धार्मिक स्वतंत्रता के बीच अंधविश्वास को परिभाषित करने का अधिकार सुप्रीम कोर्ट के पास: हाईकोर्ट के नौ जजों की बेंच

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को स्पष्ट किया कि किसी धार्मिक प्रथा के ‘अंधविश्वास’ होने या न होने का निर्धारण करने का अधिकार और अधिकार क्षेत्र अदालत के पास है। केंद्र सरकार की उस दलील को खारिज करते हुए, जिसमें कहा गया था कि धर्मनिरपेक्ष कोर्ट के पास धार्मिक मामलों के निर्णय की विशेषज्ञता नहीं है, हाईकोर्ट ने न्यायपालिका की भूमिका को रेखांकित किया।

चीफ जस्टिस सूर्या कांत की अध्यक्षता वाली नौ जजों की संविधान बेंच वर्तमान में संविधान के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे और विस्तार की समीक्षा कर रही है। यह सुनवाई केरल के सबरीमाला मंदिर सहित विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के खिलाफ होने वाले भेदभाव से जुड़ी याचिकाओं पर केंद्रित है।

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और बेंच के बीच तीखी बहस देखने को मिली। मेहता ने तर्क दिया कि जज कानून के विशेषज्ञ होते हैं, धर्म के नहीं, इसलिए वे यह तय करने के लिए उपयुक्त नहीं हैं कि कौन सी प्रथा अंधविश्वास है।

सॉलिसिटर जनरल ने कहा, “अगर यह मान भी लिया जाए कि कोई प्रथा अंधविश्वास है, तो भी यह तय करना कोर्ट का काम नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 25(2)(बी) के तहत, यह विधायिका (Legislature) का कार्य है कि वह सुधार कानून बनाए।” उन्होंने उदाहरण दिया कि काला जादू जैसी प्रथाओं को रोकने के लिए विधायिका ने कानून बनाए हैं और कोर्ट को इस विधायी क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

भारत की विविधता का हवाला देते हुए मेहता ने कहा, “नागालैंड में जो धार्मिक है, वह मेरे लिए अंधविश्वास हो सकता है। यह एक अत्यंत विविध समाज है।”

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न्यायपालिका का कड़ा रुख

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, जस्टिस एम.एम. सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की सदस्यता वाली बेंच ने केंद्र की इस दलील को ‘अति-सरलीकृत’ करार दिया।

जस्टिस अमानुल्लाह ने कोर्ट के अधिकार क्षेत्र पर जोर देते हुए कहा, “कोर्ट में आप यह नहीं कह सकते कि विधायिका जो तय करे वही आखिरी शब्द है। ऐसा नहीं हो सकता।”

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जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने ‘जादू-टोने’ (Witchcraft) का उदाहरण देते हुए पूछा कि यदि ऐसी कोई प्रथा प्रचलित है और विधायिका उस पर मौन है, तो क्या कोर्ट चुप बैठा रहेगा? उन्होंने पूछा कि क्या कोर्ट ‘डॉक्ट्रिन ऑफ अनऑक्यूपाइड फील्ड’ (Doctrine of Unoccupied Field) का उपयोग करते हुए स्वास्थ्य, नैतिकता और सार्वजनिक व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए ऐसी प्रथाओं पर रोक लगाने के निर्देश नहीं दे सकता?

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने एक संतुलित दृष्टिकोण रखते हुए कहा कि जब यह तय करना हो कि कोई प्रथा ‘अनिवार्य धार्मिक प्रथा’ है या नहीं, तो कोर्ट को उसे उसी धर्म के दर्शन (Philosophy) के माध्यम से देखना चाहिए।

उन्होंने टिप्पणी की, “आप किसी अन्य धर्म के विचारों को लागू करके यह नहीं कह सकते कि यह अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है। कोर्ट का रुख उस धर्म के दर्शन को लागू करने का है, जो स्वास्थ्य, नैतिकता और सार्वजनिक व्यवस्था के अधीन है।”

धार्मिक स्थलों पर लैंगिक भेदभाव का यह कानूनी विवाद काफी पुराना है। सितंबर 2018 में, पांच जजों की संविधान बेंच ने सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को असंवैधानिक घोषित किया था।

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इसके बाद, नवंबर 2019 में पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए, तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली बेंच ने धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े इन व्यापक सवालों को बड़ी बेंच के पास भेज दिया था। अब यह नौ जजों की बेंच विभिन्न धर्मों में प्रचलित प्रथाओं और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन पर अंतिम कानूनी ढांचा तैयार कर रही है।

मामले की सुनवाई जारी है।

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