सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल बिना पुष्टि वाले आरोपों के आधार पर भारतीय दंड संहिता, 1860 (आईपीसी) की धारा 394 के तहत लूट का अपराध साबित नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब अभियुक्त के पास से चोरी की गई संपत्ति या कोई आपत्तिजनक सामग्री बरामद न हुई हो। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की डिवीजन बेंच ने बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए अपीलार्थी की दोषसिद्धि को लूट के दौरान स्वेच्छा से चोट पहुंचाने (धारा 394) से बदलकर स्वेच्छा से गंभीर चोट पहुंचाने (धारा 325) में तब्दील कर दिया। अदालत ने इस तथ्य पर विचार किया कि 63-64 वर्षीय अपीलार्थी लगभग दस महीने की जेल काट चुका है और यह घटना तीन दशक से भी अधिक पुरानी है, इसलिए उसकी कैद की सजा को पहले से भुगती गई अवधि तक सीमित कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 23 जनवरी 1993 की रात का है। शिकायतकर्ता, उनके पति और उनकी नाबालिग बेटी अपने कृषि खेत में बने तीन कमरों वाले फार्महाउस में रहते थे। रात के खाने के बाद शिकायतकर्ता बाहर बरामदे में खाट पर सो रही थीं, उनकी बेटी पास ही फर्श पर सो रही थी और पति खेत में कुएं के पास प्याज की फसल की सिंचाई कर रहे थे।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, देर रात चार लोग फार्महाउस में घुसे। बेटी के चिल्लाने पर जब शिकायतकर्ता जागीं, तो उन्होंने देखा कि अपीलार्थी उनकी खाट के पास बैठा हुआ था। उसने शिकायतकर्ता की गर्दन पर चाकू अड़ाकर धमकाया और चुप रहने को कहा। जब शिकायतकर्ता ने विरोध करते हुए चाकू पकड़ने की कोशिश की, तो उनके हाथ में चोट आ गई। इसके बाद अपीलार्थी ने उनके चेहरे पर मुक्का मारा, जिससे उनका ऊपरी दांत टूटकर गिर गया। आरोप था कि अपीलार्थी ने लगभग पांच तोले वजन और 4,000 रुपये मूल्य का सोने का मंगलसूत्र और डोरले भी छीन लिया। एक अन्य हमलावर बेटी को घर के अंदर ले गया और उसके साथ मारपीट की, जबकि बाकी दो हमलावरों ने पति के हाथ बांध दिए। इसके बाद चारों हमलावर रेलवे लाइन की तरफ भाग गए।
इस घटना के बाद मनमाड सिटी पुलिस थाने में आईपीसी की धारा 394 सपठित धारा 34 के तहत एफआईआर दर्ज की गई। उसी रात मनमाड के ग्रामीण अस्पताल में डॉ. लालचंद जाधव द्वारा घायलों का चिकित्सकीय परीक्षण कराया गया। जांच के दौरान केवल अपीलार्थी और एक अन्य सह-आरोपी को गिरफ्तार किया जा सका, जबकि दो अन्य हमलावरों का पता नहीं चल पाया।
मालेगांव के एडिशनल सेशंस जज ने अपीलार्थी को आईपीसी की धारा 394 के तहत दोषी ठहराते हुए सात साल के कठोर कारावास और 1,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई। बॉम्बे हाईकोर्ट ने 16 जनवरी 2026 को अपीलार्थी की अपील खारिज करते हुए उसकी दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखा, जबकि सह-आरोपी को धारा 376 के आरोपों से बरी कर दिया। इसके बाद अपीलार्थी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
पक्षकारों की दलीलें
अपीलार्थी ने मुख्य रूप से पहचान के मुद्दे पर अपनी दोषसिद्धि को चुनौती दी। बचाव पक्ष की ओर से दलील दी गई कि घटना रात के अंधेरे में हुई थी, हमलावरों के चेहरे ढके हुए थे, कोई टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (टीआईपी) आयोजित नहीं की गई थी और गिरफ्तारी के बाद पुलिस द्वारा गवाहों को अपीलार्थी दिखाया गया था। इसके अलावा, जिरह के दौरान शिकायतकर्ता के पति और बेटी दोनों ने स्वीकार किया था कि वे हमलावरों को पहले से नहीं जानते थे।
दूसरी ओर, अभियोजन पक्ष ने घटना के चार घंटे के भीतर 1:50 बजे दर्ज कराई गई त्वरित एफआईआर, अपीलार्थी के नाम और पते के साथ शिकायतकर्ता द्वारा की गई लगातार पहचान, परिवार के अन्य सदस्यों की गवाही और चोटों की पुष्टि करने वाली मेडिकल रिपोर्ट पर भरोसा जताया।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने सबसे पहले पहचान से जुड़ी चुनौती पर विचार किया और निचली अदालतों के निष्कर्षों को सही ठहराया। बेंच ने कहा कि घटना के चार घंटे के भीतर दर्ज एफआईआर में शिकायतकर्ता ने अपीलार्थी का नाम, निवास स्थान और पूर्व परिचय का स्पष्ट विवरण दिया था। पति ने भी पुष्टि की कि अपीलार्थी रिश्तेदारों से मिलने गांव आता रहता था। इसके अलावा, घटना लगभग एक घंटे तक चली और उस दौरान बरामदे का बल्ब जल रहा था, साथ ही अपीलार्थी शिकायतकर्ता की खाट पर बेहद करीब बैठा था। अदालत ने टिप्पणी की कि ऐसी परिस्थितियों में टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड का न होना अभियोजन के मामले के लिए घातक नहीं है।
