नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि संस्थान की लिपिकीय भूल (क्लेरिकल लैप्स) का खामियाजा किसी वास्तविक छात्र को नहीं भुगतना पड़ सकता और न ही इसके आधार पर उसका करियर रोका जा सकता है। शीर्ष अदालत ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत छात्रों को सिविल कोर्ट जाने के लिए कहा गया था। इसके साथ ही कोर्ट ने मानव भारती यूनिवर्सिटी और राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वे जम्मू-कश्मीर में बिना वेतन काम कर रहे एक कर्मचारी के शैक्षणिक दस्तावेजों का सत्यापन पूरा करें। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और जस्टिस संदीप मेहता की तीन जजों की पीठ ने माना कि यूनिवर्सिटी की आंतरिक विसंगतियों और प्रशासनिक चूकों का प्रतिकूल प्रभाव उस छात्र पर नहीं डाला जा सकता, जिसने वैध तरीके से दाखिला लिया, सभी परीक्षाएं पास कीं और डिग्री हासिल की।
अपीलकर्ता मोहम्मद असद चौधरी ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट (शिमला) के 20 दिसंबर 2024 के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने सीडब्ल्यूपी संख्या 14955/2024 (संबद्ध सीडब्ल्यूपीआईएल संख्या 22/2022) में सत्यापन दावों का निपटारा करने से इनकार करते हुए अपीलकर्ता सहित अन्य छात्रों को सक्षम सिविल कोर्ट जाने का निर्देश दिया था।
मामले की पृष्ठभूमि
मोहम्मद असद चौधरी ने शैक्षणिक सत्र 2014-2018 के लिए मानव भारती यूनिवर्सिटी में बी.टेक (सिविल इंजीनियरिंग) पाठ्यक्रम में प्रवेश लिया था। उन्हें एडमिशन नंबर R14BTCE0031 और रजिस्ट्रेशन नंबर MBU-2014-0964 आवंटित हुआ था। आठों सेमेस्टर पूरे करने के बाद उन्हें सभी सेमेस्टरों के डिटेल्ड मार्क्स सर्टिफिकेट (डीएमसी), बोनाफाइड, माइग्रेशन और कैरेक्टर सर्टिफिकेट 14 सितंबर 2018 को जारी किए गए। इसके बाद 15 अक्टूबर 2018 को उन्हें बी.टेक डिग्री प्रदान की गई, जिसमें दर्ज था कि उन्होंने मई 2018 की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की है।
पाठ्यक्रम पूरा होने के बाद अपीलकर्ता की नियुक्ति जम्मू-कश्मीर के राज्य कर विभाग में सब-इंस्पेक्टर के पद पर हो गई। एडिशनल कमिश्नर, स्टेट टैक्सेज (प्रशासन एवं प्रवर्तन), कश्मीर के कार्यालय ने मई 2022, सितंबर 2023, दिसंबर 2023 और जुलाई 2024 में पत्रों के माध्यम से यूनिवर्सिटी से उनकी डिग्री के सत्यापन का अनुरोध किया। नियोक्ता ने स्पष्ट किया कि उनकी नियुक्ति शैक्षणिक दस्तावेजों के सत्यापन के अधीन है। सत्यापन न होने के कारण अपीलकर्ता बिना वेतन के अपनी सेवाएं देने को मजबूर थे।
इसी बीच, मानव भारती यूनिवर्सिटी द्वारा कथित तौर पर डिग्रियां बेचे जाने की शिकायतों के बाद तत्कालीन प्रशासन के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हुए और एसआईटी (विशेष जांच दल) ने सारे रिकॉर्ड जब्त कर लिए। इसके चलते छात्रों को अपने शैक्षणिक दस्तावेज हासिल करने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। छात्रों द्वारा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को लिखे गए पत्र के आधार पर सीडब्ल्यूपीआईएल संख्या 22/2022 दर्ज की गई। हाईकोर्ट के निर्देश पर राज्य सरकार ने 16 अगस्त 2022 को एसपी सोलन की अध्यक्षता में एक दस्तावेज सत्यापन समिति गठित की, जिसमें यूनिवर्सिटी प्रशासक और हिमाचल प्रदेश निजी शैक्षणिक संस्थान नियामक आयोग (एचपी-पीईआरसी) के सचिव भी शामिल थे।
