कलकत्ता हाईकोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(ia) के तहत पत्नी को क्रूरता के आधार पर तलाक देने के ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पत्नी को ससुराल से बाहर निकालने के साथ-साथ वर्षों तक पूरी तरह उपेक्षित रखना और अलग रहना मानसिक क्रूरता के दायरे में आता है। जस्टिस मधुरेश प्रसाद और जस्टिस पार्थ प्रतिम रॉय की खंडपीठ ने पति की पहली अपील खारिज करते हुए कहा कि भले ही हिंदू विवाह अधिनियम के तहत शादी का पूरी तरह टूट जाना (इर्रिट्रीवेबल ब्रेकडाउन) तलाक का स्वतंत्र वैधानिक आधार नहीं है, लेकिन एक कड़वे और पूरी तरह खत्म हो चुके रिश्ते के कानूनी दिखावे को जबरन बनाए रखना पक्षों पर मानसिक क्रूरता करना है।
मामले की पृष्ठभूमि
दोनों पक्षों का विवाह हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार 14 जुलाई 2010 को पत्नी के मायके में संपन्न हुआ था। विवाह के बाद पत्नी बांकुड़ा स्थित अपनी ससुराल आ गई। 30 जुलाई 2011 को उसने एक बेटे को जन्म दिया। पत्नी का आरोप था कि बेटे के जन्म के तुरंत बाद पति उस पर मायके से पैसे लाने का दबाव बनाने लगा। चूंकि उसके पिता की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, इसलिए वह इतनी बड़ी रकम लाने में असमर्थ थी।
मांग पूरी न होने पर पति ने उसके साथ शारीरिक और मानसिक अत्याचार करना शुरू कर दिया। पत्नी के अनुसार, पति अक्सर शराब के नशे में घर लौटता और उसके साथ मारपीट करता था। बीमार पड़ने पर उसकी उपेक्षा की गई और इलाज तक नहीं कराया गया। आखिरकार उसे उसके छोटे बच्चे के साथ ससुराल से निकाल दिया गया। इसके बाद पति न तो उससे मिलने उसके मायके गया, न उसे वापस लाने का कोई प्रयास किया और न ही पत्नी या बच्चे के भरण-पोषण के लिए कोई खर्च दिया। इसके बाद पत्नी ने क्रूरता के आधार पर विवाह विच्छेद के लिए पारिवारिक न्यायालय में मुकदमा दायर किया।
पति ने इन आरोपों का खंडन करते हुए अपनी लिखित आपत्ति में सभी दावों को झूठा और मनगढ़ंत बताया। उसने शारीरिक-मानसिक प्रताड़ना और पैसे मांगने के आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि पत्नी खुद ससुराल में नहीं रहना चाहती थी और कई बार बुलाने जाने के बावजूद उसने वापस लौटने से इनकार कर दिया।
ट्रायल कोर्ट में पत्नी ने खुद को और अपनी बड़ी बहन को गवाह के तौर पर पेश किया, जबकि पति अकेले गवाह के रूप में पेश हुआ। ट्रायल कोर्ट ने 12 अक्टूबर 2023 को पत्नी के पक्ष में क्रूरता के आधार पर तलाक की डिक्री पारित कर दी, जिसे पति ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट में दोनों पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता पति के वकील ने दलील दी कि पत्नी क्रूरता के आरोपों को साबित करने में विफल रही है। उन्होंने जिरह का हवाला देते हुए कहा कि पत्नी ने खुद स्वीकार किया था कि उसने पैसे की मांग या प्रताड़ना को लेकर पुलिस स्टेशन या पंचायत में कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई थी और न ही ससुराल छोड़ने के बाद कोई प्राथमिकी दर्ज कराई। वकील ने कहा कि जब क्रूरता की कोई विशिष्ट घटना साबित नहीं हुई, तो केवल लंबे समय तक अलग रहने के आधार पर तलाक नहीं दिया जा सकता, क्योंकि हिंदू विवाह अधिनियम में विवाह के असाध्य रूप से टूटने को तलाक का कानूनी आधार नहीं माना गया है।
इसके जवाब में पत्नी के वकील ने कहा कि पति ने अपने लिखित बयान में केवल गोलमोल इनकार किया, जो कानून की नजर में आरोपों को स्वीकार करने जैसा है। जिरह के दौरान पति ने खुद माना कि उसे अपने बेटे के स्कूल का नाम, उसकी पढ़ाई की स्थिति या पत्नी के वर्तमान पते तक की जानकारी नहीं है। उसने यह भी स्वीकार किया कि उसने बच्चे की शिक्षा के लिए कोई मदद नहीं की।
पत्नी के वकील ने आगे जोर दिया कि जिरह के दौरान पति की ओर से पत्नी के जबरन निकाले जाने की गवाही पर कोई सवाल नहीं उठाया गया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के राकेश रमन बनाम कविता मामले के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि जब वर्षों के आचरण से वैवाहिक रिश्ता पूरी तरह कड़वा और कटु हो चुका हो, तो वह दोनों पक्षों पर क्रूरता बन जाता है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और निष्कर्ष