हालांकि, बेंच ने आईपीसी की धारा 394 के तहत दोषसिद्धि के औचित्य पर सवाल उठाते हुए स्पष्ट किया कि लूट इस अपराध का एक अनिवार्य घटक है:
“लूट या लूट का प्रयास कोई गौण परिस्थिति नहीं है, बल्कि यह इस अपराध का एक अनिवार्य घटक है। वर्तमान मामले में, लूट का यह आरोप पूरी तरह से शिकायतकर्ता के इस कथन पर टिका है कि अपीलार्थी ने उसके गले से मंगलसूत्र और डोरले झपटे थे। कथित जेवरात की कोई बरामदगी नहीं हुई और अपीलार्थी के कब्जे से कोई आपत्तिजनक सामग्री भी जब्त नहीं की गई। शिकायतकर्ता ने खुद जिरह में स्वीकार किया कि इन वस्तुओं की पहचान या मूल्य स्थापित करने के लिए कोई खरीद रसीद या अन्य सामग्री मौजूद नहीं थी। हालांकि हाईकोर्ट ने घटनास्थल पंचनामे के इस अवलोकन पर भरोसा किया कि बरामदे पर लकड़ी के तुलसी के मनके और काले मोती बिखरे मिले थे, लेकिन इन मोतियों का साक्ष्य के माध्यम से मंगलसूत्र से कभी कोई संबंध नहीं जोड़ा गया, और केवल रस्सी के टुकड़े प्रदर्शित किए गए तथा घटनास्थल से उनकी जब्ती को ट्रायल कोर्ट के समक्ष दो पंच गवाहों में से एक सुभाष किसन काकड (पीडब्लू-3) के माध्यम से साबित किया गया। इसलिए, हमारी सुविचारित राय में, हम आईपीसी की धारा 394 के तहत दोषसिद्धि को बरकरार नहीं रख सकते।“
दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 222 (जो भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 245 के अनुरूप है) का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि यदि साबित हुए तथ्य किसी छोटे अपराध का गठन करते हैं, तो अदालतें आरोपी को उस छोटे अपराध के लिए दोषी ठहरा सकती हैं, भले ही उसका अलग से आरोप तय न किया गया हो। सुप्रीम कोर्ट ने रफीक अहमद उर्फ रफी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2011 आईएनएससी 546) मामले का उल्लेख किया, जिसमें सजातीय अपराधों (कॉग्नेट ऑफेंस) के सिद्धांत को मान्यता दी गई थी।
चोटों की प्रकृति का विश्लेषण करते हुए अदालत ने पाया कि यद्यपि शिकायतकर्ता के बाएं हाथ पर धारदार हथियार से 7 x 1/2 x 1/2 सेंटीमीटर का घाव था, लेकिन ऐसा कोई हथियार बरामद नहीं हुआ और घाव भी अपेक्षाकृत उथला था, जिसके चलते धारा 326 लागू नहीं होती।
इसके बावजूद, अदालत ने माना कि अपीलार्थी द्वारा शिकायतकर्ता के मुंह पर मुक्का मारने और उनका बायां ऊपरी कृंतक दांत (इनसाइजर) टूटने की बात गवाहों और मेडिकल रिपोर्ट से पूरी तरह साबित है। चूंकि दांत का टूटना आईपीसी की धारा 320 के तहत “गंभीर चोट” के दायरे में आता है, इसलिए अदालत ने दोषसिद्धि को आईपीसी की धारा 325 में बदल दिया।
सजा और अंतिम आदेश
सजा के बिंदु पर विचार करते हुए अदालत ने दर्ज किया कि अपीलार्थी 1993 में 91 दिनों तक हिरासत में रहा था और लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद 27 फरवरी 2026 को उसने अदालत के निर्देश पर आत्मसमर्पण किया था, जिससे वह कुल लगभग 10 महीने की जेल काट चुका है। वर्तमान में उसकी आयु 63-64 वर्ष है। इस संदर्भ में पीठ ने मथाई बनाम केरल राज्य (2005 आईएनएससी 30) के फैसले का उद्धरण दिया:
“वर्तमान मामले में रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से स्पष्ट पत्थर के आकार को देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि किसी खतरनाक हथियार का इस्तेमाल किया गया था। इसलिए दोषसिद्धि को आईपीसी की धारा 325 में बदला जाता है। उचित सजा तय करने के लिए कोई तयशुदा नियम लागू नहीं किया जा सकता और जहां तक सजा का संबंध है, समय का लंबा बीत जाना हमेशा निर्णायक कारक नहीं हो सकता। इसमें कोई विवाद नहीं है कि अपीलार्थी सुनाई गई सजा का एक बड़ा हिस्सा भुगत चुका है। मामले के विशिष्ट तथ्यों को देखते हुए हम इसे पहले से भुगती गई अवधि तक सीमित करते हैं।“
इन तथ्यों और कानूनी सिद्धांतों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए अपीलार्थी को आईपीसी की धारा 325 के तहत दोषी ठहराया और उसकी जेल की सजा को उसके द्वारा पहले से भुगती गई अवधि तक सीमित कर दिया। 1,000 रुपये के जुर्माने की सजा बरकरार रखी गई। अदालत ने निर्देश दिया कि यदि किसी अन्य मामले में आवश्यकता न हो, तो अपीलार्थी को तत्काल रिहा किया जाए।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: अप्पा बनाम महाराष्ट्र राज्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 4766/2026 (एस.एल.पी. (क्रिमिनल) संख्या 4575/2026 से उत्पन्न)
पीठ: जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर
निर्णय की तिथि: 07 अक्टूबर 2026

