चश्मदीद गवाहों की गवाही को केवल बचाव पक्ष के अनुमानों या छोटी-मोटी विसंगतियों के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। इस महत्वपूर्ण टिप्पणी के साथ इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने 1994 में एक ग्राम प्रधान की सरेआम हत्या के मामले में दोषी पाए गए चार व्यक्तियों की आपराधिक अपील खारिज कर दी है।
जस्टिस रजनीश कुमार और जस्टिस जफीर अहमद की खंडपीठ ने ट्रायल कोर्ट द्वारा 2001 में सुनाए गए फैसले की पुष्टि की। हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष ने चश्मदीद गवाहों के भरोसेमंद बयानों और फॉरेंसिक साक्ष्यों के माध्यम से दोषियों के खिलाफ अपराध को सफलतापूर्वक साबित किया है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह पूरा मामला सिधौर के तत्कालीन ग्राम प्रधान सीता राम की हत्या से जुड़ा है। घटना 13 जुलाई 1994 की सुबह करीब 7:30 बजे प्रतापगढ़ के शमशेरगंज बाजार में हुई थी। उस समय मृतक सीता राम और शिकायतकर्ता राम प्रताप सिंह (P.W.1) एक उचित दर की दुकान पर मिट्टी के तेल का वितरण करा रहे थे।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, चार आरोपी—बशीर अहमद, वकील अहमद उर्फ मुंडा, हामिद और भुल्लर—दुकान पर पहुंचे। भुल्लर ने कथित तौर पर मृतक को चबूतरे से नीचे खींचा, जबकि बशीर और हामिद ने उन पर गोलियां चला दीं। जैसे ही सीता राम जमीन पर गिरे, वकील अहमद ने उनके चेहरे पर बेहद करीब से डबल-बैरल गन से फायर किया। सीता राम की मौके पर ही मौत हो गई। लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद, एडिशनल सेशन जज (फास्ट ट्रैक कोर्ट), प्रतापगढ़ ने 9 अक्टूबर 2001 को चारों को आईपीसी की धारा 302/34 के तहत दोषी ठहराया था।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं (दोषियों) की ओर से: अपीलकर्ताओं का पक्ष श्री रिशाद मुर्तजा (अपीलकर्ता 1, 2 और 4 के लिए) और श्री राहुल कुमार सिंह (अपीलकर्ता 3 के लिए) ने रखा। बचाव दल में श्री ए.के. श्रीवास्तव, श्री अशोक कुमार सिंह, श्री गिरीश कुमार पांडे, श्री जयकरण और श्री सौरभ श्रीवास्तव भी शामिल थे। उन्होंने तर्क दिया कि सजा केवल “संयोगवश” मौजूद गवाहों के बयानों पर आधारित है, जो राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी थे। उनके मुख्य तर्क थे:
- मेडिकल साक्ष्यों के आधार पर मृत्यु का समय सुबह 4:00 बजे का प्रतीत होता है, जो अभियोजन पक्ष के दावे के उलट है।
- घटनास्थल के पास के स्वतंत्र गवाहों से पूछताछ नहीं की गई, जिसका लाभ आरोपियों को मिलना चाहिए।
- एफआईआर में विसंगतियां दर्शाती हैं कि गवाहों को सिखाया-पढ़ाया गया था।
अभियोजन और शिकायतकर्ता की ओर से: राज्य का पक्ष ए.जी.ए. श्री पवन कुमार मिश्रा ने रखा, जबकि शिकायतकर्ता की ओर से श्री अमर नाथ पांडे और श्री अमर नाथ दुबे पेश हुए। उन्होंने दलील दी कि सुबह 9:15 बजे एफआईआर दर्ज कराना यह साबित करता है कि कहानी गढ़ने का समय नहीं था। उन्होंने जोर दिया कि:
- राशन वितरण के समय P.W.1 और P.W.2 की मौजूदगी स्वाभाविक थी।
- आरोपी खूंखार अपराधी थे, जिसके कारण डर के मारे कोई अन्य स्थानीय व्यक्ति गवाही देने आगे नहीं आया।
- शरीर पर मौजूद निशान चश्मदीदों के बयान की पुष्टि करते हैं कि फायरिंग बहुत नजदीक से की गई थी।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने साक्ष्यों का गहराई से विश्लेषण करते हुए गवाहों की विश्वसनीयता और आपसी रंजिश के कानूनी पहलुओं पर गौर किया।
1. चश्मदीदों की गवाही पर भरोसा: हाईकोर्ट ने बचाव पक्ष के उस दावे को खारिज कर दिया कि गवाह वहां महज एक संयोग थे। कोर्ट ने कहा कि तेल वितरण के स्थान पर उनकी मौजूदगी प्राकृतिक थी। वादिवेलु थेवर बनाम मद्रास राज्य (1957) मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि कानून में साक्ष्य की गुणवत्ता महत्वपूर्ण है, संख्या नहीं।
हाईकोर्ट ने रंजिश के संबंध में टिप्पणी की:
“चश्मदीदों के मामले में, यदि अपराध साबित होता है, तो मकसद और मेडिकल जांच बहुत अधिक मायने नहीं रखते। मकसद खुद बचाव पक्ष ने दिखाया है… और यह स्थापित है कि रंजिश एक दोधारी तलवार है, जो किसी भी तरफ जा सकती है।”
2. मेडिकल बनाम मौखिक साक्ष्य: कोर्ट ने ‘खाली पेट’ की थ्योरी को नकार दिया। कोर्ट ने अभियोजन के उस स्पष्टीकरण को स्वीकार किया कि मृतक ने पिछले दिन व्रत रखा था और घटना के समय तक कुछ भी नहीं खाया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मृत्यु के समय पर मेडिकल राय चश्मदीद गवाहों के उस बयान को नहीं काट सकती जो भरोसा जगाता हो।
कोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट को दोषियों की अपील में कोई ठोस आधार नहीं मिला और कोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों में कोई कानूनी खामी नहीं थी।
“इस कोर्ट को विवादित फैसले और सजा के आदेश में ऐसी कोई अवैधता या त्रुटि नहीं मिली है, जिसके कारण अपीलीय क्षेत्राधिकार में हस्तक्षेप की आवश्यकता हो।”
हाईकोर्ट ने दोषियों की सजा बरकरार रखी और उन्हें जेल में ही रहकर अपनी सजा पूरी करने का आदेश दिया।
केस विवरण (Case Details):
- केस का शीर्षक: बशीर अहमद और 3 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
- अपील संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या – 926 वर्ष 2001
- पीठ: जस्टिस रजनीश कुमार और जस्टिस जफीर अहमद

