दिल्ली हाईकोर्ट ने सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल हुए एक व्यक्ति के परिवार को दिए गए ₹1.70 करोड़ के मुआवजे को बरकरार रखते हुए कहा है कि सड़क पर अचानक किसी आवारा जानवर के आ जाने से ड्राइवर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता। वाहन चलाते समय ड्राइवर का उस पर पूरा नियंत्रण होना जरूरी है और अचानक सामने आई किसी भी स्थिति में उसे सावधानी बरतनी चाहिए।
जस्टिस अनीश दयाल ने 5 अक्टूबर को दिए अपने फैसले में आईसीआईसीआई लोम्बार्ड जनरल इंश्योरेंस कंपनी की अपील खारिज कर दी। बीमा कंपनी ने मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (MACT) के मई 2016 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें हादसे के शिकार व्यक्ति को ₹1.70 करोड़ का मुआवजा देने का निर्देश दिया गया था।
यह मामला सतीश चंद्र गुप्ता से जुड़ा है, जो 2014 में एक कार दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गए थे। हादसे के बाद वह छह साल से अधिक समय तक कोमा में रहे और 22 अगस्त 2020 को उनकी मृत्यु हो गई।
अचानक जानवर सामने आने से ड्राइवर की जिम्मेदारी खत्म नहीं होती
हाईकोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि अगर सड़क पर अचानक कोई आवारा जानवर आ जाए और उससे बचने की कोशिश में हादसा हो जाए, तो क्या ड्राइवर को लापरवाही के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है?
जस्टिस दयाल ने कहा कि वाहन चलाने वाले व्यक्ति की जिम्मेदारी है कि वह हर समय गाड़ी पर पर्याप्त नियंत्रण बनाए रखे। वाहनों का वजन और रफ्तार अधिक होने के कारण उन्हें नियंत्रित करने के लिए विशेष सावधानी की जरूरत होती है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सड़क पर कई बार ऐसी परिस्थितियां पैदा हो सकती हैं, जिनमें ड्राइवर को तुरंत फैसला लेना पड़ता है। ऐसी स्थिति में समय रहते ब्रेक लगाने या स्टीयरिंग संभालने की जरूरत पड़ सकती है। लेकिन केवल यह कहकर ड्राइवर को जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया जा सकता कि खतरा अचानक सामने आ गया था।
हाईकोर्ट ने कहा कि ड्राइवर की लापरवाही कई तरह से सामने आ सकती है। इनमें इतनी तेज रफ्तार से वाहन चलाना कि उसे नियंत्रित करना मुश्किल हो जाए, सड़क पर पर्याप्त ध्यान नहीं देना या सामने आने वाले खतरे को समय रहते न पहचान पाना शामिल है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि भारतीय सड़कों पर पैदल यात्रियों और वाहन चालकों के अचानक दिशा बदलने जैसी घटनाएं आम हैं। इसके अलावा आवारा जानवर, तेज रफ्तार, शराब पीकर वाहन चलाना, आक्रामक ड्राइविंग और लेन के नियमों का पालन नहीं करना भी सड़क दुर्घटनाओं के प्रमुख कारण हैं।
हाईकोर्ट के अनुसार, ऐसी परिस्थितियों में हादसों से बचने के लिए ड्राइवर का सतर्क रहना, तुरंत प्रतिक्रिया देना और सही समय पर उचित फैसला लेना जरूरी है।
2014 में हुआ था हादसा, छह साल से अधिक समय तक कोमा में रहे पीड़ित
मामले के अनुसार, सतीश चंद्र गुप्ता 28 मई 2014 को द्वारका से छतरपुर स्थित अपने घर लौट रहे थे। वह कार की पिछली सीट पर बैठे थे।
यह वाहन सेंट्रोडोरस्ट्रॉय इंडिया प्राइवेट लिमिटेड का था, जिसमें गुप्ता डायरेक्टर थे।
जब कार वसंत कुंज इलाके में छतरपुर मेट्रो स्टेशन के पास पहुंची, तो ड्राइवर कथित तौर पर वाहन से नियंत्रण खो बैठा और कार सड़क के डिवाइडर से टकरा गई।
हादसे में गुप्ता को गंभीर चोटें आईं और वह कोमा में चले गए। इसके बाद वह कभी होश में नहीं आ सके। आखिरकार 22 अगस्त 2020 को उनकी मृत्यु हो गई।
हादसे के बाद परिवार ने मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण में मुआवजे की मांग की थी। न्यायाधिकरण ने मई 2016 में ₹1.70 करोड़ का मुआवजा देने का आदेश दिया था। उस समय गुप्ता कोमा में थे।
बीमा कंपनी ने इस फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी।
बीमा कंपनी ने इलाज और देखभाल के खर्च पर उठाए सवाल
आईसीआईसीआई लोम्बार्ड की ओर से पेश एडवोकेट ईशान छाया ने दलील दी कि न्यायाधिकरण ने मरीज की देखभाल के लिए रखे गए सहायकों का खर्च दो बार जोड़ दिया था।
कंपनी ने भविष्य के इलाज के लिए दिए गए ₹33 लाख पर भी आपत्ति जताई। उसका कहना था कि चूंकि गुप्ता की 22 अगस्त 2020 को मृत्यु हो चुकी है, इसलिए भविष्य के इलाज के नाम पर दिया गया पैसा बीमा कंपनी को वापस मिलना चाहिए।
वहीं, गुप्ता की ओर से पेश एडवोकेट नरेश गुप्ता ने बीमा कंपनी के इस दावे का विरोध किया कि हादसे के समय कार ड्राइवर के बजाय घायल व्यक्ति खुद चला रहा था।
उन्होंने कहा कि बीमा कंपनी का यह दावा केवल कल्पना पर आधारित है और मामले के रिकॉर्ड से इसकी पुष्टि नहीं होती।
डॉक्टर ने बताई थी 24 घंटे देखभाल की जरूरत
हाईकोर्ट ने गुप्ता का इलाज करने वाले डॉक्टर के बयान पर भी विचार किया।
डॉक्टर ने बताया था कि हादसे के बाद गुप्ता लगातार कोमा या बेहोशी की स्थिति में रहे। उनकी हालत ऐसी थी कि उन्हें किसी देखभाल करने वाले व्यक्ति के बिना नहीं छोड़ा जा सकता था।
डॉक्टर ने परिवार को सलाह दी थी कि गुप्ता की देखभाल के लिए 24 घंटे किसी प्रशिक्षित मेडिकल कर्मचारी या नर्सिंग सहायक की व्यवस्था की जाए।
बीमा कंपनी की अपील खारिज, पत्नी को मिलेगा बाकी मुआवजा
दिल्ली हाईकोर्ट ने मामले के तथ्यों, मेडिकल रिकॉर्ड और बीमा कंपनी की आपत्तियों पर विचार करने के बाद मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
जस्टिस अनीश दयाल ने बीमा कंपनी की अपील खारिज करते हुए निर्देश दिया कि वह मुआवजे की बाकी 50 प्रतिशत राशि हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के पास जमा करे।
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि यह राशि सतीश चंद्र गुप्ता की पत्नी को जारी की जाए।
हाईकोर्ट के फैसले से स्पष्ट है कि सड़क पर अचानक कोई जानवर या दूसरी बाधा सामने आने की स्थिति में भी ड्राइवर की जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती। यह देखना जरूरी है कि हादसे के समय ड्राइवर वाहन पर कितना नियंत्रण रख रहा था और उसने दुर्घटना से बचने के लिए कितनी सावधानी बरती थी।

