बिना अनिवार्य सर्टिफिकेट के सोशल मीडिया चैट एडल्ट्री का सबूत नहीं, पत्नी को गुजारा भत्ता देने से इनकार नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि बिना अनिवार्य कानूनी सर्टिफिकेट के पेश किए गए सोशल मीडिया मैसेज को यह साबित करने का सबूत नहीं माना जा सकता कि पत्नी ‘एडल्ट्री में रह रही है’ (लिविंग इन एडल्ट्री)। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल ऐसे मैसेज के आधार पर किसी पत्नी को गुजारा भत्ता (भरण-पोषण) देने से मना नहीं किया जा सकता। पारिवारिक न्यायालय द्वारा पत्नी को गुजारा भत्ता देने के आदेश को सही ठहराते हुए जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय ने टिप्पणी की कि भरण-पोषण के हक से वंचित करने के लिए किसी अन्य व्यक्ति के साथ लगातार और आदतन संबंध में रहने का पुख्ता और स्पष्ट सबूत होना चाहिए, जिसे केवल साधारण चैट या शक के आधार पर तय नहीं किया जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला पति-पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद से जुड़ी एक आपराधिक पुनरीक्षण (रिवीजन) याचिका का है। आपसी मतभेदों के चलते दोनों अलग-अलग रहने लगे थे। इसके बाद पत्नी ने यह कहते हुए गुजारा भत्ते की अर्जी लगाई कि वह अपना खर्च उठाने में असमर्थ है, जबकि पर्याप्त साधन होने के बावजूद पति उसका भरण-पोषण करने से इनकार कर रहा है।

चंदौसी स्थित संभल के प्रधान न्यायाधीश, पारिवारिक न्यायालय ने 1 अक्टूबर 2025 को पत्नी की अर्जी स्वीकार करते हुए उसके पक्ष में गुजारा भत्ते का आदेश दिया था। इस आदेश को चुनौती देते हुए पति ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बीएनएसएस) की धारा 438 और 442 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

दोनों पक्षों के तर्क

याचिकाकर्ता पति की ओर से पेश वकील देवदीप मालवीय ने तर्क दिया कि पत्नी कानूनन गुजारा भत्ता पाने की हकदार नहीं है। उनका दावा था कि पत्नी बिना किसी ठोस वजह के ससुराल छोड़कर गई है और वह एक वकील के साथ विवाहेतर संबंध में रह रही है (‘लिविंग इन एडल्ट्री’)। अपने इस आरोप को साबित करने के लिए पति ने पत्नी और उस वकील के बीच हुई कथित इंस्टाग्राम चैट के प्रिंटआउट अदालत में पेश किए और दावा किया कि यह बातचीत दोनों के बीच अवैध संबंध को साबित करती है।

दूसरी तरफ, राज्य सरकार की ओर से पेश अपर शासकीय अधिवक्ता (एजीए) और पत्नी के वकील आशुतोष उपाध्याय ने याचिका का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि भरण-पोषण से जुड़े कानून का मकसद जरूरतमंद और बेसहारा जीवनसाथी को भुखमरी और कंगाली से बचाना है। उन्होंने दलील दी कि ‘लिविंग इन एडल्ट्री’ का मतलब किसी के साथ लगातार संबंध में रहना होता है, न कि कोई छिटपुट बातचीत या केवल शक होना। इसके अलावा, उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि इंस्टाग्राम चैट के प्रिंटआउट के साथ इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य कानून के तहत जरूरी कानूनी सर्टिफिकेट नहीं लगाया गया है, इसलिए इसे सबूत के तौर पर स्वीकार ही नहीं किया जा सकता।

READ ALSO  गुजरात हाई कोर्ट ने आवारा मवेशियों की समस्या पर अंकुश लगाने के लिए नीति बनाने में विफलता पर राज्य सरकार की खिंचाई की

