सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वादकारियों द्वारा दीवानी मामलों को आपराधिक रंग देने की प्रवृत्ति पर सख्ती से रोक लगाई जानी चाहिए। जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कथित धोखाधड़ी और बेईमानी से सेल डीड निष्पादित करने के आरोप में एक जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी (जीपीए) धारक के खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। कर्नाटक हाईकोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि जब सेल डीड निष्पादित करने वाले मुख्य भूस्वामियों के खिलाफ कोई आपराधिक मामला नहीं बनता, तो उनके एजेंट या मात्र पुष्टिकारक पक्ष (कंफर्मिंग पार्टी) के रूप में कार्य करने वाले जीपीए धारक के खिलाफ भी आपराधिक कार्यवाही जारी नहीं रखी जा सकती।
विवाद की पृष्ठभूमि
यह मामला कर्नाटक के चन्नासंद्रा गांव में स्थित सर्वे संख्या 115 की 4 एकड़ 19 गुंठा भूमि से संबंधित है। यह संपत्ति मूल रूप से गणेश नामक व्यक्ति की थी। बिना कोई वसीयत छोड़े उनका निधन हो गया, जिसके बाद यह जमीन उनकी पत्नी और अन्य कानूनी उत्तराधिकारियों (भूस्वामियों) को मिली।
5 अक्टूबर 2012 को इन भूस्वामियों ने याचिकाकर्ता सुधा राकेश के पक्ष में जमीन बेचने का एक एग्रीमेंट निष्पादित किया और साथ ही उनके पक्ष में एक जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी (जीपीए) भी पंजीकृत की। इसके बाद, भूस्वामियों ने इसी जीपीए धारक के माध्यम से 19 नवंबर 2012 को शिकायतकर्ता (प्रतिवादी संख्या 2) और एक अन्य व्यक्ति के साथ उसी जमीन की बिक्री का एक और एग्रीमेंट किया। इस समझौते के तहत संभावित खरीदारों को शेष राशि का भुगतान करके सात महीने के भीतर सेल डीड निष्पादित कराने के लिए आगे आना था।
हालांकि, संभावित खरीदार तय 7 महीने की अवधि में आगे नहीं आए और न ही उन्होंने बाद में विशिष्ट अनुपालन (स्पेसिफिक परफॉरमेंस) के लिए निर्धारित कानूनी समय सीमा (लिमिटेशन पीरियड) के भीतर कोई कदम उठाया। इसके बाद 11 फरवरी 2016 को भूस्वामियों और याचिकाकर्ता ने एक अन्य खरीदार गफ्फार बेग के पक्ष में सेल डीड निष्पादित कर जमीन बेच दी।
सेल डीड निष्पादित होने के तुरंत बाद, संभावित खरीदारों ने 19 नवंबर 2012 के समझौते के विशिष्ट अनुपालन की मांग करते हुए दीवानी मुकदमा दायर कर दिया। इसके बाद उन्होंने 13 मई 2016 को कडुगोडी पुलिस स्टेशन में भूस्वामियों और याचिकाकर्ता के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 420 (धोखाधड़ी), 423 (अंतरण पत्र में प्रतिफल के संबंध में बेईमानी से किया गया असत्य कथन) और 120-बी (आपराधिक षड्यंत्र) सहपठित धारा 34 के तहत एफआईआर संख्या 121/2016 दर्ज कराई। 28 सितंबर 2017 को मजिस्ट्रेट ने इन अपराधों पर संज्ञान ले लिया।
हाईकोर्ट के परस्पर विरोधी आदेश
भूस्वामियों ने इस एफआईआर और संज्ञान आदेश को चुनौती देते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट का रुख किया। 22 नवंबर 2017 को हाईकोर्ट ने आपराधिक याचिका संख्या 9095/2016 में भूस्वामियों के खिलाफ एफआईआर रद्द कर दी और माना कि यह विवाद पूरी तरह से दीवानी प्रकृति का है।
