विशेष NIA कोर्ट ने अलगाववादी नेता शब्बीर अहमद शाह की जमानत याचिका खारिज कर दी है। मामला 1996 में श्रीनगर में एक जनाजे के दौरान हुई हिंसा, पथराव और पुलिसकर्मियों पर फायरिंग से जुड़ा है। कोर्ट ने कहा कि इस स्तर पर शाह को जमानत देने से मुकदमे की निष्पक्ष सुनवाई, संरक्षित गवाहों की सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका है।
विशेष जज प्रेम सागर ने जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि फिलहाल इस आवेदन पर विचार करने का कोई आधार नहीं बनता। कोर्ट ने यह भी कहा कि शाह की रिहाई की स्थिति में ऐसी गतिविधियों के जारी रहने की आशंका है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के लिए नुकसानदेह हो सकती हैं।
कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि मामले में चार लोगों को संरक्षित गवाह घोषित किया जा चुका है और आरोप अभी तय नहीं हुए हैं।
संरक्षित गवाहों की सुरक्षा पर कोर्ट की चिंता
अपने 23 पन्नों के आदेश में कोर्ट ने कहा कि शाह के खिलाफ UAPA की केवल धारा 13 लगाई गई है, जो कानून के अध्याय III के तहत आती है। कोर्ट ने माना कि धारा 43-D(5) के तहत जमानत पर सख्त रोक केवल अध्याय IV और VI के तहत दंडनीय अपराधों पर लागू होती है।
हालांकि, कोर्ट ने कहा कि UAPA से जुड़े किसी भी मामले में आरोपों की प्रकृति, आरोपी की भूमिका, संरक्षित गवाहों की मौजूदगी, गवाहों को प्रभावित किए जाने की आशंका और नेटवर्क के दोबारा सक्रिय होने की संभावना जैसे पहलुओं को देखना जरूरी है।
कोर्ट के अनुसार, इस स्तर पर शाह को जमानत देने से मुकदमे की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है और संरक्षित गवाहों की सुरक्षा तथा उनका भरोसा कमजोर पड़ सकता है।
कोर्ट ने समानता के आधार पर जमानत की दलील भी खारिज कर दी। शाह की ओर से कहा गया था कि कुछ सह-आरोपियों को जमानत मिल चुकी है। कोर्ट ने कहा कि उन आरोपियों को उस समय जमानत दी गई थी जब उनके संबंध में जांच पूरी हो चुकी थी और जांच अधिकारी को उनकी हिरासत की जरूरत नहीं थी।
NIA ने जुलूस में सक्रिय भूमिका का आरोप लगाया
NIA ने जमानत याचिका का विरोध करते हुए आरोप लगाया कि शाह उस जुलूस के प्रमुख नेताओं में शामिल थे, जिससे यह मामला जुड़ा है। अभियोजन के अनुसार, हिंसा भड़कने से पहले शाह ने कथित रूप से भड़काऊ नारे लगाए और उकसाने वाले भाषण दिए।
एजेंसी ने संरक्षित गवाहों की मौजूदगी का भी हवाला दिया और कहा कि शाह की रिहाई से उन्हें प्रभावित किए जाने की आशंका है।
73 वर्षीय शाह को NIA ने अप्रैल में इस करीब तीन दशक पुराने मामले में गिरफ्तार किया था। यह गिरफ्तारी उस समय हुई जब उन्हें अन्य NIA मामलों में करीब सात साल की कैद के बाद जमानत मिली थी। इन मामलों में एक टेरर फंडिंग से जुड़ा मामला भी शामिल था।
NIA ने गृह मंत्रालय के निर्देश पर अप्रैल में 1996 के इस मामले की जांच अपने हाथ में ली थी। एजेंसी ने 10 जुलाई को जम्मू स्थित विशेष NIA कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की।
चार्जशीट में शाह के अलावा अलगाववादी नेता शकील अहमद बख्शी और जाविद अहमद मीर को भी आरोपी बनाया गया है। सैयद अली शाह गिलानी, अब्दुल गनी लोन और मोहम्मद याकूब वकील को भी आरोपी बनाया गया था, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद उनके खिलाफ कार्यवाही समाप्त हो गई।
बचाव पक्ष ने जांच पूरी होने का दिया हवाला
शाह के वकील ने दलील दी कि उनकी पिछली जमानत याचिका को केवल इस आधार पर समय से पहले माना गया था कि जांच लंबित थी। अब NIA चार्जशीट दाखिल कर चुकी है और शाह के संबंध में जांच पूरी हो चुकी है।
बचाव पक्ष ने कहा कि पिछली जमानत याचिका को मेरिट पर खारिज नहीं किया गया था और चार्जशीट दाखिल हो जाने के बाद नई जमानत याचिका पर विचार करने में कोई बाधा नहीं है।
शाह की ओर से अभियोजन के आरोपों पर भी सवाल उठाया गया। बचाव पक्ष ने कहा कि उन पर न तो कोई हथियार रखने, न उसका इस्तेमाल करने और न ही गोली चलाने का आरोप है। फायरिंग का आरोप अज्ञात हथियारबंद लोगों पर है।
बचाव पक्ष ने शाह की लंबी कैद, उनकी उम्र और सुप्रीम कोर्ट द्वारा मार्च में एक अन्य NIA मामले में उन्हें जमानत दिए जाने का भी हवाला दिया। दलील दी गई कि लगातार हिरासत में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत शीघ्र सुनवाई के उनके अधिकार का उल्लंघन होगा।

