कलकत्ता हाईकोर्ट ने तृणमूल नेता कुणाल घोष और प्रदर्शनकारियों को अवमानना का दोषी ठहराया, लगाया जुर्माना

कलकत्ता हाईकोर्ट ने तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के प्रवक्ता कुणाल घोष और शिक्षक भर्ती परीक्षा से जुड़े प्रदर्शनकारियों को आपराधिक अवमानना का दोषी ठहराया है। अदालत ने उनके माफीनामे को खारिज करते हुए उन पर जुर्माना लगाने का फैसला सुनाया है। जस्टिस अरिजीत बनर्जी, जस्टिस सब्यसाची भट्टाचार्य और जस्टिस राजर्षी भारद्वाज की विशेष तीन सदस्यीय पीठ ने 13 जुलाई को यह आदेश जारी किया। पीठ ने स्पष्ट किया कि जजों और वकीलों पर किए जाने वाले हमले सीधे तौर पर देश की न्याय प्रणाली की बुनियादी नींव पर चोट करते हैं।

अदालत ने टीएमसी नेता कुणाल घोष पर अधिकतम 2,000 रुपये का जुर्माना लगाया है। जुर्माना न चुकाने की स्थिति में उन्हें तीन दिन की साधारण कैद की सजा भुगतनी होगी। कोर्ट ने घोष के माफीनामे को नामंजूर करते हुए कहा कि यह दिल से मांगी गई माफी नहीं है। वहीं, शिक्षक भर्ती विवाद से जुड़े प्रदर्शनकारियों के प्रति कोर्ट ने थोड़ा नरम रुख अपनाया। उनकी आर्थिक तंगी और नियुक्तियां अटकने के कारण उपजे मानसिक तनाव को देखते हुए कोर्ट ने उन पर प्रति व्यक्ति 1,000 रुपये का जुर्माना लगाया।

अदालत ने अपने आदेश में सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि आंदोलन करने वाले सभी लोग पढ़े-लिखे हैं और उन्हें कानून का पूरा ज्ञान होना चाहिए। वे कोई सीधे-सादे ग्रामीण या अनपढ़ लोग नहीं हैं जिन्हें अपने किए के अंजाम का अंदाजा न हो। कोर्ट के अनुसार, प्रदर्शनकारियों का यह कृत्य सीधे तौर पर एक सिटिंग जज को डराने-धमकाने और उन पर दबाव बनाने की कोशिश था।

सड़क पर हंगामा और जज के खिलाफ नारेबाजी

यह पूरा मामला पिछले साल 25 अप्रैल 2025 को कोलकाता हाईकोर्ट के बाहर हुए उग्र विरोध प्रदर्शन से शुरू हुआ था। प्रदर्शन करने वाले लोग पश्चिम बंगाल स्कूल सेवा आयोग (एसएससी) के तहत शारीरिक शिक्षा और कार्य शिक्षा शिक्षक भर्ती के उम्मीदवार थे, जिनकी नियुक्तियां कानूनी मुकदमों के कारण लंबे समय से अटकी हुई थीं।

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आरोप है कि प्रदर्शनकारियों ने हाईकोर्ट के आसपास की सड़कों को जाम कर दिया, वकीलों को उनके चैंबर में जाने से रोका और मामले की सुनवाई कर रहे एक सिटिंग जज के खिलाफ अपशब्द कहे। प्रदर्शन के दौरान जज की तस्वीरों को जमीन पर रखकर रौंदा भी गया और मामले से जुड़े अन्य वकीलों को भी निशाना बनाया गया।

इस घटना के अगले ही दिन, टीएमसी प्रवक्ता कुणाल घोष ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। इसमें उन्होंने भर्ती मुकदमे से जुड़े कुछ वकीलों की तीखी आलोचना की और जज पर भी सवाल उठाए। घोष ने कहा था कि उन्हें समझ नहीं आता कि जब माकपा (सीपीआई-एम) से जुड़े वकील कोर्ट में पेश होते हैं, तो न जाने जज साहब को क्या हो जाता है। उन्होंने पूर्व जज अभिजीत गंगोपाध्याय की तुलना ‘गॉड-गॉड’ (भगवान) से करते हुए आरोप लगाया था कि मौजूदा जज भी पक्षपात कर रहे हैं और हर सुनवाई पर नए दस्तावेज मंगाकर मामले को जानबूझकर लंबा खींच रहे हैं। हाईकोर्ट ने इसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सीधा हमला माना।

बचाव पक्ष की दलीलें और माफीनामा खारिज

सुनवाई के दौरान आरोपियों के वकीलों ने कोर्ट से बिना शर्त माफी मांगी थी। प्रदर्शनकारियों के वकील पार्थ सारथी सेनगुप्ता ने दलील दी कि उनके मुवक्किल परिस्थितियों के मारे हैं। नियुक्तियों में हो रही भारी देरी के कारण वे मानसिक और आर्थिक रूप से टूट चुके थे और कोर्ट का अपमान करने का उनका कोई इरादा नहीं था।

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कुणाल घोष की तरफ से वरिष्ठ वकील कल्याण बंद्योपाध्याय ने पैरवी की। उन्होंने अदालत को बताया कि घटना के दिन घोष घटनास्थल पर मौजूद नहीं थे, बल्कि वह कोलकाता के न्यूटाउन स्थित एक समाचार चैनल के स्टूडियो में थे। उन्होंने दलील दी कि घोष की टिप्पणियां वकीलों के राजनीतिक और पेशेवर आचरण पर थीं, न कि सीधे तौर पर अदालत या जजों के खिलाफ।

हालांकि, बार लाइब्रेरी क्लब के वकील सुभांकर नाग और इनकॉर्पोरेटेड लॉ सोसायटी के वकील मुकुल लाहिड़ी ने इस माफीनामे का पुरजोर विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि जजों की मंशा पर संदेह जताना और उन पर आरोप लगाना न्यायपालिका की गरिमा पर चोट है। उन्होंने कोर्ट से आग्रह किया कि ऐसी माफी को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए जो केवल सजा से बचने की आखिरी ढाल के रूप में पेश की गई हो। अदालत ने इन दलीलों को सही मानते हुए सभी दोषियों की माफी को अस्वीकार कर दिया।

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