हाईकोर्ट का विश्लेषण और कानूनी नजीरें

मामले के मुख्य बिंदु पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि भरण-पोषण मामलों में ‘एडल्ट्री में रहने’ के आधार को साबित करने के लिए किस स्तर के साक्ष्य की आवश्यकता होती है, इसे समझना जरूरी है। कोर्ट ने दोहराया कि भरण-पोषण कानून का बुनियादी मकसद जरूरतमंद व्यक्तियों को गरिमापूर्ण जीवन जीने के साधन देना है। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों—दुख्तर जहां बनाम मोहम्मद फारूक (1987) और रजनेश बनाम नेहा (2021)—का हवाला देते हुए जस्टिस उपाध्याय ने कहा कि ये कार्यवाहियां सामाजिक न्याय के उद्देश्य से बनाई गई हैं और इनकी व्याख्या उदार होनी चाहिए। साथ ही, कानून के तहत किसी अयोग्यता का आरोप लगाने वाले पक्ष पर ही उसे साबित करने की पूरी जिम्मेदारी होती है।

कानून में दिए गए ‘लिविंग इन एडल्ट्री’ के अपवाद पर जोर देते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:

READ ALSO  रामनवमी जुलूस पर रोक, सियासी घमासान हुई तेज,सुप्रीम कोर्ट पहुँच सकता मामला

“कानून के तहत ‘लिविंग इन एडल्ट्री’ (व्यभिचार में रहना) वाक्यांश की व्याख्या बेहद सावधानी से की जानी चाहिए। विधायिका द्वारा सोच-समझकर इस्तेमाल किया गया शब्द ‘लिविंग इन’ स्पष्ट रूप से किसी के साथ निरंतर, जारी और आदतन अवैध संबंध में रहने के आचरण को दर्शाता है। इसमें कोई एक अकेली या क्षणिक चूक शामिल नहीं है, और न ही केवल सामान्य बातचीत, पेशेवर परिचय या निराधार शक के आधार पर ऐसा निष्कर्ष निकाला जा सकता है। किसी पति द्वारा भरण-पोषण के दावे को शुरुआती स्तर पर ही खारिज कराने के लिए यह आवश्यक है कि वह स्पष्ट और ठोस सबूत पेश करे, जो प्रत्यक्ष रूप से इस निरंतर विवाहेतर संबंध को साबित करता हो।”

इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की स्वीकार्यता पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि डिजिटल सबूतों को भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 65-बी की कसौटी पर परखा जाना अनिवार्य है। सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ द्वारा अर्जुन पंडितराव खोतकर बनाम कैलाश कुशनराव गोरंट्याल (2020) में दिए गए फैसले का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के द्वितीयक साक्ष्य (प्रिंटआउट आदि) को स्वीकार करने के लिए वैधानिक सर्टिफिकेट अनिवार्य शर्त है। यह सख्त नियम डिजिटल डेटा की संवेदनशील प्रकृति और उसमें आसानी से छेड़छाड़ की आशंकाओं को देखते हुए तय किया गया है।

READ ALSO  अनुचित कानूनी सलाह देने के लिए वकील पर आपराधिक मुक़दमा नहीं हो सकता- जानिए हाईकोर्ट का निर्णय

याचिकाकर्ता द्वारा पेश की गई इंस्टाग्राम चैट के साथ अनिवार्य सर्टिफिकेट न होने के कारण हाईकोर्ट ने उसे कानूनी तौर पर अमान्य करार दिया। कोर्ट ने आगे कहा:

“यदि तर्क के लिए असत्यापित चैट की सामग्री को देख भी लिया जाए, तो भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर महज संदेश, शारीरिक निकटता या साथ रहने के पुख्ता सबूत के बिना, कानूनी रूप से यह साबित करने के लिए पूरी तरह अपर्याप्त हैं कि पत्नी लगातार ‘लिविंग इन एडल्ट्री’ में रह रही है। लगातार ऐसा विवाहेतर जीवन जीने की बात साबित करने का भारी भार याचिकाकर्ता पर है, जिसे साबित करने में वह पूरी तरह विफल रहा है।”

हाईकोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने पारिवारिक न्यायालय के आदेश में कोई अधिकार क्षेत्र से जुड़ी गलती, प्रक्रियात्मक खामी या त्रुटि नहीं पाई। कोर्ट ने माना कि निचली अदालत ने भरण-पोषण कानून के जन-कल्याणकारी मकसद को सही प्राथमिकता दी है। मामले में कोई मेरिट न पाते हुए जस्टिस उपाध्याय ने पति की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी और 1 अक्टूबर 2025 के भरण-पोषण आदेश को बरकरार रखा।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: शोभित कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य
वाद संख्या: क्रिमिनल रिवीजन संख्या 7800/2025
पीठ: जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय
निर्णय की तिथि: 29 सितंबर 2026

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles