केरल हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यौन मंशा के साथ किसी बच्चे के निजी अंग पर मुंह लगाना पोक्सो (POCSO) एक्ट की धारा 3(डी) के तहत ‘पेनेट्रेटिव सेक्शुअल असॉल्ट’ (प्रवेशी यौन हमला) के दायरे में आता है। अदालत ने साफ किया कि कानून के इस प्रावधान के तहत ओरल सेक्स या शरीर के अंदर गहरे प्रवेश (डीपर पेनिट्रेशन) की अनिवार्यता नहीं है। 14.5 वर्षीय बालक के साथ यौन उत्पीड़न करने और उसे नशीले पदार्थ देने के मामले में 61 वर्षीय दोषी की अपील खारिज करते हुए जस्टिस ए. बदरुद्दीन की एकल पीठ ने ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई 20 वर्ष के कठोर कारावास की सजा को बरकरार रखा।
मामले की पृष्ठभूमि
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 26 जनवरी 2020 को शाम करीब 7:00 बजे आरोपी पीड़ित बालक को मेझुवेली पंचायत के कल्लामोडी स्थित अपनी दुकान के कमरे में ले गया। वहां आरोपी ने बालक को जबरन बीयर पिलाई और गांजे की बीड़ी पीने को दी। इसके बाद आरोपी ने बालक के कपड़े उतारकर उसके निजी अंग को चूमा और उसी दिन दो बार उसके साथ गंभीर यौन उत्पीड़न किया। आरोपी ने बालक को घर जाकर अपने माता-पिता से झगड़ा करने की गलत सलाह भी दी थी।
नशीले पदार्थों के असर और असामान्य व्यवहार के चलते जब बालक ने अपने पिता पर पत्थर फेंक दिया, तो परिजन उसे चाइल्डलाइन काउंसलर (पीडब्लू-2) के पास ले गए। वहां काउंसलिंग के दौरान बालक ने पूरी घटना की जानकारी दी। इसके बाद पुलिस ने पीड़ित का बयान दर्ज कर पोक्सो एक्ट की धारा 4 सपठित 3(डी), 7 सपठित 8, 6 सपठित 5(एल), भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 377 और जुवेनाइल जस्टिस (जेजे) एक्ट की धारा 77 के तहत प्राथमिकी दर्ज की।
फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट, पथनमथिट्टा ने आरोपी को पोक्सो एक्ट की धारा 6 सपठित 5(एल), धारा 10 सपठित 9(एल) और जेजे एक्ट की धारा 77 के तहत दोषी ठहराया था। ट्रायल कोर्ट ने उसे गंभीर पेनिट्रेटिव सेक्शुअल असॉल्ट के लिए 20 वर्ष के कठोर कारावास और 1 लाख रुपये के जुर्माने के साथ-साथ अन्य धाराओं में 5-5 वर्ष के कारावास की सजा सुनाई थी। सभी सजाएं साथ-साथ चलने का आदेश दिया गया था, जबकि आईपीसी की धारा 377 के आरोप से उसे बरी कर दिया गया था। इस फैसले और सजा के खिलाफ अपीलकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
अदालत के समक्ष दलीलें
अपीलकर्ता के वकील ने दलील दी कि अभियोजन पक्ष के सबूत सजा बरकरार रखने के लिए अपर्याप्त हैं। यह दावा किया गया कि पीड़ित बालक बुरी आदतों वाला था और स्थानीय लोगों ने पूर्व में उसके खिलाफ शिकायत की थी, जिसके चलते आरोपी को इस मामले में झूठा फंसाया गया है। वकील ने यह भी अनुरोध किया कि अपीलकर्ता की उम्र 61 वर्ष है, इसलिए सजा के मामले में नरमी बरती जानी चाहिए।