इसके बाद याचिकाकर्ता सुधा राकेश ने भी हाईकोर्ट में एफआईआर रद्द करने की याचिका दायर की। हालांकि, 19 सितंबर 2022 को हाईकोर्ट की एक अन्य समन्वय पीठ ने आपराधिक याचिका संख्या 9470/2017 को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की भूमिका को यह कहकर अलग माना कि उन्होंने राशि प्राप्त की थी, जीपीए धारक के रूप में समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, वे सेल डीड में पुष्टिकारक पक्ष थीं और जमीन बाद में कम मूल्य पर बेची गई थी।
पक्षकारों की दलीलें
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष याचिकाकर्ता ने दलील दी कि जब मुख्य भूस्वामियों के खिलाफ मामला पहले ही रद्द किया जा चुका है, तो समानता (पैरिटी) के आधार पर उन्हें भी वही राहत मिलनी चाहिए। यह प्रस्तुत किया गया कि यह विवाद पूरी तरह दीवानी है, याचिकाकर्ता केवल एक जीपीए धारक और पुष्टिकारक पक्ष थीं, इसलिए उन पर कोई आपराधिक दायित्व नहीं बनता।
दूसरी ओर, प्रतिवादी संख्या 2 ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की भूमिका को सही ढंग से अलग माना है क्योंकि वे मुख्य कर्ताधर्ता थीं और उन्होंने सीधे तौर पर रकम प्राप्त की थी। प्रतिवादी ने यह भी आरोप लगाया कि 2016 की सेल डीड 2012 के पूर्व समझौते को छिपाकर निष्पादित की गई थी। राज्य सरकार ने भी इन्हीं दलीलों का समर्थन करते हुए अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
अनुबंध के उल्लंघन और आपराधिक कृत्यों के बीच के स्पष्ट अंतर को दोहराते हुए सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की:
“वर्तमान समय में वादियों द्वारा दीवानी विवादों को आपराधिक रंग देने की प्रवृत्ति एक खुला रहस्य है। अदालतों ने दोनों के बीच के बारीक अंतर को मिटाने से वादियों को रोकने के लिए कड़े कदम उठाने का प्रयास किया है। हमने आपराधिक प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए ऐसा किया है। वर्तमान मामला भी ऐसा ही अवसर प्रस्तुत करता है।”
रिकॉर्ड की जांच करते हुए पीठ ने पाया कि खरीदार 19 नवंबर 2012 के समझौते पर निर्धारित 7 महीने के भीतर अमल करने में विफल रहे और उन्होंने 2016 में सेल डीड पंजीकृत होने के बाद ही कानूनी कार्यवाही शुरू की। भूस्वामियों के पक्ष में हाईकोर्ट के पहले के आदेश का उल्लेख करते हुए अदालत ने समन्वय पीठ के पूर्व अवलोकन को उद्धृत किया:
“…इसलिए, जब शिकायतकर्ता पहले ही दीवानी अदालत का दरवाजा खटखटा चुका है और सेल डीड निष्पादित कराने के लिए कदम उठाने में लंबा विलंब हुआ है, तो मेरी राय में, यह पक्षों के बीच विशुद्ध रूप से एक दीवानी लेनदेन है जिसे शिकायतकर्ता द्वारा इस प्रकार की कार्यवाही के लिए आपराधिक रंग दिया गया है, जबकि तथ्यात्मक पहलू स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि याचिकाकर्ताओं की ओर से आपराधिक मानसिकता का लेशमात्र भी अंश नहीं है।”
याचिकाकर्ता को यह राहत देने से इनकार करने वाले हाईकोर्ट के दूसरे आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट से गंभीर भूल हुई है। अदालत ने कहा:
