इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भरण-पोषण की बकाया राशि वसूलने के लिए एक साल की समयसीमा समाप्त होने से पत्नी का उस राशि को पाने का अधिकार खत्म नहीं होता। हालांकि, यदि निर्धारित समय के भीतर वसूली के लिए आवेदन नहीं किया गया है, तो दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125(3) के तहत वारंट जारी करने या जेल भेजने जैसी कठोर कार्रवाई के जरिए उस अवधि की बकाया राशि नहीं वसूली जा सकती।
जस्टिस प्रवीण कुमार गिरि ने 15,000 रुपये मासिक भरण-पोषण के आदेश को लागू कराने की मांग वाली महिला की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए कहा कि एक साल से अधिक पुरानी बकाया राशि की वसूली के लिए सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर करने का रास्ता खुला रहता है। हाईकोर्ट ने भरण-पोषण के आदेशों को लागू करने की प्रक्रिया पर भी निर्देश दिए और वसूली की कार्यवाही छह महीने के भीतर पूरी करने को कहा।
कोर्ट ने टिप्पणी की:
“एक साल की अवधि समाप्त हो जाने के बाद भरण-पोषण की बकाया राशि की वसूली के लिए आवेदन करने पर कोई पूर्ण प्रतिबंध नहीं है। एक साल की अवधि बीत जाने से न तो पति की भरण-पोषण देने की जिम्मेदारी समाप्त होती है और न ही पत्नी या बच्चे का भरण-पोषण प्राप्त करने का अधिकार खत्म होता है।”
क्या है पूरा मामला?
मामला एक दंपति के बीच वैवाहिक विवाद से जुड़ा है। दोनों की शादी 16 फरवरी 2021 को हुई थी। फैसले के अनुसार, 22 अगस्त 2021 को महिला को ससुराल से निकाल दिया गया था।
इसके बाद महिला ने CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की मांग करते हुए फैमिली कोर्ट में आवेदन किया।
हमीरपुर के प्रधान न्यायाधीश, फैमिली कोर्ट ने 3 जून 2023 को पति को निर्देश दिया कि वह पत्नी को हर महीने 15,000 रुपये भरण-पोषण के रूप में दे।
महिला के अनुसार, पति ने आवेदन दाखिल करने की तारीख से लेकर कोर्ट के आदेश तक की राशि जमा कर दी थी, लेकिन इसके बाद नियमित रूप से भरण-पोषण का भुगतान नहीं किया।
इस पर महिला ने 8 मई 2026 को CrPC की धारा 125(3) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 144(3) के तहत बकाया राशि की वसूली के लिए आवेदन किया।
फैमिली कोर्ट ने उसी दिन आवेदन खारिज कर दिया। कोर्ट का कहना था कि वसूली का आवेदन एक साल की निर्धारित समयसीमा के बाद दाखिल किया गया है।
महिला ने इस आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट में क्या दलीलें दी गईं?
महिला के वकील ने दलील दी कि 3 जून 2023 का भरण-पोषण आदेश अंतिम हो चुका है। ऐसे में केवल समयसीमा समाप्त होने के आधार पर फैमिली कोर्ट उसके पालन से इनकार नहीं कर सकता।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के पूंगोडी एवं अन्य बनाम थंगावेल (2013) 10 SCC 618 फैसले का हवाला दिया।
दलील दी गई कि भरण-पोषण देना एक निरंतर चलने वाली कानूनी जिम्मेदारी है और एक साल की समयसीमा समाप्त होने से बकाया राशि प्राप्त करने का अधिकार खत्म नहीं होता।
दूसरी ओर, राज्य सरकार की ओर से अपर शासकीय अधिवक्ता पंकज कुमार ने पुनरीक्षण याचिका का विरोध किया।
उन्होंने कहा कि पूंगोडी मामले में भरण-पोषण की वसूली के लिए पहला आवेदन निर्धारित एक साल के भीतर दाखिल किया गया था, जबकि वर्तमान मामले में महिला ने इस अवधि के भीतर कोई आवेदन नहीं किया।
इसलिए फैमिली कोर्ट का जबरन वसूली की कार्यवाही की अनुमति नहीं देने का आदेश कानून के अनुरूप है।
एक साल की समयसीमा से भरण-पोषण का अधिकार खत्म नहीं होता
