पहले पति या पत्नी के रहते लिव-इन में रहने वालों को सुरक्षा नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

बिना तलाक लिए किसी अन्य व्यक्ति के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले विवाहित लोगों को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कानूनी संरक्षण देने से साफ इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पहले से वैध रूप से विवाहित व्यक्ति जब तक सक्षम अदालत से औपचारिक तलाक नहीं ले लेता, तब तक वह नए रिश्ते के लिए न्यायिक सुरक्षा पाने का हकदार नहीं है।

न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की पीठ ने एक युगल की याचिका का निस्तारण करते हुए यह फैसला सुनाया। अदालत ने टिप्पणी की कि इस प्रकार के संबंधों को संरक्षण प्रदान करने का सीधा अर्थ भारतीय कानून के तहत दंडनीय द्विविवाह (बिगामी) जैसे अपराध को ढाल मुहैया कराना होगा। इसलिए अदालत ने स्थानीय पुलिस को इस युगल को सुरक्षा देने का आदेश जारी करने से मना कर दिया।

घर से भागे इस जोड़े ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए आरोप लगाया था कि वे पति-पत्नी की तरह साथ रह रहे हैं और उन्हें अपनी जान का खतरा है। उन्होंने स्थानीय पुलिस को अपनी शांतिपूर्ण जिंदगी में दखल न देने और सुरक्षा मुहैया कराने का निर्देश देने की मांग की थी। हालांकि, राज्य सरकार के वकील ने उनकी इस याचिका का कड़ा विरोध किया।

व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सीमाएं

25 अगस्त को दिए गए अपने आदेश में अदालत ने कहा कि बालिग नागरिकों को अपनी मर्जी से जीवन जीने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है, जिसमें तीसरे पक्ष या माता-पिता भी हस्तक्षेप नहीं कर सकते। इसके बावजूद, अदालत ने रेखांकित किया कि यह स्वतंत्रता पूरी तरह असीमित या निरंकुश नहीं है।

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पीठ ने कहा कि एक व्यक्ति की स्वतंत्रता वहीं समाप्त हो जाती है, जहां से दूसरे व्यक्ति के कानूनी अधिकार शुरू होते हैं। अदालत के अनुसार, पहले से मौजूद जीवित पति या पत्नी को अपने साथी के साथ रहने और उसके साहचर्य का वैधानिक अधिकार होता है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता की आड़ में किसी के इस कानूनी अधिकार को छीना नहीं जा सकता। पीठ ने साफ किया कि अगर कोई विवाहित व्यक्ति नए साथी के साथ रहना चाहता है या दूसरा विवाह करना चाहता है, तो उसे सबसे पहले सक्षम अदालत से तलाक की डिक्री हासिल करनी होगी।

जान के खतरे पर पुलिस से गुहार का विकल्प खुला

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याचिका खारिज करने के बावजूद हाईकोर्ट ने यह साफ किया कि याचिकाकर्ताओं के पास वास्तविक खतरे की स्थिति में कानूनी रास्ते बंद नहीं हुए हैं।

अदालत ने कहा कि यदि याचिकाकर्ताओं को हिंसा या शारीरिक नुकसान की कोई गंभीर आशंका होती है, तो वे सीधे संबंधित पुलिस अधिकारियों से संपर्क करने के लिए स्वतंत्र हैं। पुलिस प्रशासन उनकी शिकायत की सत्यता की जांच करेगा और कानून के अनुसार उचित कदम उठाएगा।

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