इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किशोर जोड़ों से जुड़े मामलों में ‘प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेस’ (पॉक्सो) एक्ट, 2012 के कड़े प्रावधानों पर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने भारतीय विधि आयोग से सिफारिश की है कि वह देश की सामाजिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए इस कानून में जरूरी संशोधनों का प्रस्ताव तैयार करे। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आपसी सहमति और आकर्षण से बने रिश्तों—विशेष रूप से जहां बच्चे का जन्म हो चुका हो—वहां पॉक्सो कानून को अक्षरशः और कठोरता से लागू करने का परिणाम न्याय दिलाने के बजाय अन्याय को बढ़ावा देने वाला साबित हो सकता है।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की खंडपीठ ने 5 अक्टूबर के अपने आदेश में कहा कि अगर कानून की अज्ञानता के सिद्धांत को बिना जमीनी हकीकत समझे थोप दिया जाए, तो यह उस पूरे परिवार को तबाह कर सकता है जिसे नाबालिग लड़कियों के संरक्षण के नाम पर ही बचाया जाना चाहिए था।
जेल की जगह सामुदायिक सेवा जैसे विकल्पों पर हो विचार
हाईकोर्ट ने विधि आयोग को सुझाव दिया कि ऐसे मामलों में जहां कम उम्र के जोड़े कानूनी बारीकियों से अनजान होकर दांपत्य संबंध बना लेते हैं, वहां जेल भेजने के बजाय गैर-हिरासत सजाओं पर गौर किया जाना चाहिए। अदालत के अनुसार, सामुदायिक सेवा (कम्युनिटी सर्विस) जैसे सुधारात्मक दंड के विकल्पों को कानून में शामिल किया जाना चाहिए, ताकि अनजाने में बने परिवारों को संरक्षण के नाम पर बिखरने से रोका जा सके।
पीठ ने रेखांकित किया कि कानून बनाते समय देश के सामाजिक ताने-बाने पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। भारत की एक बड़ी आबादी अभी भी निरक्षर या अर्ध-शिक्षित है, जिसे न तो संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों की पूरी समझ है और न ही वे अपने कानूनी कर्तव्यों और कानूनी परिणामों से वाकिफ हैं।
15 वर्ष की उम्र में आकर्षण स्वाभाविक, पहले शिक्षा दे सरकार
अदालत ने मानवीय विकास और कानूनी जवाबदेही के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि 15 वर्ष के किसी किशोर या किशोरी में शारीरिक व भावनात्मक परिपक्वता आने पर विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण महसूस होना एक स्वाभाविक जैविक प्रक्रिया है।
खंडपीठ ने टिप्पणी की कि ऐसे बच्चों से यह उम्मीद करना कि वे अपने आचरण के कानूनी नतीजों को समझें, तभी न्यायसंगत हो सकता है जब सरकार पहले यह सुनिश्चित करे कि हर नाबालिग 18 वर्ष की उम्र तक अनिवार्य और सार्थक शिक्षा प्राप्त करे। इसके साथ ही उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए व्यावसायिक कौशल भी मुहैया कराया जाना चाहिए।
बाल गृह में जन्मा शिशु, बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई
हाईकोर्ट का यह रुख एक बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया। यह याचिका पॉक्सो कानून के तहत आरोपी बनाए गए एक युवक ने दायर की थी, जिसमें उसने अपनी पत्नी को प्रशासन की हिरासत से मुक्त कराने की मांग की थी। मामले के अनुसार, दोनों घर से चले गए थे और 1 सितंबर 2025 को उन्होंने एक संयुक्त हलफनामा देकर खुद को पति-पत्नी घोषित किया था।
राज्य सरकार और युवती के पिता की ओर से पेश हुए अधिवक्ता दीपक कपूर ने याचिका का विरोध करते हुए दलील दी कि पारिवारिक रिकॉर्ड के अनुसार युवती नाबालिग थी। बरामदगी के बाद उसे राजकीय बाल गृह भेज दिया गया था, जहां उसने एक बच्चे को जन्म दिया। सुनवाई के समय यह बच्चा दो माह से अधिक उम्र का था और याचिकाकर्ता ही उसका पिता था।
हाईकोर्ट ने पाया कि यह मामला सिर्फ वैवाहिक विवाद तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि एक नवजात शिशु के जीवन और उसके भरण-पोषण से जुड़ चुका है। यदि पिता को दोषी ठहराकर जेल में डाल दिया जाता है, तो उस मासूम की देखभाल पूरी तरह असंभव हो जाएगी।
कक्षा पांच के बाद छूटी पढ़ाई, ऑसिफिकेशन टेस्ट से तय हुई उम्र
अदालत ने उम्र के निर्धारण पर गौर करते हुए पाया कि कानूनी नियमों के तहत जरूरी दस्तावेज—जैसे जन्म प्रमाण पत्र या 10वीं (मैट्रिक) का सर्टिफिकेट—मौजूद नहीं थे। युवती के पिता ने अदालत को बताया कि उनकी बेटी ने केवल कक्षा पांच तक ही पढ़ाई की थी, जिसके चलते उसका कोई स्कूल बोर्ड रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था।
ऐसी स्थिति में अदालत ने मेडिकल ऑसिफिकेशन टेस्ट की रिपोर्ट पर भरोसा किया, जिसमें युवती की उम्र लगभग 18 वर्ष आंकी गई थी। मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर उसे बालिग मानते हुए और उसकी अपनी इच्छा को दर्ज करते हुए, हाईकोर्ट ने युवती को अपने पति के साथ जाने की अनुमति प्रदान कर दी।

