अंतरराज्यीय गिरफ्तारी: 24 घंटे के भीतर अधिकार क्षेत्र वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष पेशी होने पर ट्रांजिट रिमांड अनिवार्य नहीं: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट

अंतरराज्यीय गिरफ्तारी की प्रक्रिया से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट की खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि यदि पुलिस गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर (यात्रा का समय छोड़कर) सीधे संबंधित क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश कर देती है, तो ट्रांजिट रिमांड प्राप्त करना अनिवार्य नहीं है। जस्टिस रवि नाथ तिलहारी और जस्टिस अलापति गिरिधर की पीठ ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 22(2) में प्रयुक्त “निकटतम मजिस्ट्रेट” (nearest Magistrate) शब्द भौतिक दूरी के बजाय पेशी में लगने वाले समय के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने बेंगलुरु में गिरफ्तार किए गए और बिना ट्रांजिट रिमांड के सीधे आंध्र प्रदेश में अधिकार क्षेत्र वाले मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए गए एक आरोपी की गिरफ्तारी तथा न्यायिक हिरासत को चुनौती देने वाली बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका खारिज कर दी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह याचिका सबीना प्रकाश द्वारा संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपने पति डॉ. रवि प्रकाश की रिहाई के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट की मांग करते हुए दायर की गई थी। याचिकाकर्ता ने वाईएसआर कडप्पा जिले के मायडुकुर स्थित प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा 31 अगस्त 2026 को अपराध संख्या 229/2026 में पारित रिमांड आदेश को रद्द करने के लिए उत्प्रेषण रिट (सर्टिओरारी) की भी मांग की थी।

याचिका के अनुसार, याचिकाकर्ता के पति और डॉ. पुट्टा रवि कुमार के बीच बेंगलुरु स्थित एक अचल संपत्ति को लेकर लंबे समय से दीवानी विवाद चल रहा था। इस विवाद के कारण दोनों पक्षों के बीच कर्नाटक में कई आपराधिक मामले भी दर्ज हुए थे। इसके बाद 22 जुलाई 2026 को आंध्र प्रदेश के मायडुकुर थाने में चार आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई, जिसमें बेंगलुरु संपत्ति विवाद को अपराध का कारण बताया गया। बाद में डॉ. रवि प्रकाश को आपराधिक साजिश के आरोपों के तहत आरोपी संख्या 5 बनाया गया।

30 अगस्त 2026 को आंध्र प्रदेश पुलिस ने डॉ. रवि प्रकाश को बेंगलुरु से गिरफ्तार किया और आंध्र प्रदेश ले आई। 31 अगस्त 2026 को गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर उन्हें मायडुकुर के प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। याचिकाकर्ता ने इस गिरफ्तारी और स्थानांतरण को चुनौती देते हुए तर्क दिया कि पुलिस ने अंतरराज्यीय परिवहन से पहले बेंगलुरु के निकटतम स्थानीय मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश कर ट्रांजिट रिमांड हासिल नहीं किया, जो संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन है।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील श्री जी.वी.एस. किशोर कुमार ने दलील दी कि बेंगलुरु के निकटतम मजिस्ट्रेट से ट्रांजिट रिमांड न लेना संविधान के अनुच्छेद 22(1) और 22(2) के साथ-साथ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बीएनएसएस) के प्रावधानों का उल्लंघन है। उन्होंने तर्क दिया कि ट्रांजिट रिमांड के अभाव में मायडुकुर के मजिस्ट्रेट द्वारा दिया गया रिमांड आदेश क्षेत्राधिकार से बाहर और शून्य है, जिससे हिरासत असंवैधानिक हो गई है। याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के प्रिया इंदोरिया बनाम कर्नाटक राज्य, मुहम्मद अशफाक सी. बनाम भारत संघ, संदीप कुमार बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली) और गौतम नवलखा बनाम एनआईए जैसे फैसलों पर भरोसा जताया। हालांकि, याचिकाकर्ता के वकील ने यह स्वीकार किया कि रिमांड आदेश से पहले आरोपी और उसके परिवार को गिरफ्तारी के आधार सौंप दिए गए थे, जिससे अनुच्छेद 22(1) का अनुपालन हुआ था।

READ ALSO  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आर्य समाज की सर्वोच्च संस्था को बाल विवाह रोकने के लिए दिशानिर्देश तैयार करने का आदेश दिया

दूसरी ओर, याचिका का विरोध करते हुए सहायक सरकारी वकील श्री जे. कृष्णा प्रणीत ने तर्क दिया कि रिमांड आदेश में कोई अवैधता नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि जांच एजेंसी गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे की कानूनी समयसीमा के भीतर अधिकार क्षेत्र वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश कर देती है, तो ट्रांजिट रिमांड लेना अनिवार्य नहीं है। राज्य सरकार ने कहा कि डॉ. रवि प्रकाश को 24 घंटे के भीतर पेश किया गया था, जिससे संविधान के अनुच्छेद 22(2) और बीएनएसएस, 2023 की धारा 45 की शर्तों का पूरी तरह पालन हुआ। उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट के सत प्रकाश यादव बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली), पटना हाईकोर्ट के उत्तम डागा बनाम भारत संघ और सुप्रीम कोर्ट के छगंती सत्यनारायण बनाम आंध्र प्रदेश राज्य के फैसलों का हवाला दिया।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने विचार के लिए दो मुख्य बिंदु तय किए: पहला, क्या किसी आरोपी को बिना ट्रांजिट रिमांड के 24 घंटे के भीतर सीधे क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करना अनुच्छेद 22(2) का उल्लंघन है? और दूसरा, क्या ट्रांजिट रिमांड न होने से क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट का रिमांड आदेश अमान्य हो जाता है, जिससे बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट जारी की जा सके?