हाईकोर्ट ने CrPC की धारा 125(3) और BNSS की धारा 144(3) की व्याख्या करते हुए कहा कि भरण-पोषण प्राप्त करने का अधिकार और उसकी जबरन वसूली के लिए उपलब्ध कानूनी प्रक्रिया दो अलग बातें हैं।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि बकाया राशि देय होने के एक साल के भीतर वसूली के लिए आवेदन नहीं किया जाता है, तो उस अवधि की राशि वसूलने के लिए धारा 125(3) के तहत वारंट और हिरासत जैसी कार्रवाई नहीं की जा सकती।
लेकिन इससे भरण-पोषण देने की मूल जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती।
हाईकोर्ट ने कहा:
“CrPC की धारा 125(3) का पहला प्रावधान 3 जून 2023 के आदेश के तहत भरण-पोषण प्राप्त करने के महिला के मूल अधिकार को समाप्त नहीं करता। हालांकि, निर्धारित अवधि के भीतर कोई आवेदन दाखिल नहीं होने के कारण उस अवधि की बकाया राशि के लिए धारा 125(3) के तहत जबरन वसूली की प्रक्रिया नहीं अपनाई जा सकती, जिसके लिए निर्धारित समयसीमा समाप्त हो चुकी है।”
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि भरण-पोषण के आदेश को लागू कराने के लिए पहला आवेदन एक साल के भीतर दाखिल कर दिया गया है और वह लंबित है, तो बाद में हर महीने भुगतान नहीं होने पर अलग-अलग आवेदन दाखिल करना जरूरी नहीं है।
भरण-पोषण की राशि हर महीने देय होती रहती है और इसे चुकाने की जिम्मेदारी भी जारी रहती है, जब तक कि कोई बाद का आदेश इस अधिकार में बदलाव या इसे समाप्त नहीं कर देता।
सुप्रीम कोर्ट के पूंगोडी फैसले का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि उस मामले में पहला वसूली आवेदन समय के भीतर दाखिल हुआ था। वर्तमान मामले में ऐसा नहीं हुआ, इसलिए दोनों मामलों की परिस्थितियां अलग हैं।
हाईकोर्ट ने रजनेश बनाम नेहा (2021) 2 SCC 324 के फैसले का भी उल्लेख किया।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि भरण-पोषण मूल आवेदन की तारीख से दिया जाता है, तो इसका मतलब यह नहीं कि जबरन वसूली के लिए एक साल की अवधि उसी आवेदन की तारीख से शुरू होगी। राशि भरण-पोषण का आदेश पारित होने के बाद लागू कराई जा सकती है।
भरण-पोषण नहीं देने पर जेल भेजने के नियम भी अलग
हाईकोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955, हिंदू दत्तक ग्रहण एवं भरण-पोषण अधिनियम, 1956 और CrPC की धारा 125 के तहत दिए गए भरण-पोषण आदेशों को लागू कराने की अलग-अलग प्रक्रियाओं की भी चर्चा की।
कोर्ट ने बताया कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के तहत लागू किए जाने वाले भरण-पोषण संबंधी आदेशों में धारा 51 और 58 के प्रावधान लागू होते हैं।
जहां डिक्री की राशि 5,000 रुपये से अधिक है, वहां निर्धारित कानूनी शर्तों के अधीन अधिकतम तीन महीने तक सिविल जेल में रखा जा सकता है।
एक बार उसी डिक्री के तहत हिरासत की अवधि पूरी होने के बाद व्यक्ति को उसी डिक्री के निष्पादन में दोबारा जेल नहीं भेजा जा सकता। हालांकि, बकाया राशि चुकाने की जिम्मेदारी बनी रहती है।
इसके विपरीत, CrPC की धारा 125(3) के तहत प्रत्येक महीने के भुगतान में चूक के लिए एक महीने तक की कैद का प्रावधान है, बशर्ते कानून में निर्धारित शर्तें पूरी हों।
कोर्ट ने इस अंतर को समझाने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट के मोहित आनंद बनाम पारुल आनंद (2024 SCC OnLine Del 1968) फैसले का उल्लेख किया।
साथ ही, CrPC की धारा 421 और उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के तहत संपत्ति कुर्क करने और उसकी बिक्री के जरिए वसूली की प्रक्रिया की भी चर्चा की।
