कंपनी को बंद करने की प्रक्रिया शुरू करने से बकाया वसूली के सिविल मुकदमे की समय-सीमा नहीं बढ़ती: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी कंपनी कोर्ट के समक्ष वाइंडिंग-अप (कंपनी समापन) याचिका दाखिल करने से बकाया राशि की वसूली के लिए अलग से दायर किए जाने वाले सिविल मुकदमे की समय-सीमा (लिमिटेशन पीरियड) पर कोई असर नहीं पड़ता है और न ही इससे समय-सीमा बढ़ती है। जस्टिस जे. बी. पारडीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने फर्स्ट अपीलेट कोर्ट (प्रथम अपीलीय अदालत) के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें मैसर्स ट्रेड सेंटर द्वारा दायर मुकदमे में मगेबा ब्रिज प्रोडक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ बकाया राशि भुगतान का आदेश दिया गया था। शीर्ष अदालत ने माना कि यद्यपि यह मुकदमा एक पंजीकृत पार्टनरशिप फर्म द्वारा सही तरीके से दायर किया गया था, फिर भी बकाया वसूली का यह दावा समय-सीमा से बाहर होने के कारण खारिज किए जाने योग्य है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद मैसर्स ट्रेड सेंटर द्वारा मगेबा ब्रिज प्रोडक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ बकाया सप्लाई बिलों के 23,41,693 रुपये और ब्याज मिलाकर कुल 24,36,105 रुपये की वसूली के लिए दायर मुकदमे से शुरू हुआ था।

ट्रायल कोर्ट (निचली अदालत) ने शुरू में इस मुकदमे को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि वादी फर्म यह साबित करने में विफल रही कि वह एक पंजीकृत (रजिस्टर्ड) पार्टनरशिप फर्म है। इसलिए, भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 की धारा 69(2) के तहत यह मुकदमा चलने योग्य नहीं है।

इसके बाद, फर्स्ट अपीलेट कोर्ट में अपील की गई। अपीलीय अदालत ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलट दिया। उसने रजिस्ट्रार ऑफ फर्म्स, पश्चिम बंगाल द्वारा जारी पंजीकरण ज्ञापन (एक्ज़िबिट-8) पर भरोसा किया, जिसमें 14 मई 2010 को फर्म के पंजीकरण (पंजीकरण संख्या L73931) दर्ज होने की बात थी। अपीलीय अदालत ने सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के आदेश XLI नियम 27(1) के तहत अतिरिक्त दस्तावेज (फॉर्म-VIII की प्रमाणित प्रति) को रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति दी। इन दस्तावेजों को स्वीकार करते हुए, अपीलीय अदालत ने वादी के पक्ष में फैसला सुनाया और मगेबा ब्रिज प्रोडक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड को 24,36,105 रुपये पर मुकदमा दायर करने की तारीख से 6% वार्षिक ब्याज के साथ भुगतान करने का निर्देश दिया। इस फैसले को मगेबा ब्रिज प्रोडक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता (मगेबा ब्रिज प्रोडक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री निखिल नायर ने तर्क दिया कि वसूली का यह दावा समय-सीमा (लिमिटेशन) से बाहर था और वादी फर्म द्वारा ट्रायल कोर्ट के समक्ष अपने वैध पंजीकरण का कोई ठोस प्रमाण पेश नहीं किया गया था।

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दूसरी ओर, रेस्पोंडेंट (मैसर्स ट्रेड सेंटर) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री मनीष गोस्वामी ने दलील दी कि फर्म का पंजीकरण पूरी तरह से सिद्ध हो चुका था। समय-सीमा के मुद्दे पर रेस्पोंडेंट का कहना था कि वाद का कारण 3 जून 2008 (कर्ज की मांग), 1 अगस्त 2008 (अपीलकर्ता का जवाब) और 2 सितंबर 2008 (आंशिक भुगतान) को उत्पन्न हुआ था। इसके अलावा, रेस्पोंडेंट ने तर्क दिया कि उसने समय-सीमा के भीतर कंपनी कोर्ट के समक्ष वाइंडिंग-अप याचिका दायर की थी और कंपनी कोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए तीन महीने के भीतर सिविल मुकदमा दायर करने की अनुमति दी थी।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने फर्म के पंजीकरण और समय-सीमा के दोनों प्रमुख पहलुओं की विस्तृत जांच की।

भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 की धारा 69(2) के तहत पंजीकरण के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने फर्स्ट अपीलेट कोर्ट के निष्कर्ष की पुष्टि की। अदालत ने कहा कि एक्ज़िबिट-8 और फॉर्म-VIII की प्रमाणित प्रति से यह निर्विवाद रूप से साबित होता है कि फर्म 14 मई 2010 को पंजीकृत थी। अदालत ने टिप्पणी की कि सीपीसी के आदेश XLI नियम 27(1) के तहत अतिरिक्त साक्ष्य को स्वीकार करना पूरी तरह उचित था क्योंकि इसका उद्देश्य “न्याय के उद्देश्य को आगे बढ़ाना और अदालत को निर्णय सुनाने में सक्षम बनाना था”

