215 में उल्लिखित अपराधों के संबंध में धारा 379 के तहत कार्रवाई की जानी चाहिए।
बेंच ने रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि वह इस संबंध में आवश्यक कार्यवाही करें।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि जांच के बाद रजिस्ट्रार जनरल इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि दस्तावेजों में फर्जीवाड़ा और झूठी गवाही से संबंधित अपराध प्रथम दृष्टया हुआ है, तो वह प्रथम दृष्टया जिम्मेदार पाए गए व्यक्तियों के खिलाफ सक्षम न्यायालय में मामला दर्ज कराएं।
बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार, तत्काल रिहाई का आदेश
हाईकोर्ट ने गिरफ्तारी के आधारों की जानकारी देने में गंभीर कमी पाते हुए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार कर ली।
बेंच ने निर्देश दिया कि यदि याचिकाकर्ता किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है, तो उसे तत्काल रिहा किया जाए।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस आदेश से याचिकाकर्ता की दोबारा गिरफ्तारी पर पूरी तरह रोक नहीं लगेगी। दोबारा गिरफ्तारी की कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के जसकरण जीत सिंह देओल बनाम पंजाब राज्य, 2026 INSC 1022 के फैसले में निर्धारित कानून के अधीन होगी।
केस डिटेल्स
- केस टाइटल: जुनैद एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं चार अन्य
- केस नंबर: बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट याचिका संख्या 1389/2026
- बेंच: जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव
- फैसले की तारीख: 14 अक्टूबर 2026