भरण-पोषण के आदेश लागू कराने के लिए हाईकोर्ट के निर्देश
हाईकोर्ट ने भरण-पोषण का भुगतान नहीं होने की स्थिति में निचली अदालतों द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया को भी स्पष्ट किया।
कोर्ट ने कहा कि सबसे पहले संबंधित व्यक्ति को CrPC की धारा 125(3) या BNSS की धारा 144(3) के तहत कारण बताओ नोटिस जारी किया जाए और भुगतान नहीं करने का कारण पूछा जाए।
यदि कोई पर्याप्त कारण सामने नहीं आता है, तो अदालत CrPC की धारा 421 या BNSS की धारा 461 के तहत जुर्माने की वसूली के लिए निर्धारित प्रक्रिया अपना सकती है।
इसके तहत चल या अचल संपत्ति से बकाया राशि वसूलने की कार्रवाई की जा सकती है।
यदि उपलब्ध संपत्ति बकाया राशि चुकाने के लिए पर्याप्त नहीं है या संपत्ति उपलब्ध नहीं है, तो संबंधित कानूनी शर्तों के अनुसार गिरफ्तारी वारंट जारी किया जा सकता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि प्रत्येक महीने के भुगतान में चूक के लिए एक महीने तक की कैद हो सकती है। यदि उससे पहले भुगतान कर दिया जाता है, तो संबंधित प्रावधान के अनुसार रिहाई हो सकती है।
कोर्ट ने भरण-पोषण आदेशों की वसूली संबंधी कार्यवाही छह महीने के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट के पेरियम्मल बनाम राजमणि (2025) 9 SCC 568 फैसले का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि अदालत से राहत मिलने के बाद भी यदि उसके आदेश को लागू कराने में अत्यधिक समय लगता है, तो न्याय का उद्देश्य पूरा नहीं होता।
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“यदि अदालत के आदेश या डिक्री को उचित समय के भीतर लागू नहीं किया जाता, तो अदालत द्वारा दी गई राहत अपना प्रभाव खो देती है और केवल कागजी राहत बनकर रह जाती है।”
कोर्ट ने आगे कहा:
“जब मुकदमा जीतने वाले पक्ष को आदेश लागू कराने के लिए लंबे समय तक कार्यवाही से गुजरना पड़ता है, तो न्याय देने का मूल उद्देश्य ही विफल हो जाता है।”
याचिका खारिज, लेकिन सिविल कोर्ट जाने की छूट
मामले के तथ्यों और कानूनी प्रावधानों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि निर्धारित समयसीमा समाप्त होने के कारण जबरन वसूली की अनुमति नहीं देने में फैमिली कोर्ट ने कोई कानूनी गलती नहीं की।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने महिला की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।
हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि महिला एक साल से अधिक पुरानी बकाया भरण-पोषण राशि की वसूली के लिए सिविल कोर्ट में मुकदमा दाखिल कर सकती है।
हाईकोर्ट ने इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के रजनेश बनाम नेहा फैसले में बताए गए कानूनी उपायों का उल्लेख किया।
कोर्ट ने रजिस्ट्रार (अनुपालन) को निर्देश दिया कि फैसले की जानकारी जिला एवं सत्र न्यायाधीश, हमीरपुर तथा प्रधान न्यायाधीश, फैमिली कोर्ट, हमीरपुर को अनुपालन के लिए भेजी जाए।
इसके अलावा फैसले की एक प्रति न्यायिक प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान, उत्तर प्रदेश, लखनऊ को शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए भेजने का भी निर्देश दिया गया।
केस विवरण
केस टाइटल: श्रीमती सुनीता बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य
केस नंबर: आपराधिक पुनरीक्षण (डिफेक्टिव) संख्या 1632/2026
बेंच: जस्टिस प्रवीण कुमार गिरि
फैसले की तारीख: 16 अक्टूबर 2026

