दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) और स्वामी श्रद्धानंद कॉलेज को एक रिटायर्ड शिक्षक के वेतन और सेवानिवृत्ति कोष से काटे गए 25.75 लाख रुपये लौटाने का आदेश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि दशकों पुरानी स्टडी लीव के दौरान केवल पीएचडी की थीसिस जमा न कर पाने के आधार पर किसी शिक्षक के वेतन और पेंशन लाभ में कटौती करना कानूनन गलत है।
जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने 8 अक्टूबर को सुनाए अपने फैसले में विश्वविद्यालय प्रशासन के 2011 और कॉलेज के 2012 के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनके तहत शिक्षक के अध्ययन अवकाश के इनक्रीमेंट वापस ले लिए गए थे और रिटायरमेंट फंड से वसूली की गई थी। हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि शिक्षक का वेतन सेवानिवृत्ति की तारीख के अनुसार बहाल किया जाए, उनकी पेंशन, कम्यूटेड पेंशन व लीव एनकैशमेंट की नए सिरे से गणना की जाए और 1 दिसंबर 2011 से लंबित पेंशन एरियर का भुगतान किया जाए।
स्टडी लीव के बाद 25 वर्षों से अधिक दी निरंतर सेवा
यह मामला स्वामी श्रद्धानंद कॉलेज के संस्कृत विभाग के पूर्व व्याख्याता विनोद कुमार खुराना से जुड़ा है, जो जुलाई 1971 में कॉलेज में नियुक्त हुए थे। उन्होंने अप्रैल 1979 में संस्कृत में पीएचडी पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए आवेदन किया और उसी वर्ष उन्हें दाखिला मिला। वर्ष 1983 में विश्वविद्यालय ने उनकी स्टडी लीव स्वीकृत की और कॉलेज ने पीएचडी शोध के लिए उन्हें सितंबर 1983 से सितंबर 1984 तक पूरे वेतन और भत्तों के साथ एक वर्ष का अवकाश दिया।
शोध पर्यवेक्षक (सुपरवाइजर) द्वारा उनके कार्य को संतोषजनक बताए जाने पर अध्ययन अवकाश को दो बार बढ़ाया गया, जिससे कुल अवकाश अवधि तीन वर्ष हो गई। खुराना 15 सितंबर 1986 को काम पर लौट आए, हालांकि इस अवधि के दौरान उन्होंने अपनी थीसिस जमा नहीं की थी। ड्यूटी पर लौटने के बाद उन्होंने कॉलेज में 25 वर्षों से अधिक समय तक लगातार शिक्षण कार्य किया और 30 नवंबर 2011 को सेवानिवृत्त हुए।
सेवानिवृत्ति से ठीक पहले शुरू हुई रिकवरी की कार्रवाई
खुराना की सेवानिवृत्ति से करीब तीन महीने पहले विश्वविद्यालय के पेंशन सेल ने कॉलेज से यह सत्यापित करने को कहा कि क्या शिक्षक ने पीएचडी पूरी कर ली है। पेंशन सेल ने कहा कि यदि डिग्री पूरी नहीं हुई है, तो स्टडी लीव के दौरान दिए गए नोशनल इनक्रीमेंट वापस लिए जाएं।
कॉलेज द्वारा स्पष्टीकरण मांगे जाने पर खुराना ने बताया कि विषय के अत्यंत विस्तृत होने और रिसर्च सुपरवाइजर के रिटायर हो जाने की वजह से वे पहले थीसिस जमा नहीं कर सके थे। उन्होंने यह भी कहा कि उनका शोध कार्य पूरा हो चुका है और उन्होंने थीसिस जमा करने की अनुमति मांगी, जिसे विश्वविद्यालय प्रशासन ने अस्वीकार कर दिया।
इसके बाद खुराना के सेवानिवृत्त होते ही कॉलेज ने उनके वेतन और सेवानिवृत्ति लाभों की दोबारा गणना की। कॉलेज ने वेतन रिकवरी के रूप में 11.40 लाख रुपये और प्रोविडेंट फंड (पीएफ) से 14.35 लाख रुपये, यानी कुल 25.75 लाख रुपये की कटौती कर ली। खुराना ने इस कटौती को हाईकोर्ट में चुनौती दी। याचिकाकर्ता की ओर से वकील रविंद्र एस. गारिया और शशांक सिंह पेश हुए, जबकि विश्वविद्यालय प्रशासन का पक्ष वकील मोहिंदर रूपल और उनके सहयोगी वकीलों ने रखा।
पेंशन खैरात नहीं, संपत्ति का मूल्यवान कानूनी अधिकार: हाईकोर्ट
प्रशासन के आदेशों को खारिज करते हुए जस्टिस कृष्णा ने कहा कि याचिकाकर्ता के खिलाफ कभी कोई विभागीय या अदालती कार्रवाई शुरू नहीं की गई और न ही उनके खिलाफ किसी गंभीर कदाचार या लापरवाही का कोई निष्कर्ष है। कोर्ट ने कहा कि रिकवरी का एकमात्र आधार 13 सितंबर 1986 तक शोध पूरा न होना बनाया गया, जो उनकी सेवानिवृत्ति से ठीक 25 साल पहले का मामला था। ऐसे में सेवानिवृत्ति लाभों से की गई यह रिकवरी पूरी तरह से कानून के अधिकार के बिना की गई थी।
हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि स्टडी लीव के नियमों के तहत अवकाश के बाद न्यूनतम तीन वर्ष की सेवा देना अनिवार्य था, जबकि खुराना ने लौटकर 25 वर्षों से अधिक समय तक सेवाएं दीं। वे न तो सेवा छोड़कर भागे और न ही उन्हें कभी पद से बर्खास्त या हटाया गया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लागू सेवा नियमों में केवल पढ़ाई पूरी न होने को वेतन या भत्तों की रिकवरी का आधार नहीं माना गया है। नियम यह भी कहते हैं कि अध्ययन अवकाश पर गए शिक्षक इनक्रीमेंट पाने के पात्र हैं, बशर्ते वे लौटकर निर्धारित न्यूनतम अवधि तक सेवा दें।
संविधान का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि संविधान किसी भी नागरिक को कानून के अधिकार के बिना उसकी संपत्ति से वंचित करने से रोकता है। अदालत ने टिप्पणी की कि पेंशन कोई खैरात नहीं है, बल्कि यह संपत्ति का एक मूल्यवान कानूनी अधिकार है। हाईकोर्ट ने यह भी जोड़ा कि यदि इस भुगतान को “अतिरिक्त” भी मान लिया जाए, तब भी लागू नियमों के तहत ऐसी रिकवरी करने की कोई कानूनी अनुमति नहीं है।

