वसीयतकर्ता के मालिकाना हक पर सवाल उठाने वाला व्यक्ति प्रोबेट कार्यवाही के लिए ‘अजनबी’: बॉम्बे हाईकोर्ट

बॉम्बे हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई व्यक्ति वसीयत (Will) के जरिए दी गई संपत्तियों पर वसीयतकर्ता (Testator) के मालिकाना हक या टाइटल पर सवाल उठाता है, तो उसे प्रोबेट कार्यवाही में ‘हितधारक’ (Caveatable Interest) नहीं माना जा सकता। जस्टिस संदीप वी. मारणे ने अपने फैसले में कहा कि ऐसा व्यक्ति प्रोबेट रद्द करने की मांग नहीं कर सकता, क्योंकि प्रोबेट कोर्ट संपत्तियों के मालिकाना हक से जुड़े विवादों को तय करने का अधिकार नहीं रखता है।

हाईकोर्ट ने सुनील वामन भिड़े द्वारा दायर ‘सिविल रिविजन एप्लीकेशन’ को स्वीकार करते हुए पुणे की एक ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें वसीयतकर्ता के रिश्तेदारों द्वारा प्रोबेट रद्द करने की याचिका को सुनवाई के योग्य माना गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद नलिनी उर्फ ​​राजेश्वरी नगरकर द्वारा 23 अगस्त 2005 को की गई वसीयत से जुड़ा है। राजेश्वरी ने सतारा की कुछ संपत्तियां अपने दामाद सुनील वामन भिड़े (आवेदक) को और बाकी संपत्तियां अपने तीन बच्चों को वसीयत में दी थीं। 2008 में उनकी मृत्यु के बाद, वसीयत के निष्पादक (Executor) ने 13 दिसंबर 2011 को पुणे की सिविल जज सीनियर डिवीजन कोर्ट से प्रोबेट प्राप्त कर लिया था।

साल 2013 में, राजेश्वरी के भाई लक्ष्मण गोपाल कान्हेरे और उनके बेटे चंद्रहास ने ‘इंडियन सक्सेशन एक्ट, 1925’ की धारा 383 के तहत इस प्रोबेट को रद्द करने के लिए एक आवेदन दायर किया। उनका तर्क था कि संपत्तियां वास्तव में राजेश्वरी की मां राधाबाई की थीं और राधाबाई ने 1997 में एक नई वसीयत बनाकर संपत्तियां चंद्रहास के नाम कर दी थीं। उनके अनुसार, राजेश्वरी के पास वसीयत करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं था।

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आवेदक (भिड़े) ने इस पर आपत्ति जताई कि यह याचिका सुनवाई योग्य नहीं है। हालांकि, 20 दिसंबर 2022 को ट्रायल कोर्ट ने उनकी आपत्ति खारिज कर दी, जिसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा।

पक्षों की दलीलें

आवेदक की ओर से: डॉ. अभिनव चंद्रचूड़ ने दलील दी कि प्रतिवादी वसीयतकर्ता के ‘टाइटल’ (Title) को चुनौती दे रहे हैं, जो उन्हें प्रोबेट कार्यवाही के लिए एक ‘अजनबी’ (Stranger) बनाता है। कृष्णा कुमार बिड़ला बनाम राजेंद्र सिंह लोढ़ा (2008) मामले का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि ‘कैविएटेबल इंटरेस्ट’ तभी होता है जब प्रोबेट से उत्तराधिकार की उस कतार पर असर पड़ता हो जिसके जरिए कैविएटर अपना हक जता रहा हो। यहां प्रतिवादी राजेश्वरी के उत्तराधिकारी के रूप में नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र मालिकाना हक का दावा कर रहे थे।

प्रतिवादियों की ओर से: सीनियर एडवोकेट एस.एम. गोरवाडकर ने तर्क दिया कि यह प्रोबेट पूरी तरह से “अनावश्यक” था क्योंकि वसीयत पुणे में निष्पादित हुई थी और संपत्तियां सतारा में थीं। उन्होंने दावा किया कि ‘इंडियन सक्सेशन एक्ट’ की धारा 213 के तहत ऐसी स्थिति में प्रोबेट लेना अनिवार्य नहीं है और प्रतिवादियों का संपत्ति में हिस्सा होने के कारण प्रोबेट उनके अधिकारों में हस्तक्षेप करता है।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण और निष्कर्ष

हाईकोर्ट ने ‘कैविएटेबल इंटरेस्ट’ की परिभाषा और प्रोबेट कोर्ट के अधिकार क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित किया। जस्टिस मारणे ने पाया कि प्रतिवादियों की मुख्य शिकायत यह थी कि राजेश्वरी के पास उन संपत्तियों का मालिकाना हक नहीं था। सुप्रीम कोर्ट के कंवरजीत सिंह ढिल्लों बनाम हरदयाल सिंह ढिल्लों मामले का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा:

“प्रोबेट कोर्ट के लिए यह तय करना सक्षम नहीं है कि वसीयतकर्ता के पास उन संपत्तियों को वसीयत करने का अधिकार था या नहीं… प्रोबेट कोर्ट संपत्तियों के मालिकाना हक (Title) के प्रश्न को तय करने के लिए भी सक्षम नहीं है।”

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के दो फैसलों—कृष्णा कुमार बिड़ला और जी. गोपाल बनाम सी. भास्कर—के बीच के विरोधाभास को भी सुलझाया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘हल्का सा हित’ (Slight interest) रखने वाले व्यक्ति को कैविएट दाखिल करने का अधिकार तभी होता है जब वह वसीयत रद्द होने की स्थिति में वसीयतकर्ता के जरिए ही संपत्ति पाने का हकदार हो।

वर्तमान मामले में जस्टिस मारणे ने टिप्पणी की:

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“उत्तराधिकार कानून के दायरे से बाहर जाकर वसीयतकर्ता के टाइटल या संपत्ति हस्तांतरित करने की क्षमता पर सवाल उठाने वाला कोई भी व्यक्ति प्रोबेट कार्यवाही के लिए अजनबी बन जाता है… चूंकि यह दलील दी गई है कि राजेश्वरी खुद संपत्ति की मालिक नहीं थीं, इसलिए प्रोबेट रद्द होने पर भी प्रतिवादियों द्वारा उनके जरिए संपत्ति पाने का कोई सवाल ही नहीं उठता।”

फैसला

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि ट्रायल कोर्ट ने प्रोबेट रद्दीकरण आवेदन को सुनवाई योग्य मानकर अपने अधिकार क्षेत्र के प्रयोग में गंभीर चूक की है।

कोर्ट ने कहा, “प्रतिवादी वसीयतकर्ता के टाइटल पर सवाल उठा रहे हैं, इसलिए उनका कोई कैविएटेबल इंटरेस्ट नहीं बनता।” कोर्ट ने यह भी नोट किया कि प्रतिवादियों ने पहले ही टाइटल सूट (मालिकाना हक का मुकदमा) दायर किया हुआ है, जहां उनके दावों का उचित फैसला हो सकता है। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए प्रोबेट रद्दीकरण के आवेदन को खारिज कर दिया।

केस विवरण:

  • केस टाइटल: सुनील वामन भिड़े बनाम चंद्रहास लक्ष्मण कान्हेरे और अन्य
  • केस नंबर: सिविल रिविजन एप्लीकेशन नंबर 351/2023
  • बेंच: जस्टिस संदीप वी. मारणे
  • फैसले की तारीख: 17 मार्च 2026

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