सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय स्टेट बैंक (SBI) के एक पूर्व कर्मचारी की अपील को खारिज करते हुए यह स्पष्ट किया है कि यदि कोई कर्मचारी 20 साल की क्वालीफाइंग सेवा पूरी नहीं करता या 50 वर्ष की आयु तक नहीं पहुँचता, तो वह पेंशन का हकदार नहीं है। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने स्पष्ट किया कि बैंक के नियमों के तहत पेंशन के उद्देश्य से ‘सेवा के स्वैच्छिक त्याग’ (Voluntary Abandonment) को ‘स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति’ (Voluntary Retirement) के बराबर नहीं माना जा सकता।
मामले का मुख्य कानूनी मुद्दा यह था कि क्या एक पूर्व क्लर्क, जो लंबी अवधि तक अनाधिकृत रूप से अनुपस्थित रहा और बाद में जिसकी सेवाओं को ‘त्याग’ (Abandonment) घोषित कर दिया गया, वह ‘स्टेट बैंक ऑफ इंडिया एम्प्लॉइज पेंशन फंड रूल्स, 1955’ के तहत पेंशन पाने का पात्र है। सुप्रीम कोर्ट ने अपील को खारिज करते हुए कहा कि अपीलकर्ता पेंशन नियमों में निर्धारित सेवा अवधि और आयु, दोनों ही मानदंडों को पूरा करने में विफल रहा।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता के.जी. शेषाद्रि को 17 फरवरी, 1979 को SBI में क्लर्क के रूप में नियुक्त किया गया था। वह 1989 में विदेश चले गए और ड्यूटी पर आना बंद कर दिया। 2004 में लौटने पर उन्होंने फिर से सेवा में शामिल होने का अनुरोध किया, जिसे बैंक ने ठुकरा दिया। बैंक ने 21 जुलाई, 2008 को उन्हें ‘स्वैच्छिक रूप से सेवानिवृत्त’ घोषित किया, हालांकि बाद के रिकॉर्ड से स्पष्ट हुआ कि यह 24 जनवरी, 1998 से 11 दिसंबर, 1998 तक अनाधिकृत अनुपस्थिति के कारण ‘सेवा त्याग’ का मामला था।
पेंशन लाभ के लिए अपीलकर्ता ने पहले केंद्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण-सह-श्रम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था, जिसे क्षेत्राधिकार की कमी के कारण खारिज कर दिया गया। इसके बाद मद्रास हाईकोर्ट के सिंगल जज और फिर डिवीजन बेंच ने भी राहत देने से इनकार कर दिया, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता के वकील ने दलील दी कि नियुक्ति की तारीख से लेकर सेवा मुक्ति तक की गणना करने पर उन्होंने 20 साल से अधिक की सेवा पूरी की है, इसलिए वे पेंशन फंड नियम 22(i)(c) के तहत पेंशन के पात्र हैं। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि बैंक का यह कहना गलत है कि उस समय कोई स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना (VRS) मौजूद नहीं थी।
दूसरी ओर, बैंक की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) ने दलील दी कि पेंशन के लिए सेवा की गणना केवल ‘कन्फर्मेशन’ (पुष्टि) की तारीख से की जाती है। इस आधार पर अपीलकर्ता की सेवा 20 वर्ष पूरी नहीं हुई थी। इसके अलावा, अपीलकर्ता की आयु 50 वर्ष भी नहीं थी, जो नियम 22(i)(a) के तहत अनिवार्य है। बैंक ने जोर दिया कि यह ‘स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति’ नहीं बल्कि ‘स्वैच्छिक सेवा त्याग’ का मामला था।
कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने पेंशन फंड नियमों के नियम 22, 20 और 7 का विश्लेषण किया। कोर्ट ने नोट किया कि पेंशन योग्य सेवा केवल सेवा पुष्टिकरण (Confirmation) की तारीख से शुरू होती है।
कोर्ट ने कहा:
“इस प्रकार, यदि हम प्रोबेशन अवधि पूरी होने के बाद अपीलकर्ता द्वारा प्रदान की गई सेवा की कुल अवधि की गणना करते हैं, तो यह 20 वर्ष से कम यानी 19 वर्ष, 09 महीने और 25 दिन आती है। इसलिए, सेवा के 20 वर्ष पूरे करने की पहली शर्त पूरी नहीं होती है।”
अपीलकर्ता द्वारा अपनी स्थिति को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के बराबर बताने के प्रयास पर कोर्ट ने टिप्पणी की:
“वर्तमान मामला स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का नहीं है, बल्कि सेवाओं के स्वैच्छिक त्याग का है, जिसमें 24.01.1998 से 11.12.1998 तक अपीलकर्ता बिना किसी सूचना और बिना अवकाश लिए लंबी अवधि तक अनुपस्थित रहे।”
पीठ ने AGM, SBI बनाम राधेश्याम पांडेय (2020) के फैसले का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि हालांकि पेंशन एक पूर्व-निर्धारित अधिकार है, लेकिन यह पात्रता शर्तों को पूरा करने पर ही निर्भर करता है। कोर्ट ने यह भी पाया कि यदि प्रोबेशन अवधि को भी जोड़ लिया जाए, तब भी अपीलकर्ता की आयु 50 वर्ष नहीं थी, जो नियम 22(i)(a) के तहत एक अनिवार्य शर्त है।
अंतिम निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अपीलकर्ता किसी भी लागू नियम के तहत पात्र नहीं है।
अदालत ने कहा:
“उपरोक्त चर्चा के आलोक में, हमारा मानना है कि अपीलकर्ता को पेंशन फंड नियमों के तहत पेंशन के लिए पात्र नहीं माना जा सकता क्योंकि उन्होंने न तो 20 साल की सेवा पूरी की है और न ही 50 साल की आयु प्राप्त की है… साथ ही, अपीलकर्ता का मामला नियम 22(i)(c) के दायरे में भी नहीं आता क्योंकि उन्हें कभी VRS नहीं दिया गया था, बल्कि उनकी सेवाओं को स्वैच्छिक त्याग माना गया था।”
इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज कर दी।
मामले का विवरण:
- केस का नाम: के.जी. शेषाद्रि बनाम ट्रस्टीज ऑफ स्टेट बैंक ऑफ इंडिया एवं अन्य
- केस नंबर: सिविल अपील नंबर 4279/2026 (एस.एल.पी. (सिविल) नंबर 12462/2022 से उत्पन्न)
- पीठ: जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा, जस्टिस एन.वी. अंजारिया
- दिनांक: 08 अप्रैल, 2026

