इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्वयं के अनुरोध पर सेवामुक्त हुए भूतपूर्व सैनिकों को फिजिकल एंड्योरेंस टेस्ट में शामिल करने का दिया निर्देश, सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर किया विचार

भूतपूर्व सैनिकों को मिलने वाले आरक्षण के लाभ से जुड़े एक अहम मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के जस्टिस पंकज भाटिया ने पंद्रह ऐसे पूर्व सैनिकों को जारी फिजिकल एंड्योरेंस टेस्ट (पीईटी) में शामिल करने का अंतरिम निर्देश दिया है, जिन्होंने अपनी मर्जी से सेना की सेवा छोड़ी थी। याचिकाकर्ताओं ने उत्तर प्रदेश लोक सेवा (शारीरिक रूप से विकलांग, स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के आश्रित और भूतपूर्व सैनिकों के लिए आरक्षण) अधिनियम, 1993 की धारा 2(ग)(चार) की संकीर्ण व्याख्या के आधार पर भर्ती से बाहर किए जाने को चुनौती दी थी। कोर्ट ने माना कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित विधि के मद्देनजर इस वैधानिक पात्रता के प्रश्न पर विस्तृत विचार किए जाने की आवश्यकता है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह याचिका मनोज कुमार पांडे और चौदह अन्य पूर्व सैनिकों द्वारा दाखिल की गई थी। याचिकाकर्ताओं ने भर्ती प्रक्रिया में भाग लेकर लिखित परीक्षा सफलतापूर्वक पास की थी और उनके दस्तावेजों का सत्यापन भी पूरा हो चुका था।

इसके बावजूद, भर्ती प्राधिकारियों ने उन्हें फिजिकल एंड्योरेंस टेस्ट में शामिल होने की अनुमति देने से इनकार कर दिया। प्राधिकारियों का यह रुख 1993 के आरक्षण अधिनियम की धारा 2(ग)(चार) के आधार पर था। इस प्रावधान के अनुसार, “भूतपूर्व सैनिक” वह व्यक्ति है जिसने थलसेना, नौसेना या वायुसेना में सेवा की हो और विशिष्ट निर्धारित अवधि पूरी करने के बाद सेवा से मुक्त हुआ हो, “किन्तु अपनी स्वयं की प्रार्थना पर निर्मुक्त नहीं किया गया है, या दुराचरण या अदक्षता के कारण पदच्युत या सेवामुक्त नहीं किया गया है और जिसे ग्रेच्युटी प्रदान की गयी है।”

चूंकि इन अभ्यर्थियों ने अपने स्वयं के अनुरोध पर सेना से डिस्चार्ज लिया था, इसलिए प्रशासन ने उन्हें भूतपूर्व सैनिक आरक्षण का लाभ पाने के लिए अयोग्य करार दे दिया।

पक्षकारों की दलीलें

याचिकाकर्ताओं के वकीलों कृष्ण कन्हैया पाल और पूजा पाल ने दलील दी कि स्वयं के अनुरोध पर सेवा से मुक्त हुए पूर्व सैनिकों को फिजिकल टेस्ट से बाहर रखना पूरी तरह गलत है। उन्होंने कहा कि इसी तरह के प्रतिबंधात्मक प्रावधान पर सुप्रीम कोर्ट ने संसार चंद अत्री बनाम पंजाब राज्य, (2002) 4 एससीसी 154 के मामले में विस्तार से फैसला सुनाया था, जहां पंजाब सेवा नियमावली, 1982 के नियम 2(ग) की व्याख्या की गई थी।

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याचिकाकर्ताओं ने कहा कि उनका दावा भी उसी कानूनी सिद्धांत पर आधारित है। उन्होंने जोर दिया कि चूंकि फिजिकल एंड्योरेंस टेस्ट वर्तमान में चल रहा है, इसलिए उन्हें अंतरिम राहत के तौर पर परीक्षा में शामिल होने की अनुमति दी जाए। याचिकाकर्ताओं ने इस संबंध में इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा रिट ए संख्या 16700/2026 में 6 अक्टूबर 2026 को पारित अंतरिम आदेश का भी हवाला दिया।

दूसरी ओर, राज्य सरकार की ओर से पेश स्टैंडिंग काउंसिल ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि धारा 2(ग)(चार) की स्पष्ट परिभाषा के तहत याचिकाकर्ता इस लाभ के हकदार नहीं हैं। राज्य सरकार का कहना था कि याचिकाकर्ता भर्ती विज्ञापन और नियमों में दर्ज अपनी सीमाओं से भली-भांति वाकिफ थे, फिर भी वे चयन प्रक्रिया के अंतिम चरण में कोर्ट पहुंचे हैं, इसलिए वे किसी न्यायिक राहत के पात्र नहीं हैं। इसके अलावा, दस्तावेज सत्यापन में निर्धारित योग्यता पूरी न करने के कारण ही उन्हें फिजिकल टेस्ट के लिए नहीं बुलाया गया।