यूनिवर्सिटी के रिकॉर्ड से यह पुष्टि हुई कि अपीलकर्ता 2014-15 सत्र में स्वीकृत सीटों पर नामांकित थे और उनका नाम आंतरिक ‘ग्रीन शीट’ में मौजूद था। हालांकि, उनका नाम नियामक आयोग (एचपी-पीईआरसी) को भेजी गई एडमिशन डिस्क्लोजर लिस्ट में शामिल नहीं था। इसके अलावा, सातवें और आठवें सेमेस्टर के रिजल्ट गजट और ग्रीन शीट के अंकों में विसंगति पाई गई। हाईकोर्ट ने इन तथ्यों को विवादित मानते हुए मामले को बंद कर दिया और छात्रों को दीवानी अदालत जाने की छूट दे दी।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दलीलें
अपीलकर्ता के वकील ने दलील दी कि छात्र ने स्वीकृत सीट पर प्रवेश लिया, हर सेमेस्टर की परीक्षा पास की और उसे सभी प्रामाणिक दस्तावेज जारी किए गए। वकील ने कहा कि उनका नाम मूल ग्रीन रजिस्टर और परीक्षा रिकॉर्ड दोनों में दर्ज है। उनकी शिकायत दस्तावेज जारी कराने को लेकर नहीं, बल्कि नियोक्ता द्वारा 2022 से मांगे जा रहे सत्यापन को लेकर है। उन्होंने कहा कि डिस्क्लोजर लिस्ट में नाम न भेजना यूनिवर्सिटी की प्रशासनिक गलती थी, जिस पर छात्र का कोई नियंत्रण नहीं था। ऐसे में दो साल से अधिक समय तक याचिका लंबित रहने के बाद, बिना वेतन काम कर रहे छात्र को सिविल कोर्ट भेजना बेहद कष्टकारी और अनुचित है।
दूसरी ओर, राज्य सरकार और पुलिस महानिदेशक की ओर से कहा गया कि समिति ने पाया कि अपीलकर्ता का नाम 2014-15 के ग्रीन रजिस्टर में तो था, लेकिन नियामक आयोग को भेजी गई सूची में नहीं था। साथ ही, सातवें सेमेस्टर (783/1300) और आठवें सेमेस्टर (920/1300) के रिजल्ट गजट के अंक ग्रीन शीट के अंकों (क्रमशः 863/1300 और 946/1300) से मेल नहीं खा रहे थे, जिसके कारण समिति सत्यापन नहीं कर सकी।
यूनिवर्सिटी ने अपने जवाबी हलफनामे में स्वीकार किया कि अपीलकर्ता स्वीकृत सीट पर नामांकित थे और उन्होंने सभी सेमेस्टर पास किए थे। यूनिवर्सिटी ने माना कि उनका नाम प्राथमिक आंतरिक रिकॉर्ड ‘ग्रीन शीट रजिस्टर’ में दर्ज है, लेकिन पूर्व प्रशासन की लिपिकीय और मानवीय भूल के कारण उनका नाम नियामक आयोग को भेजी गई डिस्क्लोजर लिस्ट में शामिल नहीं हो सका। वहीं, एसपी सोलन ने अतिरिक्त हलफनामे में स्पष्ट किया कि मूल रिकॉर्ड ट्रायल कोर्ट के पास हैं और समिति के पास यूनिवर्सिटी के रिकॉर्ड में बदलाव या संशोधन करने का अधिकार नहीं है।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह द्वारा लिखे गए फैसले में पीठ ने माना कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से अपीलकर्ता का एक वास्तविक (बोनाफाइड) छात्र होना पूरी तरह सिद्ध होता है। पीठ ने टिप्पणी की:
“रिकॉर्ड पर मौजूद हलफनामों और दस्तावेजों से इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता कि अपीलकर्ता यूनिवर्सिटी का एक वास्तविक छात्र था, जिसे आवंटित सीट पर प्रवेश मिला था और जिसने अपनी सभी परीक्षाएं दीं और उत्तीर्ण कीं। प्रवेश प्रकटीकरण सूची से उसका नाम छूटना, यूनिवर्सिटी की अपनी स्वीकारोक्ति के अनुसार, उसकी अपनी चूक है जिसमें अपीलकर्ता की कोई भूमिका नहीं थी। इस तरह की चूक का कोई प्रतिकूल परिणाम अपीलकर्ता पर नहीं डाला जा सकता, और न ही यह उसके शैक्षणिक रिकॉर्ड के सत्यापन को रोकने का कोई आधार हो सकता है।”
सातवें और आठवें सेमेस्टर के अंकों में विसंगति पर विचार करते हुए कोर्ट ने पाया कि रिजल्ट गजट और ग्रीन शीट दोनों के ही अनुसार छात्र का परिणाम स्पष्ट रूप से ‘पास’ दर्ज है। पीठ ने कहा:
“इस प्रकार, यह विसंगति अपीलकर्ता के प्रवेश, यूनिवर्सिटी में उसके छात्र होने की स्थिति या उसके द्वारा पाठ्यक्रम उत्तीर्ण करने के तथ्य को प्रभावित नहीं करती है। इसलिए, यह स्थापित होता है कि अपीलकर्ता ने पूरी तरह से सभी परीक्षाएं और वास्तव में पूरा पाठ्यक्रम वैध रूप से उत्तीर्ण किया था और वह अपनी पात्रता के अनुसार डिग्री प्राप्त करने का हकदार था।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दोनों में से कौन सा अंक सही है, यह केवल यूनिवर्सिटी के आंतरिक परीक्षा रिकॉर्ड के सत्यापन का विषय है। इसके लिए छात्र द्वारा कोई साक्ष्य पेश करने की आवश्यकता नहीं है और न ही इसके लिए उसे सिविल कोर्ट में धकेला जाना उचित है।
शीर्ष अदालत का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए 20 दिसंबर 2024 के हाईकोर्ट के आदेश को अपीलकर्ता की हद तक रद्द कर दिया और सत्यापन प्रक्रिया समयबद्ध तरीके से पूरी करने के लिए निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- राज्य सरकार को निर्देश दिया गया कि वह समिति के पास उपलब्ध अपीलकर्ता के सातवें और आठवें सेमेस्टर के परीक्षा परिणाम से जुड़े रिकॉर्ड यूनिवर्सिटी को उपलब्ध कराए।
- इन रिकॉर्ड्स के आधार पर यूनिवर्सिटी अपीलकर्ता को सातवें और आठवें सेमेस्टर के संशोधित अंकपत्र (डीएमसी) और जरूरी परिणामी प्रमाण पत्र जारी करेगी।
- यूनिवर्सिटी आज से तीन सप्ताह के भीतर अपीलकर्ता के शैक्षणिक दस्तावेजों की औपचारिक सत्यापन रिपोर्ट उसके नियोक्ता यानी एडिशनल कमिश्नर, स्टेट टैक्सेज (प्रशासन एवं प्रवर्तन), कश्मीर को भेजेगी।
- सत्यापन रिपोर्ट मिलने के चार सप्ताह के भीतर नियोक्ता अपीलकर्ता के बकाया वेतन (एरियर) का भुगतान करेगा और सभी परिणामी सेवा लाभ प्रदान करेगा।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस अपील में वाद-व्यय को लेकर कोई आदेश नहीं दिया जा रहा है और सभी लंबित अर्जियों का निस्तारण किया जाता है।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: मोहम्मद असद चौधरी बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य व अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या ___ / 2026 (एसएलपी (सिविल) संख्या 474/2026 से उद्भूत)
पीठ: जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस संदीप मेहता
निर्णय की तिथि: 14 अक्टूबर 2026