दूसरी तरफ, सरकारी वकील ने अपील का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि पीड़ित (पीडब्लू-1) की गवाही पूरी तरह विश्वसनीय, स्पष्ट और सुसंगत है। इस गवाही की पुष्टि चाइल्डलाइन काउंसलर और पुलिस अधिकारियों सहित अन्य आधिकारिक गवाहों के बयानों से भी होती है। उन्होंने दलील दी कि झूठे फंसाने के केवल मौखिक दावे के अलावा जिरह के दौरान कोई ठोस बचाव पेश नहीं किया गया और न ही पूर्व शिकायतों के संबंध में कोई रिकॉर्ड प्रस्तुत किया गया।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और महत्वपूर्ण टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने पाया कि स्कूल एडमिशन रजिस्टर (प्रदर्श पी15) के माध्यम से यह निर्विवाद रूप से साबित है कि पीड़ित का जन्म 3 मई 2005 को हुआ था और घटना के समय वह पोक्सो एक्ट की धारा 2(1)(डी) के तहत एक ‘बच्चा’ था।
अदालत ने इस मुख्य कानूनी बिंदु की जांच की कि क्या पीड़ित के निजी अंग को चूमना पोक्सो एक्ट की धारा 3(डी) के तहत ‘पेनेट्रेटिव सेक्शुअल असॉल्ट’ और धारा 6 सपठित 5(एल) के तहत दंडनीय अपराध है।
अधिनियम की वैधानिक परिभाषा का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“पीडब्लू-1 के इस साक्ष्य को देखते हुए कि आरोपी ने दो मौकों पर उसके लिंग को चूमा था, तथा पोक्सो एक्ट की धारा 3(डी) के वैधानिक शब्दों के अनुसार, यह स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि पोक्सो एक्ट की धारा 3(डी) में उल्लिखित अपराध मानने के लिए बच्चे के लिंग, योनि, गुदा या मूत्रमार्ग पर आरोपी का मुंह लगाना ही पर्याप्त है। यानी, यह कानून इस विशिष्ट खंड के लिए ओरल सेक्स या गहरे प्रवेश को अनिवार्य नहीं बनाता है और कोई भी ऐसा जानबूझकर किया गया शारीरिक संपर्क, जहां निर्दिष्ट निजी अंगों पर मुंह लगाया जाता है, इस वैधानिक आवश्यकता को पूरा करता है।”
अदालत ने आगे स्पष्ट किया:
“इसी प्रकार, जब यौन मंशा से मुंह लिंग को छूता है, तो उक्त कृत्य को धारा 3(डी) के तहत पेनिट्रेटिव सेक्शुअल असॉल्ट माना जाएगा, जो पोक्सो एक्ट की धारा 4 के तहत दंडनीय है। अतः विद्वान विशेष न्यायाधीश का यह निष्कर्ष पूरी तरह सही है कि आरोपी ने पोक्सो एक्ट की धारा 5(एल) सपठित धारा 6 के तहत दंडनीय अपराध किया है।”
पोक्सो एक्ट की धारा 10 सपठित धारा 9(एल) के तहत दोषसिद्धि के संबंध में अदालत ने कहा:
“वर्तमान मामले में, पीडब्लू-1 के साक्ष्य से स्पष्ट है कि आरोपी ने पीड़ित के लिंग को बार-बार चूमा, ऐसी स्थिति में विद्वान विशेष न्यायाधीश का यह निर्णय सही है कि अपीलकर्ता/आरोपी ने पोक्सो एक्ट की धारा 9(एल) सपठित धारा 10 के तहत अपराध किया है। अतः इस दोषसिद्धि को बरकरार रखा जाना उचित है।”
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने अपील में कोई मेरिट न पाते हुए कहा कि स्पेशल कोर्ट द्वारा तय की गई दोषसिद्धि और सजा पूरी तरह उचित है और इसमें किसी भी तरह के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने अपील खारिज कर दी और ट्रायल कोर्ट के फैसले को पूरी तरह बरकरार रखा।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: थॉमस थॉमस बनाम केरल राज्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 1843/2023
पीठ: जस्टिस ए. बदरुद्दीन
निर्णय की तिथि: 1 सितंबर 2026