हाईकोर्ट का कानूनी विश्लेषण

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जस्टिस पंकज भाटिया ने कहा कि यद्यपि नियम 2(ग)(चार) को सीधे तौर पर पढ़ने से पहली नजर में याचिकाकर्ता अयोग्य प्रतीत होते हैं, लेकिन पंजाब नियमों के समान प्रावधान पर सुप्रीम कोर्ट ने संसार चंद अत्री मामले में राज्य सरकार के रुख के विपरीत निर्णय दिया था। ऐसे में इस मामले पर विचार करना जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट ने संसार चंद अत्री मामले में “अन्यथा अपनी स्वयं की प्रार्थना पर” जैसी प्रतिबंधात्मक शर्त पर टिप्पणी करते हुए कहा था:

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“नौकरियों की पेशकश के उद्देश्य से सभी पूर्व रक्षा कर्मियों को अन्य उम्मीदवारों से अलग एक विशेष वर्ग माना जाना चाहिए और उनके बीच तब तक कोई भेद या भेदभाव नहीं किया जा सकता, जब तक कि ऐसा अंतर वास्तविक और ठोस न हो। इस संदर्भ में प्रावधानों की जांच करने पर हमारा मानना है कि सेना का कोई भी व्यक्ति, जिसने सेना छोड़ने से पहले आवश्यक सेवा अवधि पूरी करके पेंशन अर्जित कर ली है—चाहे वह अपने अनुरोध पर सेवामुक्त हुआ हो या नियोक्ता द्वारा हटाया गया हो अथवा किसी भी अन्य आधार पर—उसे सेना से सेवानिवृत्त भूतपूर्व सैनिक ही माना जाना चाहिए। ऐसे सभी व्यक्तियों के साथ एक जैसा व्यवहार किया जाना चाहिए, भले ही उनके लिए ‘रिलीज़’, ‘डिस्चार्ज’ या ‘रिटायर्ड’ में से किसी भी शब्द का उपयोग किया गया हो। यदि सेवा आयोग और राज्य सरकार की ओर से दी गई यह दलील स्वीकार कर ली जाए कि अपीलकर्ता अपने अनुरोध पर सेना से डिस्चार्ज हुआ है इसलिए उसे भूतपूर्व सैनिक नहीं माना जा सकता, तो यह बिना किसी तार्किक आधार के एक वर्ग के भीतर दूसरा वर्ग बना देगा और इस कारण मनमाना व भेदभावपूर्ण होगा। इससे आरक्षण के प्रावधान का मूल उद्देश्य भी विफल हो जाएगा।”

सुप्रीम कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया था:

“केवल इस तथ्य से कि इतनी लंबी सेवा के बाद उसने नियोक्ता की सहमति से स्वेच्छा से सेवा छोड़ी है, उसे भूतपूर्व सैनिक के आरक्षण का लाभ पाने से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। इसलिए, नियम के पीछे के उद्देश्य को प्रभावी बनाने के लिए ‘सेवानिवृत्ति’ शब्द को व्यापक अर्थ दिया जाना चाहिए।”

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के इन महत्वपूर्ण निष्कर्षों को संज्ञान में लेते हुए कहा कि मामला विस्तृत सुनवाई योग्य है।

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कोर्ट का निर्णय

अंतरिम राहत प्रदान करते हुए हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं को फिजिकल एंड्योरेंस टेस्ट में शामिल होने की अनुमति दी जाए। हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि याचिकाकर्ता केवल इस आधार पर किसी विशेष अधिकार या साम्या का दावा नहीं कर सकेंगे कि वे कोर्ट के निर्देश पर इस परीक्षा में शामिल हुए थे।

अदालत ने कहा कि नियमों की शर्तों के आलोक में याचिकाकर्ताओं के मूल दावे का निस्तारण सभी पक्षों के हलफनामे आने के बाद किया जाएगा। हाईकोर्ट ने प्रतिवादियों को अपना जवाबी हलफनामा (काउंटर एफिडेविट) दाखिल करने के लिए दस दिन का समय दिया और उसके बाद याचिकाकर्ताओं को प्रत्युत्तर (रिजॉइंडर एफिडेविट) दाखिल करने के लिए तीन दिन का समय दिया।

मामले को अगली सुनवाई के लिए 28 अक्टूबर 2026 को उपयुक्त पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया है। साथ ही, स्टैंडिंग काउंसिल को निर्देश दिया गया कि वे कानून के अनुसार अनुपालन के लिए संबंधित प्राधिकारियों को इस आदेश की तत्काल सूचना दें।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: मनोज कुमार पांडे और 14 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य जरिए प्रमुख सचिव गृह एवं 4 अन्य 

वाद संख्या: रिट ए संख्या 10734/2026 

पीठ: जस्टिस पंकज भाटिया 

निर्णय की तिथि: 10 अक्टूबर 2026

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