दिल्ली हाईकोर्ट ने विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम, 1999 (FEMA) के तहत तीन व्यक्तियों की अपीलों को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि बैंक खातों में जमा राशि की जब्ती का आदेश बिना किसी तार्किक कारण के नहीं दिया जा सकता। हाईकोर्ट ने माना कि यद्यपि FEMA के उल्लंघन के लिए जुर्माना लगाया जाना सही था, लेकिन खातों की जब्ती का आदेश “बिना किसी कारण के” (non-speaking) दिया गया था, जिसे बरकरार नहीं रखा जा सकता।
जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंद्र दुडेजा की खंडपीठ ने कहा कि FEMA की धारा 13(2) के तहत जब्ती की शक्ति का उपयोग करते समय न्यायिक अधिकारियों को स्पष्ट रूप से यह बताना होगा कि केवल जुर्माना लगाना ही पर्याप्त क्यों नहीं था।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता—सुनीता मेहता, सुभाष मेहता और संजय मेहता—कनाडा के निवासी थे। उन्होंने भारत में ‘अनिवासी (गैर-प्रत्यावर्तनीय) रुपया खाते’ (NRNR Accounts) खोले थे। वर्ष 2001 में, जिन सहकारी बैंकों में उनके खाते थे, उनके वित्तीय संकट में होने के कारण अपीलकर्ताओं ने उन खातों के बदले ऋण (loan) लिया। इसके बाद उन्होंने इसी ऋण राशि का उपयोग अन्य बैंकों में नए NRNR खाते खोलने के लिए किया।
प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने 2008 और 2009 के दौरान कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए आरोप लगाया कि नए NRNR खातों को विदेशी प्रेषण (remittance) के बजाय भारत के भीतर से लिए गए ऋण से खोलना FEMA और विदेशी मुद्रा प्रबंधन (जमा) विनियम, 2000 के प्रावधानों का उल्लंघन है। इसी आधार पर 2010 में जुर्माना लगाया गया और खातों की राशि जब्त करने का आदेश दिया गया, जिसे 2012 में अपीलीय न्यायाधिकरण ने भी सही ठहराया।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं की ओर से एडवोकेट आर.के. हंडू ने दलील दी कि नियमों के उल्लंघन की जिम्मेदारी केवल ‘अधिकृत डीलर’ (बैंक) की होती है, न कि खाताधारक की। उन्होंने यह भी कहा कि मार्च 2002 में संबंधित रेगुलेशन (5(1)(iv)) को हटा दिया गया था, इसलिए उसके बाद जारी नोटिस कानूनी रूप से मान्य नहीं थे। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के रायाला कॉर्पोरेशन (पी) लिमिटेड बनाम प्रवर्तन निदेशक (1969) के फैसले का हवाला दिया।
वहीं, प्रतिवादी (ED) की ओर से एडवोकेट अर्कज कुमार ने तर्क दिया कि नियमों के अनुसार NRNR खाते केवल विदेशों से भेजे गए फंड से ही खोले जा सकते हैं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के श्री भगवती स्टील रोलिंग मिल्स बनाम केंद्रीय उत्पाद शुल्क आयुक्त (2016) के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि किसी रेगुलेशन के हटने मात्र से उसके लागू रहने के दौरान किए गए उल्लंघन खत्म नहीं हो जाते।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ
हाईकोर्ट ने अपीलकर्ताओं की इस दलील को खारिज कर दिया कि केवल बैंकों पर जुर्माना लगाया जा सकता है। धारा 13(1) का उल्लेख करते हुए बेंच ने कहा:
“यह जिम्मेदारी अधिकृत डीलर और खाताधारक दोनों पर होती है। FEMA की धारा 13(1) के तहत उल्लंघन के लिए दोनों पर जुर्माना लगाया जा सकता है।”
नियमों के हटने (omission) के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इसे एक प्रकार का निरसन (repeal) माना जाएगा, जिससे पुराने दायित्व समाप्त नहीं होते। हाईकोर्ट ने कहा:
“मौजूदा NRNR खाते परिपक्वता (maturity) तक जारी रह सकते थे… आरबीआई का उद्देश्य अनिवासी भारतीयों के लिए पूर्ण परिवर्तनीयता प्रदान करना था। इसलिए, रायाला कॉर्पोरेशन मामले का फैसला इस मामले के तथ्यों पर लागू नहीं होता।”
हालांकि, खातों की जब्ती को हाईकोर्ट ने कानूनन गलत माना। बेंच ने जोर देकर कहा कि अधिकारियों को यह समझाना होगा कि केवल जुर्माना लगाना ही सजा के तौर पर काफी क्यों नहीं है:
“न्यायिक कार्य करते समय अधिकारी इस बात का कारण देने के लिए बाध्य हैं कि धारा 13(2) के तहत विवेकाधीन शक्ति का उपयोग क्यों किया जा रहा है। अधिकारी को यह निष्कर्ष देना होगा कि जुर्माना लगाने के अतिरिक्त संपत्ति को जब्त करना क्यों आवश्यक है।”
हाईकोर्ट ने यह भी गौर किया कि ऋण की राशि पहले ही बैंक खातों की मैच्योरिटी के साथ चुकाई जा चुकी थी और इससे विदेशी मुद्रा का कोई नुकसान नहीं हुआ था।
हाईकोर्ट का फैसला
हाईकोर्ट ने जुर्माने के आदेश को बरकरार रखा, लेकिन खातों की राशि जब्त करने के आदेश को रद्द कर दिया। 18 साल पुराने मामले को देखते हुए इसे वापस विचार के लिए भेजने के बजाय हाईकोर्ट ने स्वयं फैसला सुनाते हुए कहा:
“हमें अपीलकर्ताओं के NRNR खातों में जमा राशि को जब्त करने का कोई आधार नहीं मिलता, विशेष रूप से तब जब पिछले बैंकों के साथ ऋण लेनदेन पहले ही सुलझ चुका है।”
अपीलों को आंशिक रूप से स्वीकार किया गया और दोनों पक्षों को अपना-अपना खर्च वहन करने का निर्देश दिया गया।
केस विवरण
- केस टाइटल: सुनीता मेहता एवं अन्य बनाम विशेष निदेशक प्रवर्तन निदेशालय
- केस नंबर: MISC. APPEAL (FEMA) 2/2025 (और संबंधित मामले)
- पीठ: जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंद्र दुडेजा
- तारीख: 8 अप्रैल, 2026