सबूतों और कानूनी सिद्धांतों का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि हालांकि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 में ‘क्रूरता’ को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है, लेकिन न्यायिक व्याख्या के अनुसार ऐसा कोई भी शारीरिक या मानसिक व्यवहार, जिससे जीवनसाथी के साथ रहना असुरक्षित, नुकसानदेह या असंभव हो जाए, क्रूरता कहलाता है। कोर्ट ने कहा कि मानसिक क्रूरता साबित करना कठिन होता है, लेकिन भावनात्मक जरूरतों की अनदेखी करना या स्नेह वापस ले लेना भी मानसिक पीड़ा पैदा करता है और क्रूरता के दायरे में आता है।
पीठ ने पाया कि पति ने अपनी गवाही में स्वीकार किया कि वह अपने बेटे की पढ़ाई और पत्नी की स्थिति से पूरी तरह अनजान है, जबकि पत्नी का मायका पास के ही गांव भुरकुंडा में स्थित है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि पति की यह स्वीकारोक्ति साबित करती है कि उसका अपनी पत्नी के साथ रहने या एक पति और पिता के रूप में अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने का कोई इरादा नहीं था।
इसके अलावा, कोर्ट ने ट्रायल के दौरान पति की प्रक्रियात्मक विफलता को रेखांकित किया, जहां उसने पत्नी द्वारा दिए गए जबरन बेदखली के बयान पर जिरह ही नहीं की। इस संबंध में कलकत्ता हाईकोर्ट की खंडपीठ के पुराने फैसले (ए.ई.जी. कारापिएत बनाम ए.वाई. देरदेरियन) का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा:
“जब भी कोई विरोधी पक्ष जिरह में अपने मुख्य और महत्वपूर्ण मामले को सामने रखने के अवसर का लाभ उठाने से इनकार करता है, तो यह माना जाना चाहिए कि वह मानता था कि दी गई गवाही को चुनौती नहीं दी जा सकती। इसे केवल साक्ष्य का तकनीकी नियम मानना गलत है। यह न्याय का एक अनिवार्य नियम है। यह मुकदमे में अचानक उत्पन्न होने वाली स्थिति और न्याय की विफलता को रोकता है… यदि वह इस संबंध में कोई प्रश्न नहीं पूछता है, तो यह माना जाएगा कि उसने वादी के पक्ष को पूरी तरह स्वीकार कर लिया है।”
विवाह के पूरी तरह टूटने के बिंदु पर पीठ ने माना कि यद्यपि यह धारा 13 के तहत अलग से आधार नहीं है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के समर घोष बनाम जया घोष मामले के अनुसार, यदि अलगाव लंबा हो जाए तो वैवाहिक बंधन केवल एक औपचारिकता बनकर रह जाता है। कानून द्वारा ऐसे मृत बंधन को जबरन बनाए रखना पक्षों की भावनाओं की अनदेखी करना और मानसिक क्रूरता को बढ़ावा देना है।
सुप्रीम कोर्ट के राकेश रमन बनाम कविता निर्णय को दोहराते हुए पीठ ने रेखांकित किया:
“विवाह का पूरी तरह टूट जाना हिंदू विवाह अधिनियम के तहत विवाह विच्छेद का आधार नहीं हो सकता है, लेकिन क्रूरता एक आधार है… हमारी सुविचारित राय में, एक वैवाहिक रिश्ता जो वर्षों से केवल अधिक कड़वा और कटु होता गया है, वह दोनों पक्षों पर क्रूरता करने के अलावा कुछ नहीं करता। इस टूटी हुई शादी के दिखावे को जीवित रखना दोनों पक्षों के साथ अन्याय करना होगा। हमारी राय में, जो शादी पूरी तरह से टूट चुकी है वह दोनों पक्षों के लिए क्रूरता के समान है… इसलिए यह धारा 13(1)(ia) के तहत विवाह विच्छेद का आधार है।”
निर्णय
हाईकोर्ट ने पाया कि पत्नी को पति के आचरण के कारण ससुराल छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा और दोनों 14 वर्षों से अधिक समय से अलग रह रहे हैं। पति ने पत्नी या बच्चे के प्रति कोई परवाह या संबंध बहाल करने की कोई उत्सुकता नहीं दिखाई।
ट्रायल कोर्ट के फैसले को पूरी तरह उचित मानते हुए खंडपीठ ने पति की अपील को बिना किसी खर्च के खारिज कर दिया और तलाक के आदेश की पुष्टि की।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: अरूप कुमार सुर बनाम आनंदमयी सुर
वाद संख्या: एफ.ए.टी. 423/2023
पीठ: जस्टिस मधुरेश प्रसाद और जस्टिस पार्थ प्रतिम रॉय
निर्णय की तिथि: 14 अक्टूबर, 2026