बीएनएसएस, 2023 की धारा 45 का उल्लेख करते हुए पीठ ने रेखांकित किया कि पुलिस अधिकारी बिना वारंट गिरफ्तारी के उद्देश्य से भारत के किसी भी स्थान पर आरोपी का पीछा करने के लिए अधिकृत हैं। संविधान के अनुच्छेद 22(2) में उल्लिखित “निकटतम मजिस्ट्रेट” की व्याख्या करते हुए पीठ ने कहा:

“हमारा मानना है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 22(2) में प्रयुक्त ‘निकटतम मजिस्ट्रेट’ अभिव्यक्ति का संबंध आवश्यक रूप से गिरफ्तारी के स्थान से क्षेत्राधिकार वाले अथवा गैर-क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट की ‘दूरी’ से नहीं है, बल्कि ‘निकटतम’ शब्द गिरफ्तार व्यक्ति को क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करने में लगने वाले समय यानी गिरफ्तारी के 24 घंटे से संबंधित है। ‘निकटतम मजिस्ट्रेट’ का संदर्भ ‘समय’ से है, न कि ‘दूरी’ से।”

पीठ ने आगे स्पष्ट किया:

“जब पुलिस गिरफ्तार व्यक्ति को निर्धारित समय के भीतर क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करने में सक्षम होती है, और ऐसी स्थिति में वह ट्रांजिट रिमांड लेने के लिए गैर-क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश न करके सीधे क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट के सामने 24 घंटे की निर्धारित अवधि में पेश कर देती है, तो हमारे विचार में गिरफ्तार व्यक्ति के अनुच्छेद 22(2) के तहत मिले मौलिक अधिकारों का कोई उल्लंघन नहीं होगा।”

“यदि गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जा सकता है, तो पुलिस के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह पहले ट्रांजिट रिमांड लेने के लिए गैर-क्षेत्राधिकार वाले निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष जाए और फिर रिमांड के लिए अधिकार क्षेत्र वाले मजिस्ट्रेट के पास पहुंचे। यद्यपि क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट तक पहुंचने में देरी होने की स्थिति में अनुच्छेद 22(2) के उल्लंघन से बचने और सुरक्षित रहने के लिए पुलिस ट्रांजिट रिमांड लेने के लिए बाध्य हो सकती है, लेकिन यदि ट्रांजिट रिमांड नहीं लिया गया और गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश कर दिया गया, तो अनुच्छेद 22(2) का कोई उल्लंघन नहीं माना जाएगा।”

याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत फैसलों में अंतर स्पष्ट करते हुए पीठ ने कहा कि प्रिया इंदोरिया का मामला मुख्य रूप से ‘ट्रांजिट अग्रिम जमानत’ से संबंधित था, जबकि मुहम्मद अशफाक सी. का मामला उन परिस्थितियों से जुड़ा था जहां आरोपी को बिना ट्रांजिट रिमांड के 24 घंटे के बाद पेश किया गया था। हाईकोर्ट ने सत प्रकाश यादव और उत्तम डागा के फैसलों से सहमति जताई, जिनमें यह माना गया था कि ट्रांजिट रिमांड का मुख्य उद्देश्य यात्रा में 24 घंटे से अधिक समय लगने की स्थिति में पर्याप्त समय प्राप्त करना होता है।

READ ALSO  अधिवक्ताओं द्वारा दी जा रही गलत सलाह की भर्त्सना होनी चाहिए: सुप्रीम कोर्ट

न्यायिक रिमांड आदेश के खिलाफ बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की स्वीकार्यता पर हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के मनुभाई रतिलाल पटेल बनाम गुजरात राज्य निर्णय का हवाला दिया। कोर्ट ने दोहराया कि जब किसी सक्षम अदालत द्वारा न्यायिक या पुलिस हिरासत का आदेश दिया गया हो, तो उस आदेश के खिलाफ बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट तब तक जारी नहीं की जा सकती जब तक कि वह आदेश पूर्णतः क्षेत्राधिकार विहीन या पूरी तरह अवैध न हो।

कोर्ट का निर्णय

दोनों प्रश्नों का उत्तर नकारात्मक में देते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:

READ ALSO  गाजियाबाद मासूम रेप-मर्डर केस: सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस की 'उदासीनता' पर जताई नाराजगी, दो अस्पतालों को नोटिस

“अतः विचार करने पर हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट द्वारा दिया गया रिमांड आदेश वैध है। यह इस आधार पर अमान्य नहीं ठहराया जा सकता कि क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करने से पहले गिरफ्तारी स्थल के निकटतम गैर-क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट से ट्रांजिट रिमांड नहीं लिया गया था। बंदी को गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया और रिमांड मंजूर की गई। रिमांड के लिए क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करने हेतु ट्रांजिट रिमांड लेना अनिवार्य नहीं है। यदि ट्रांजिट रिमांड नहीं लिया गया है लेकिन फिर भी गिरफ्तार व्यक्ति को यात्रा का समय छोड़कर गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश कर दिया जाता है, तो संविधान के अनुच्छेद 22(2) का कोई उल्लंघन नहीं होगा। हिरासत रिमांड आदेश के तहत है जो वैध है, इसलिए यह अवैध हिरासत नहीं है।”

हिरासत और रिमांड आदेश में कोई अवैधता न पाते हुए हाईकोर्ट ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को बिना किसी खर्च के खारिज कर दिया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: सबीना प्रकाश बनाम आंध्र प्रदेश राज्य एवं अन्य

वाद संख्या: रिट याचिका संख्या 26235/2026

पीठ: जस्टिस रवि नाथ तिलहारी और जस्टिस अलापति गिरिधर

निर्णय की तिथि: 13.10.2026

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles