पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने सेवा से बर्खास्त चंडीगढ़ पुलिस के एक पूर्व सिपाही की पेंशन याचिका खारिज कर दी है। याचिकाकर्ता ने बर्खास्तगी से पहले की गई लगभग 12 साल की सेवा के आधार पर पेंशन लाभ की मांग की थी। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब सेवा नियमों के तहत बर्खास्तगी के बाद पिछली सेवा जब्त करने का प्रावधान हो, तो गंभीर अनुशासनहीनता के चलते हटाए गए कर्मचारी अधिकार के तौर पर पेंशन का दावा नहीं कर सकते।
जस्टिस नमित कुमार ने 7 अक्टूबर को यह फैसला सुनाते हुए टिप्पणी की कि सरकारी सेवा में अनुशासन, समय की पाबंदी और वैध आदेशों का पालन करना अनिवार्य शर्त है। अदालत ने कहा कि कोई भी कर्मचारी अपनी मर्जी से ड्यूटी से नदारद नहीं रह सकता और फिर पूर्व सेवा अवधि का हवाला देकर बर्खास्तगी के कानूनी परिणामों से नहीं बच सकता। अदालत ने साफ किया कि पेंशन की पात्रता को बर्खास्तगी के वैधानिक परिणामों से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
बिना मंजूरी विदेश यात्रा और ड्यूटी से गैरहाजिरी
याचिकाकर्ता को 11 अगस्त 1994 को चंडीगढ़ पुलिस की सुरक्षा शाखा (सिक्योरिटी विंग) में सिपाही के पद पर नियुक्त किया गया था। साल 2007 में उसने 19 फरवरी से 4 अप्रैल तक 45 दिनों का अर्जित अवकाश लिया, जिसे विभाग ने बाद में 2 अगस्त 2007 तक बढ़ा दिया था।
छुट्टी खत्म होने के बाद उसे 3 अगस्त 2007 को ड्यूटी पर लौटना था, लेकिन वह हाजिर नहीं हुआ और बिना किसी आधिकारिक अनुमति के गैरहाजिर रहा। विभागीय जांच में सामने आया कि वह विभाग को सूचित किए बिना और अनिवार्य विदेश यात्रा मंजूरी लिए बिना इंग्लैंड चला गया था। उसने छुट्टी के आवेदनों में भी विदेश यात्रा का कोई जिक्र नहीं किया था। अधिकारियों ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता की पत्नी ने उसके विदेश में होने की पुष्टि की थी और वह उस दौरान फोन के जरिए उसके संपर्क में थी।
विभागीय कार्रवाई और याचिकाओं में देरी
लगातार अनुपस्थित रहने पर विभाग ने सिपाही को निलंबित कर उसके खिलाफ औपचारिक विभागीय जांच शुरू कर दी। बार-बार नोटिस भेजने के बावजूद जब वह जांच में शामिल नहीं हुआ, तो यह कार्यवाही एकतरफा (एक्स-पार्टे) पूरी की गई।
इसके बाद 9 जून 2008 को उसे सेवा से बर्खास्तगी का कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। नोटिस का जवाब न देने और सक्षम प्राधिकारी के समक्ष पेश न होने पर 2008 में ही उसे सेवा से बर्खास्त करने का आदेश जारी कर दिया गया।
पूर्व सिपाही ने छह साल के लंबे अंतराल के बाद इस बर्खास्तगी आदेश को चुनौती दी, लेकिन अपीलीय प्राधिकारी ने 2015 में उसकी अपील खारिज कर दी। इसके बाद 2020 में दायर उसकी पुनर्विचार याचिका भी खारिज हो गई। इसके बाद उसने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाकर बर्खास्तगी से पहले की अपनी 11 साल 9 महीने की नियमित सेवा के लिए पेंशन लाभ दिए जाने की गुहार लगाई।
अदालत में दोनों पक्षों के तर्क और फैसला
हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता की वकील सुखजीत कौर ने दलील दी कि उनके मुवक्किल ने 11 साल और 9 महीने की नियमित सेवा पूरी की है, इसलिए बर्खास्तगी के बावजूद वह पेंशन का हकदार है। याचिकाकर्ता ने अपनी अनुपस्थिति के बचाव में सिर की चोट और याददाश्त चले जाने का भी हवाला दिया।
वहीं राज्य सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त महाधिवक्ता सिद्धार्थ संधू ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि सेवा नियमों में बर्खास्त कर्मचारी को पेंशन देने का कोई प्रावधान नहीं है। उन्होंने मेडिकल आधार पर किए गए दावे को भी खारिज करते हुए कहा कि यह बाद में गढ़ा गया बहाना प्रतीत होता है, क्योंकि उस दौरान विभाग को कोई भी प्रामाणिक मेडिकल रिकॉर्ड नहीं सौंपा गया था।
जस्टिस नमित कुमार ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि पुलिस जैसे अनुशासित बल में बिना अनुमति लंबे समय तक गैरहाजिर रहना गंभीर कदाचार है। अदालत ने कहा कि चूंकि लागू नियमों के अनुसार बर्खास्तगी के साथ ही पूर्व सेवा समाप्त मान ली जाती है, इसलिए याचिकाकर्ता के पास पेंशन पाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं बनता।

