सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक अहम फैसले में स्पष्ट किया कि कोई भी राज्य सरकार किसी अस्थाई ट्रस्टी से मंदिर की संपत्ति उपहार या दान के रूप में कानूनी तौर पर हासिल नहीं कर सकती। अदालत ने कहा कि राज्य संरक्षक की भूमिका में होता है, इसलिए वह उन धार्मिक और धर्मार्थ संस्थाओं की संपत्तियों पर न तो खुद कब्जा कर सकता है और न ही अपने अधिकारियों को ऐसा करने की अनुमति दे सकता है, जिनकी सुरक्षा का जिम्मा उसी के पास है।
जस्टिस पी एस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने तमिलनाडु सरकार के पक्ष में हुए जमीन हस्तांतरण को पूरी तरह अमान्य करार दे दिया। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार के रवैये पर नाराजगी जताते हुए उस पर 1,00,000 रुपये का जुर्माना लगाया और यह राशि आठ सप्ताह के भीतर मंदिर को अदा करने का आदेश दिया।
संपत्ति का असली मालिक देवता, राज्य केवल संरक्षक: पीठ
अदालत ने कहा कि देश के धार्मिक संस्थान सदियों से श्रद्धालुओं, राजाओं और आम जनता द्वारा दिए गए चढ़ावे, जमीन, इमारतों और आभूषणों के केंद्र रहे हैं। पीठ ने टिप्पणी की कि जब कोई संपत्ति एक बार अर्पित कर दी जाती है, तो वह दानदाता, पुजारी, ट्रस्टी या सरकार की नहीं रह जाती। वह संपत्ति पूरी तरह से देवता के अधिकार में चली जाती है। इसके बाद जिसके पास भी वह संपत्ति रहती है, वह केवल देवता और पूजा-अर्चना करने वाले समाज के लिए एक ट्रस्टी के रूप में उसकी देखरेख करता है।
इरोड जिले के मंदिर से जुड़ा है पूरा मामला
यह कानूनी विवाद तमिलनाडु के इरोड जिले स्थित कोडुमुडी गांव के नागापलायम मरियाम्मन-पोन्नाचियाम्मन मंदिर की जमीन से संबंधित है। मंदिर ट्रस्ट के अधीन आने वाली इस संपत्ति का क्षेत्रफल एक एकड़ और दस सेंट है, जो सर्वे संख्या 36/4, 36/5 और 41/2 के तहत दर्ज है।
30 अगस्त 2017 को तत्कालीन तहसीलदार ने एक प्रमाण पत्र जारी किया था, जिसमें कहा गया कि मंदिर के अस्थाई ट्रस्टी एस भूपाथी ने यह जमीन सरकार को सौंप दी है। उसी दिन गिफ्ट डीड के जरिए यह जमीन जिला कलेक्टर और तहसीलदार के माध्यम से तमिलनाडु सरकार को दान कर दी गई। प्रशासन ने इस जमीन को तालुक कार्यालय के निर्माण के लिए स्वीकार किया था।
कानून के उल्लंघन पर अदालत ने रद्द की गिफ्ट डीड
इस हस्तांतरण को एम पेरियासामी और तीन अन्य लोगों ने चुनौती दी थी। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि ट्रस्ट की संपत्ति को इस तरह दान में देना तमिलनाडु हिंदू रिलीजियस एंड चैरिटेबल एंडोमेंट्स एक्ट, 1959 की धारा 34 का खुला उल्लंघन है और इसलिए यह पूरी प्रक्रिया गैरकानूनी है।
सुप्रीम कोर्ट ने 1959 के कानून की धारा 41(1) का हवाला देते हुए तमिलनाडु सरकार के पक्ष में निष्पादित गिफ्ट डीड को अमान्य और शून्य घोषित कर दिया और कहा कि इसके पंजीकरण का कोई कानूनी असर नहीं होगा। पीठ ने इस बात पर भी कड़ा रुख अपनाया कि वैधानिक रूप से जमीन का संरक्षक होने के बावजूद राज्य सरकार ने हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक इस अवैध दान का बचाव किया। सरकार ने यह रुख तब तक नहीं बदला जब तक कि धर्मस्व विभाग के मुख्य सचिव को हलफनामा पेश करने के लिए नहीं कहा गया।
पट्टे का नवीनीकरण और किराये में बढ़ोतरी का निर्देश
स्वामित्व के हस्तांतरण को रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमीन पर सरकार के लीज अधिकार को खत्म नहीं किया जाएगा। यदि पट्टे की अवधि समाप्त हो चुकी है, तो उसका नवीनीकरण किया जाएगा।
अदालत ने निर्देश दिया कि निर्माण कार्य के लिए जमीन सौंपे जाने की तारीख यानी 8 मार्च 2019 से इसका किराया बढ़ाकर 31,000 रुपये प्रति माह किया जाए। 1959 के कानून की धारा 34-ए के तहत हर तीन साल में इस किराये की समीक्षा की जाएगी, लेकिन यह राशि 31,000 रुपये से कम नहीं होगी। अदालत ने यह भी साफ किया कि लीज की अवधि, उसके नवीनीकरण और बाकी शर्तें मंदिर का ट्रस्ट तय करेगा, जिसमें मंदिर का हित ही सर्वोच्च प्राथमिकता रहेगा।

