राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: बाहरी राज्यों के अभ्यर्थी राजस्थान में नहीं ले पाएंगे आरक्षित वर्ग में पीजी मेडिकल प्रवेश

विशेषज्ञ शिक्षा में आरक्षण नीतियों के कार्यान्वयन को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय में, राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अन्य राज्यों के अभ्यर्थी राजस्थान के भीतर पोस्ट-ग्रेजुएट (पीजी) मेडिकल प्रवेश के लिए आरक्षित श्रेणी के लाभ का दावा नहीं कर सकते। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि आरक्षित श्रेणियों की पहचान स्वाभाविक रूप से राज्य-विशिष्ट होती है, जो स्थानीय सामाजिक-आर्थिक स्थितियों पर आधारित होती है। ऐसे में इन लाभों को गैर-मूल निवासी अभ्यर्थियों तक विस्तारित करना संवैधानिक ढांचे के विपरीत होगा।

यह फैसला जस्टिस संजीत पुरोहित ने ‘फेडरेशन ऑफ प्राइवेट मेडिकल एंड डेंटल कॉलेज ऑफ राजस्थान’ द्वारा दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया। याचिकाकर्ता ने नीट-पीजी (NEET-PG) काउंसलिंग बोर्ड के 18 फरवरी, 2026 के उस प्रस्ताव को चुनौती दी थी, जिसमें आरक्षण के नियमों को स्पष्ट किया गया था।

फेडरेशन ने अदालत से निर्देश मांगे थे कि अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) से संबंधित गैर-मूल निवासी अभ्यर्थियों को भी राजस्थान में आरक्षण का लाभ दिया जाए। याचिकाकर्ता का मुख्य उद्देश्य इन अभ्यर्थियों को कम योग्यता प्रतिशत (percentile) का लाभ दिलाना और उन्हें राज्य की आरक्षित सीटों पर काउंसलिंग में शामिल होने की अनुमति देना था।

याचिकाकर्ता फेडरेशन ने तर्क दिया कि बाहरी राज्यों के आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को इस लाभ से बाहर रखने से नीट-पीजी के क्वालिफाइंग पर्सेंटाइल को कम करने का मुख्य उद्देश्य ही विफल हो रहा है। उन्होंने कहा कि पर्सेंटाइल इसलिए कम किया गया था ताकि बड़ी संख्या में खाली सीटों को भरा जा सके। याचिकाकर्ता का यह भी आरोप था कि बोर्ड का यह निर्णय अप्रत्यक्ष रूप से ‘पूर्ण अधिवास-आधारित आरक्षण’ (domicile-based reservation) लागू करने जैसा है और काउंसलिंग प्रक्रिया के बीच में ही खेल के नियम बदले जा रहे हैं।

दूसरी ओर, राज्य सरकार ने काउंसलिंग बोर्ड के प्रस्ताव का बचाव किया। सरकार की ओर से दलील दी गई कि आरक्षण नीतियां राज्य-विशिष्ट मानदंडों के आधार पर अधिसूचित की जाती हैं और केवल उन्हीं उम्मीदवारों पर लागू होती हैं जो राजस्थान की अधिसूचित श्रेणियों के अंतर्गत आते हैं। राज्य ने यह भी स्पष्ट किया कि गैर-मूल निवासी उम्मीदवारों को काउंसलिंग में भाग लेने से रोका नहीं गया है, बल्कि उन्हें नियमानुसार ‘अनारक्षित’ (सामान्य) श्रेणी में रखा गया है।

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चुनौती को खारिज करते हुए जस्टिस संजीत पुरोहित ने टिप्पणी की कि आरक्षण की संवैधानिक योजना व्यक्तिगत राज्यों के भीतर विशिष्ट सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को दूर करने के लिए बनाई गई है।

कोर्ट ने कहा, “संवैधानिक योजना स्पष्ट रूप से राज्यवार आधार पर आरक्षित श्रेणियों की पहचान की परिकल्पना करती है, जो स्थानीय सामाजिक-आर्थिक स्थितियों में निहित है।” निर्णय में आगे कहा गया कि राज्य की सीमाओं के पार ऐसे लाभों का विस्तार करना इस संरचनात्मक ढांचे के विरुद्ध होगा।

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अदालत ने याचिकाकर्ता के उस दावे को भी खारिज कर दिया कि यह नीति 100 प्रतिशत डोमिसाइल आरक्षण पैदा करती है। कोर्ट ने साफ किया कि यह नीति केवल राज्य के पात्र उम्मीदवारों तक ही विशिष्ट आरक्षण लाभों को सीमित करती है, जबकि गैर-मूल निवासी उम्मीदवार सामान्य/अनारक्षित पूल की सीटों के लिए प्रतिस्पर्धा करने के लिए स्वतंत्र हैं।

विशेषज्ञ शिक्षा में मेरिट (योग्यता) के मुद्दे पर कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण रुख अपनाया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अभ्यर्थी आरक्षित श्रेणियों के लिए निर्धारित शिथिल मानकों (जैसे कम पर्सेंटाइल) का सहारा लेकर अनारक्षित सीटों पर प्रवेश नहीं मांग सकते। खाली सीटों को भरने के तर्क पर कोर्ट ने जोर देकर कहा कि प्रशासनिक लक्ष्य कानूनी मानकों से ऊपर नहीं हो सकते।

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राज्य की नीति में किसी भी तरह की अवैधता या भेदभाव नहीं पाते हुए, हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि काउंसलिंग बोर्ड का निर्णय आरक्षण के संवैधानिक ढांचे के अनुरूप है। परिणामस्वरुप, अदालत ने रिट याचिका और सभी लंबित आवेदनों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने यह पुष्टि की कि राजस्थान में नीट-पीजी प्रवेश के लिए बाहरी राज्यों के उम्मीदवारों को अनारक्षित श्रेणी के तहत ही माना जाएगा।

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