“एफआईआर में भूस्वामियों के साथ-साथ याचिकाकर्ता द्वारा भी अपराध किए जाने का आरोप है। आरोप सेल डीड के निष्पादन पर आधारित है, और सेल डीड स्वयं भूस्वामियों द्वारा निष्पादित की गई थी। याचिकाकर्ता केवल एक पुष्टिकारक पक्ष (कंफर्मिंग पार्टी) था। यदि सेल डीड के निष्पादन के आधार पर भूस्वामियों पर कोई आपराधिकता आरोपित नहीं की जा सकती, तो इसे याचिकाकर्ता के खिलाफ भी बरकरार नहीं रखा जा सकता। क्योंकि, याचिकाकर्ता पर किसी भी बढ़ी हुई भूमिका को थोपने के लिए कुछ भी नहीं है।”
पीठ ने स्पष्ट किया कि भूस्वामियों की ओर से जीपीए धारक द्वारा भौतिक रूप से राशि प्राप्त कर लेने मात्र से वह अलग पायदान पर नहीं आ जाता, और न ही ऐसा कोई आरोप है कि उसने अपने अधिकारों का उल्लंघन किया। अदालत ने कम कीमत पर जमीन बेचने के हाईकोर्ट के तर्क को भी काल्पनिक बताते हुए खारिज कर दिया और कहा कि यदि यह कोई आपत्तिजनक पहलू था भी, तो यह भूस्वामियों पर भी समान रूप से लागू होता था। इसके अलावा, हाईकोर्ट ने यह विचार करके भी अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर कदम बढ़ाया कि क्या यह रकम भूस्वामियों तक पहुंची या नहीं, जबकि भूस्वामियों ने याचिकाकर्ता पर राशि हड़पने का कोई आरोप लगाया ही नहीं था।
आरोपित अपराधों के कानूनी तत्वों की व्याख्या करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“विशेष रूप से, धोखाधड़ी (चीटिंग) के अपराध के लिए एक कपटपूर्ण कार्य की आवश्यकता होती है जिसके कारण संपत्ति/धन देने के लिए प्रेरित किया गया हो। आरोपों के सामान्य अवलोकन से भी यह स्पष्ट हो जाता है कि संपत्ति (अर्थात 19.11.2012 के सेल एग्रीमेंट के समय प्रतिवादी संख्या 2 द्वारा हस्तांतरित राशि) किसी धोखे के आधार पर हस्तांतरित नहीं की गई थी। उस समय, संपत्ति कानूनी रूप से प्रतिवादी संख्या 2 के पक्ष में हस्तांतरित की जा सकती थी और कोई धोखा नहीं था। इसके बाद की बिक्री 2016 में हुई, यानी प्रतिवादी संख्या 2 द्वारा कथित रूप से पैसे देने के लगभग 4 साल बाद। इस प्रकार, धोखाधड़ी का बुनियादी तत्व अनुपस्थित है।”
अदालत ने यह भी पाया कि आईपीसी की धारा 423 को भी गलत तरीके से लागू किया गया था, क्योंकि दस्तावेजों में प्रतिफल के संबंध में कोई झूठा कथन नहीं था। अदालत ने जोड़ा कि यदि सेल डीड में कोई गलत तथ्य था भी, तो उससे केवल अंतिम खरीदार को शिकायत का अधिकार मिल सकता था, न कि प्रतिवादी संख्या 2 को। इसे “विशुद्ध दीवानी विवाद पर आपराधिकता की छाया डालने का एक उत्कृष्ट उदाहरण” बताते हुए पीठ ने कहा कि न्यायिक निरंतरता और औचित्य का तकाजा था कि याचिकाकर्ता को भी समान राहत दी जाती।
अदालत का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट के 19 सितंबर 2022 के आदेश को निरस्त कर दिया। इसके साथ ही अदालत ने कडुगोडी पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर संख्या 121/2016 और उससे उत्पन्न सभी परिणामी कार्यवाहियों को रद्द कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: सुधा राकेश बनाम कर्नाटक राज्य एवं अन्य
वाद संख्या: विशेष अनुमति याचिका (आपराधिक) संख्या 12638/2022
पीठ: जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह
निर्णय की तिथि: 05 अक्टूबर 2026