हालांकि, समय-सीमा के सवाल पर शीर्ष अदालत अपीलकर्ता के तर्कों से सहमत हो गई। पीठ ने रेखांकित किया कि यह मुकदमा किसी लगातार चलने वाले खाते (रनिंग अकाउंट) के आधार पर नहीं, बल्कि प्रतिवादी के खिलाफ जारी किए गए विशिष्ट व्यक्तिगत बिलों के आधार पर दायर किया गया था। अपीलकर्ता के 1 अगस्त 2008 के पत्र (एनैक्सचर P-18) का विश्लेषण करते हुए अदालत ने पाया कि इसमें कुल बकाया राशि की कोई स्वीकृति नहीं थी; भुगतान केवल तीन विशिष्ट स्वीकार्य बिलों के बदले किया गया था, न कि कुल विवादित राशि के आंशिक भुगतान के रूप में।

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वाइंडिंग-अप कार्यवाही में बिताए गए समय पर सीमा अधिनियम (लिमिटेशन एक्ट), 1963 की धारा 14 के लागू होने का विश्लेषण करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कल्पराज धरमशी एवं अन्य बनाम कोटक इन्वेस्टमेंट्स एडवाइजर लिमिटेड एवं अन्य (2021) मामले का संदर्भ दिया। अदालत ने टिप्पणी की कि “कानून बनाने का उद्देश्य जन कल्याण को आगे बढ़ाना है। संपूर्ण विधायी प्रक्रिया न्याय और तर्क के विचारों से प्रभावित होती है… सीमा अधिनियम की धारा 5 और 14 में निहित प्रावधान राहत प्रदान करने के लिए हैं, जहां किसी व्यक्ति से कोई गलती हुई हो।”

यशवंत देवराव देशमुख बनाम वालचंद रामचंद्र कोठारी (1950) और जिग्नेश शाह एवं अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य (2019) के मामलों में तय सिद्धांतों को लागू करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि कंपनी कोर्ट के समक्ष वाइंडिंग-अप कार्यवाही और पैसे की वसूली का सिविल मुकदमा दोनों अलग-अलग और स्वतंत्र उपचार हैं, जिनकी प्रक्रियाएं भी भिन्न हैं। यशवंत देवराव देशमुख मामले में कोर्ट ने माना था कि दिवालियापन की कार्यवाही को धारा 14 के तहत बाहर नहीं रखा जा सकता क्योंकि वह समान राहत प्राप्त करने के लिए नहीं होती, जहां अंतिम वसूली केवल एक “परिणाम या असर” मात्र होती है।

पीठ ने स्पष्ट किया: “इस मामले पर भी यही विपरीत स्थिति पूरी तरह लागू होती है कि वाइंडिंग-अप कार्यवाही शुरू करने से, जिससे वसूली हो भी सकती है और नहीं भी, पैसे की वसूली के अलग सिविल मुकदमे की समय-सीमा पर कोई असर नहीं पड़ेगा।”

अदालत ने आगे कहा कि कंपनी कोर्ट के पास कानून द्वारा निर्धारित समय-सीमा को बढ़ाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं था। तिथियों की समीक्षा करते हुए कोर्ट ने पाया कि कंपनी याचिका 10 फरवरी 2009 को दायर की गई थी, जबकि 30 जनवरी 2006 के बिलों की वसूली के लिए मुकदमा दायर करने की समय-सीमा 29 जनवरी 2009 को ही समाप्त हो चुकी थी। अन्य बकाया बिलों के लिए, जिनमें से अंतिम बिल 6 मार्च 2007 का था, 5 जून 2010 को दायर किया गया मुकदमा तीन साल की निर्धारित समय-सीमा से काफी बाद में दायर किया गया था।

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सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि यद्यपि यह मुकदमा एक पंजीकृत पार्टनरशिप फर्म द्वारा विधिवत दायर किया गया था, लेकिन मौद्रिक वसूली का दावा समय-सीमा द्वारा बाधित था। अदालत ने अपील को स्वीकार करते हुए फर्स्ट अपीलेट कोर्ट के वसूली संबंधी आदेश को रद्द कर दिया और समय-सीमा समाप्त होने के आधार पर मुकदमे को खारिज कर दिया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: मगेबा ब्रिज प्रोडक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम मैसर्स ट्रेड सेंटर

वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 10658/2026

पीठ: जस्टिस जे. बी. पारडीवाला, जस्टिस के. विनोद चंद्रन

निर्णय की तिथि: 12 अगस्त 2026

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