सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक जनहित याचिका खारिज कर दी, जिसमें जुलाई महीने में जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के विरोध प्रदर्शन की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराने के लिए केंद्र, दिल्ली सरकार और पुलिस को निर्देश देने की मांग की गई थी। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने उस प्रार्थना को भी नामंजूर कर दिया, जिसमें कानून-व्यवस्था बनाए रखने और अपराधों की जांच के मामले में पुलिस को न्यायपालिका की तरह संप्रभु और स्वतंत्र घोषित करने का आग्रह किया गया था।
छात्रों के भविष्य को देखते हुए रद्द की गईं एफआईआर: सीजेआई
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन जजों की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। सुनवाई के दौरान बेंच ने स्पष्ट किया कि यह याचिका असल में संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत प्रदत्त विशेष शक्तियों का उपयोग करके छात्रों पर दर्ज एफआईआर रद्द करने के शीर्ष अदालत के पूर्व आदेश की समीक्षा कराने की एक अप्रत्यक्ष कोशिश है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने अनुच्छेद 142 के प्रयोग का बचाव करते हुए कहा कि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि अदालत हमेशा शत-प्रतिशत सही आदेश ही पारित करे, लेकिन यह समझना आवश्यक है कि प्रदर्शन करने वाले युवा छात्र थे। उन्होंने कहा कि अदालत को इन छात्रों के भविष्य और उनके परिवारों की स्थिति को ध्यान में रखना था, ताकि युवाओं को बार-बार कोर्ट-कचहरी के चक्कर न काटने पड़ें। सीजेआई ने यह भी रेखांकित किया कि याचिकाकर्ता ने शायद विधायकों और सांसदों के संदर्भ में पारित अदालत के पूर्व आदेशों का संज्ञान नहीं लिया है।
कोविड काल के दौरान हिमाचल प्रदेश के मामले का दिया हवाला
अपने रुख के समर्थन में चीफ जस्टिस ने हिमाचल प्रदेश से जुड़े एक पूर्व मामले का उल्लेख किया, जहां राजनीतिक प्रदर्शन के दौरान सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया था। उन्होंने बताया कि उस समय हाईकोर्ट ने राहत देने और कार्यवाही रद्द करने से मना कर दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह देखते हुए हस्तक्षेप किया था कि प्रदर्शनकारी कोई आदतन या पेशेवर अपराधी नहीं थे। चीफ जस्टिस के अनुसार, कोविड महामारी जैसे अभूतपूर्व संकट के दौर में देश इस प्रकार की परिस्थितियों के लिए तैयार नहीं था, इसलिए लोगों ने उस कठिन समय में अपने स्वाभाविक ढंग से प्रतिक्रिया दी थी।
याचिका के औचित्य और पुलिस की स्वायत्तता पर रखी गईं दलीलें
याचिकाकर्ता एल. रामनाथन की तरफ से पेश हुए वकील मैथ्यूज नेदुमपारा ने वास्तविक पीड़ित पक्षकारों की अनुपस्थिति में ऐसी जनहित याचिकाओं के कानूनी आधार पर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि लोग अदालत का रुख इस तरह करने लगे हैं मानो यह उनकी निजी संपत्ति हो।
इस याचिका में केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस कमिश्नर, दिल्ली सरकार, सीजेपी नेता अभिजीत दीपके और पूर्व याचिकाकर्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी को पक्षकार बनाया गया था। याचिका में परमादेश जारी करने की गुहार लगाई गई थी ताकि जंतर-मंतर प्रदर्शनों से जुड़ी प्राथमिकियों की निष्पक्ष और विधि सम्मत जांच सुनिश्चित की जा सके।
याचिका में यह तर्क भी दिया गया था कि अपराध की जांच और कानून-व्यवस्था के पालन में पुलिस का अधिकार क्षेत्र न्यायपालिका के समान ही स्वायत्त होना चाहिए। याचिकाकर्ता का कहना था कि जिस तरह कार्यपालिका न्यायिक कामकाज में हस्तक्षेप नहीं कर सकती, उसी तरह पुलिस के अधिकार क्षेत्र में भी दखल नहीं दिया जाना चाहिए, बशर्ते उनका आचरण कानून के विरुद्ध या दुर्भावनापूर्ण न हो।
नीट पेपर लीक विवाद से जुड़ा है पूरा घटनाक्रम
यह मामला राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) के कथित पेपर लीक विवाद से उपजे जनाक्रोश से जुड़ा है। जुलाई माह में कॉकरोच जनता पार्टी ने इस मुद्दे को लेकर जंतर-मंतर पर व्यापक विरोध प्रदर्शन आयोजित किया था। इस आंदोलन और राजनीतिक दबाव के चलते तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था। प्रदर्शन के दौरान कई छात्रों व कार्यकर्ताओं पर एफआईआर दर्ज की गई थीं, जिन्हें बाद में सुप्रीम कोर्ट ने अपनी असाधारण शक्तियों के तहत निरस्त कर दिया था।

