आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका लंबित रहने के दौरान संबंधित व्यक्ति को हिरासत से रिहा कर दिया जाता है, तो ऐसी याचिका सुनवाई योग्य नहीं रह जाती। कोर्ट ने कुर्नूल पुलिस पर पति को अवैध हिरासत में रखने का आरोप लगाने वाली महिला की याचिका खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया।
हाईकोर्ट ने मुआवजा देने की मांग भी स्वीकार नहीं की। कोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामले में अवैध हिरासत का कोई निश्चित निष्कर्ष दर्ज नहीं किया जा सकता। ऐसे निष्कर्ष के बिना मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर मुआवजा देने का आदेश नहीं दिया जा सकता।
जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस अलापति गिरिधर की डिवीजन बेंच ने 30 सितंबर 2026 को यह आदेश पारित किया।
क्या है पूरा मामला?
याचिकाकर्ता कोंडा विजया लक्ष्मी ने अपने पति कोसिरे वेंकटराम रेड्डी को अदालत के समक्ष पेश करने और हिरासत से रिहा करने की मांग करते हुए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की थी।
उनके पति के खिलाफ कुर्नूल IV पुलिस स्टेशन में अपराध संख्या 41/2026 दर्ज किया गया था।
इस मामले में भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 196(1)(a), 299 और 356(1) के साथ सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 67 के तहत कथित अपराधों की जांच चल रही थी।
पुलिस ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 35(3) के तहत नोटिस जारी कर उन्हें जांच में शामिल होने के लिए बुलाया था।
शुरुआत में उन्हें 5 मार्च 2026 को उपस्थित होने का निर्देश दिया गया। हालांकि, उन्होंने कुछ समय मांगा, जिसके बाद उन्हें 10 मार्च 2026 को उपस्थित होने के लिए कहा गया।
वह निर्धारित तारीख पर पुलिस के सामने पेश हुए।
इसके बाद उनकी पत्नी ने 11 मार्च 2026 को हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की।
उसी दिन शाम करीब 5:30 बजे उनके पति को जाने दिया गया।
याचिकाकर्ता ने अवैध हिरासत का आरोप लगाया
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता पापुडिप्पु शशिधर ने दलील दी कि पुलिस ने उनके पति को हिरासत में लेने के 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया।
उन्होंने कहा कि यह संविधान के तहत उपलब्ध सुरक्षा का उल्लंघन है और इसलिए हिरासत को अवैध माना जाना चाहिए।
उनका तर्क था कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति को बाद में रिहा कर देने मात्र से बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका सुनवाई योग्य नहीं रह जाती, ऐसा नहीं कहा जा सकता।
याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रमाण मौजूद नहीं है जिससे यह साबित हो कि उनके पति को 10 मार्च 2026 को रिहा कर दिया गया था।
उन्होंने भीम सिंह, विधायक बनाम जम्मू-कश्मीर राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 के उल्लंघन के लिए मुआवजे की मांग की।
उनकी ओर से यह भी कहा गया कि हिरासत से रिहाई की तारीख और समय साबित करने की जिम्मेदारी पुलिस की है।
पुलिस ने कहा, 10 मार्च को ही जाने दिया गया था
राज्य सरकार की ओर से सहायक सरकारी अधिवक्ता जे. कृष्ण प्रणीत ने संबंधित थाना प्रभारी के जवाबी हलफनामे का हवाला दिया।
उन्होंने बताया कि 10 मार्च 2026 को जांच के दौरान संबंधित व्यक्ति अपना आवश्यक मोबाइल फोन लेकर नहीं आया था।
इस कारण पुलिस ने उसी दिन BNSS की धारा 94 के तहत नोटिस जारी किया और उसे 11 मार्च 2026 को मोबाइल फोन के साथ दोबारा उपस्थित होने के लिए कहा।
सरकार के अनुसार, 10 मार्च को नोटिस देने के बाद उसे जाने दिया गया था।
वह 11 मार्च को फिर पुलिस के सामने पेश हुआ और उसी दिन उसे दोबारा जाने दिया गया।
राज्य सरकार ने दलील दी कि संबंधित व्यक्ति की रिहाई के बाद बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का उद्देश्य समाप्त हो गया है।
सरकार ने यह भी कहा कि याचिका में मुआवजे के लिए कोई विशेष प्रार्थना नहीं की गई थी और न ही उसके लिए आवश्यक आधार प्रस्तुत किया गया था।
रिहाई के बाद बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका जारी नहीं रह सकती: हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने सबसे पहले इस सवाल पर विचार किया कि याचिका लंबित रहने के दौरान संबंधित व्यक्ति की रिहाई होने पर क्या बंदी प्रत्यक्षीकरण की कार्यवाही जारी रह सकती है।
बेंच ने सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस बनाम राहुल मोदी, श्रीमती पार्वती और पी. सुब्रमण्यम के मामलों में दिए गए फैसलों का उल्लेख किया।
कोर्ट ने कहा कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका में महत्वपूर्ण सवाल यह होता है कि सुनवाई के समय संबंधित व्यक्ति हिरासत में है या नहीं।
यदि वह पहले ही रिहा हो चुका है, तो याचिका का मूल उद्देश्य समाप्त हो जाता है।
बेंच ने कहा,
“लेकिन जहां हिरासत स्वयं समाप्त हो चुकी है, वहां याचिका दाखिल किए जाने की तारीख पर हिरासत की वैधता की जांच करने की आवश्यकता नहीं रह जाती, क्योंकि याचिका दाखिल होने और सुनवाई की तारीख के बीच बाद की घटनाओं से परिस्थितियां बदल चुकी होती हैं।”
हाईकोर्ट ने इस आधार पर माना कि संबंधित व्यक्ति की रिहाई के बाद बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका सुनवाई योग्य नहीं रह गई थी।
पुलिस द्वारा रिहाई का रिकॉर्ड पेश नहीं करने पर भी अवैध हिरासत साबित नहीं
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की इस दलील पर भी विचार किया कि पुलिस ने 10 मार्च को उनके पति को रिहा करने का कोई रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किया।
बेंच ने माना कि रिहाई से संबंधित रिकॉर्ड अदालत के सामने पेश नहीं किया गया था।
हालांकि, कोर्ट ने कहा कि पुलिस द्वारा 10 मार्च 2026 को BNSS की धारा 94 के तहत जारी नोटिस भी महत्वपूर्ण है।
इस नोटिस में संबंधित व्यक्ति को 11 मार्च को मोबाइल फोन के साथ दोबारा उपस्थित होने का निर्देश दिया गया था।
हाईकोर्ट ने कहा कि 10 मार्च को रिहाई होने और 11 मार्च को दोबारा पेश होने के सवाल तथ्यात्मक विवाद से जुड़े हैं।
बेंच ने स्पष्ट किया,
“ऐसे नोटिस की मौजूदगी में हम न तो यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि संबंधित व्यक्ति को 10 मार्च 2026 से 11 मार्च 2026 तक लगातार हिरासत में रखा गया था और न ही यह माना जा सकता है कि कोई अवैध हिरासत हुई थी।”
इस प्रकार कोर्ट ने पुलिस के खिलाफ अवैध हिरासत का निष्कर्ष निकालने से इनकार कर दिया।
दूसरे मामले में मुआवजा देने के फैसले को अलग बताया
याचिकाकर्ता ने तिरुपति भारती बनाम आंध्र प्रदेश राज्य मामले में हाईकोर्ट के फैसले का भी हवाला दिया था।
उस मामले में पुलिस द्वारा सभी कैमरों की सीसीटीवी फुटेज पेश नहीं किए जाने के कारण अदालत ने पुलिस के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकाला था और ₹10,000 मुआवजा देने का आदेश दिया था।
हालांकि, मौजूदा मामले में हाईकोर्ट ने दोनों मामलों की परिस्थितियों को अलग पाया।
बेंच ने कहा कि इस मामले में पुलिस को सीसीटीवी फुटेज पेश करने का कोई निर्देश नहीं दिया गया था।
इसके अलावा, तिरुपति भारती मामले में BNSS की धारा 94 के तहत कोई नोटिस जारी नहीं हुआ था, जबकि मौजूदा मामले में ऐसा नोटिस मौजूद था।
इसलिए हाईकोर्ट ने कहा कि पहले मामले में दिया गया फैसला वर्तमान विवाद पर उसी तरह लागू नहीं किया जा सकता।
अवैध हिरासत साबित हुए बिना मुआवजा नहीं दिया जा सकता
हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 के उल्लंघन के आधार पर मुआवजा देने की मांग पर भी विचार किया।
बेंच ने स्वीकार किया कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के मामलों में मुआवजा देने का आदेश दे सकता है।
हालांकि, इसके लिए यह आवश्यक है कि अदालत संबंधित व्यक्ति को अवैध रूप से हिरासत में रखे जाने का स्पष्ट निष्कर्ष दर्ज करे।
कोर्ट ने कहा,
“हालांकि, इसके लिए यह स्पष्ट निष्कर्ष दर्ज किया जाना आवश्यक है कि मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हुए अवैध हिरासत में रखा गया था। मौजूदा मामले में, जैसा कि ऊपर स्पष्ट किया गया है, ऐसा निष्कर्ष संबंधित व्यक्ति के पक्ष में दर्ज नहीं किया जा सकता।”
इस आधार पर हाईकोर्ट ने मुआवजा देने की मांग स्वीकार नहीं की।
हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की, अन्य कानूनी उपाय अपनाने की छूट
आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि याचिका लंबित रहने के दौरान संबंधित व्यक्ति को रिहा कर दिया गया था। इसलिए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर आगे सुनवाई का आधार नहीं रह गया था।
बेंच ने यह भी पाया कि उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर अवैध हिरासत का निष्कर्ष दर्ज नहीं किया जा सकता।
इन कारणों से हाईकोर्ट ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज कर दी।
हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस आदेश से याचिकाकर्ता को कानून के तहत उपलब्ध अन्य उपायों का सहारा लेने से नहीं रोका जाएगा।
याचिकाकर्ता उचित कानूनी मंच के समक्ष उपलब्ध उपचार प्राप्त करने के लिए स्वतंत्र रहेगी।
हाईकोर्ट ने किसी भी पक्ष पर मुकदमे का खर्च नहीं लगाया और सभी लंबित विविध याचिकाओं का भी निस्तारण कर दिया।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: कोंडा विजया लक्ष्मी बनाम आंध्र प्रदेश राज्य एवं अन्य
केस नंबर: रिट याचिका संख्या 7001/2026
बेंच: जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस अलापति गिरिधर
फैसले की तारीख: 30 सितंबर 2026
